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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ६१ ) अव्यवहारिक भी है वह दोष नहीं कहा जाता।” इस कथन में यत्र तत्र स्थल विशेष के गणितों में सभी आचार्यों से स्वल्पान्तरित दोष जो मात्र कहने के लिए ही है कहते हुये भी भास्कराचार्य ने इस स्थल पर गणित सूक्ष्मता के लिए स्वल्पान्तर दोष का साहस के साथ उद्घाटन कर ही दिया है। जो मननशील पाठकों के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है। ११. शृङ्गोन्नतिवासना—सूर्य किरणों से सूर्य की दिशा की तरफ अमृत का पिण्ड, यह चन्द्रबिम्ब आधे बिम्ब से कम प्रकाशमान दिखाई देता है। तद्विरुद्ध दिशाओं में छायारूप अन्धकार रहता है। सूर्य कक्षा से चन्द्रमा की कक्षा नीचे भूमि के समीप है। नीचे रहने वाला यह दृश्य चन्द्रबिम्ब अमान्त काल में अन्धकारमय और पूर्णान्त काल में आधा उज्ज्वल और दृश्य होता है तथा सूर्य प्रकाश से १२ अंश से आगे की दूरी पर शुक्ल पक्ष की द्वितीया को नाखून के आकार का शृंगाकार चन्द्रमा पश्चिम क्षितिज में सूर्यास्त के बाद दृश्य होता है जिसे दूज का चांद या ईद का चांद से लोग कहकर अपने व्यवहार में उपयोग करते हैं, इत्यादि विषयों का लघु विवेचन इस गोलाध्याय में हुआ है। गणिताध्याय में चन्द्र शंकु साधन, सूर्य का शंकु और शंकुतल का साधन, भुज साधन, कोटि साधन, दिग् बल ज्ञान, शृंगदर्शन योग्य परलेख साधन के साधन ब्रह्मगुप्ता- चार्य के ब्रह्मसिद्धान्त के और चन्द्रशृंग साधन में भुज कोटि साधन में स्थूलता बताते हुए सही गणित की गवेषणा आचार्य ने की है। गणिताध्याय एवं गोलाध्याय में आचार्य से भी इस चन्द्र शृंगोन्नति साधन में कुछ त्रुटि सो हुई है इस विषय को सुस्पष्ट समझने के लिए गणक सार्वभौम 'गुरुणां गुरु' महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी रचित 'वास्तव चन्द्र शृंग