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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

( ६१ ) अव्यवहारिक भी है वह दोष नहीं कहा जाता।” इस कथन में यत्र तत्र स्थल विशेष के गणितों में सभी आचार्यों से स्वल्पान्तरित दोष जो मात्र कहने के लिए ही है कहते हुये भी भास्कराचार्य ने इस स्थल पर गणित सूक्ष्मता के लिए स्वल्पान्तर दोष का साहस के साथ उद्घाटन कर ही दिया है। जो मननशील पाठकों के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है। ११. शृङ्गोन्नतिवासना—सूर्य किरणों से सूर्य की दिशा की तरफ अमृत का पिण्ड, यह चन्द्रबिम्ब आधे बिम्ब से कम प्रकाशमान दिखाई देता है। तद्विरुद्ध दिशाओं में छायारूप अन्धकार रहता है। सूर्य कक्षा से चन्द्रमा की कक्षा नीचे भूमि के समीप है। नीचे रहने वाला यह दृश्य चन्द्रबिम्ब अमान्त काल में अन्धकारमय और पूर्णान्त काल में आधा उज्ज्वल और दृश्य होता है तथा सूर्य प्रकाश से १२ अंश से आगे की दूरी पर शुक्ल पक्ष की द्वितीया को नाखून के आकार का शृंगाकार चन्द्रमा पश्चिम क्षितिज में सूर्यास्त के बाद दृश्य होता है जिसे दूज का चांद या ईद का चांद से लोग कहकर अपने व्यवहार में उपयोग करते हैं, इत्यादि विषयों का लघु विवेचन इस गोलाध्याय में हुआ है। गणिताध्याय में चन्द्र शंकु साधन, सूर्य का शंकु और शंकुतल का साधन, भुज साधन, कोटि साधन, दिग् बल ज्ञान, शृंगदर्शन योग्य परलेख साधन के साधन ब्रह्मगुप्ता- चार्य के ब्रह्मसिद्धान्त के और चन्द्रशृंग साधन में भुज कोटि साधन में स्थूलता बताते हुए सही गणित की गवेषणा आचार्य ने की है। गणिताध्याय एवं गोलाध्याय में आचार्य से भी इस चन्द्र शृंगोन्नति साधन में कुछ त्रुटि सो हुई है इस विषय को सुस्पष्ट समझने के लिए गणक सार्वभौम 'गुरुणां गुरु' महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी रचित 'वास्तव चन्द्र शृंग

( ६२ ) के + ∠ पृ स्पं के + कोण स्प. क स्पं. तुल्य अर्थात् ३६० अंशों ४ समकोणों में दो सम- कोण से अधिक को कम करते हैं घटाते हैं तो भू स्प चं. स्प चतुर्भुज के चारों कोणों के योग में ३६० - १८० अंश से अधिक घटाने पर दो समकोण से कम अर्थात् स्प भू स्पं कोण का मान दो समकोण से कम होता है अर्थात् दृश्य विम्ब का मान आधे से कम सिद्ध होता है । १२. यंत्राध्याय—गोलाध्याय के इस प्रकरण में दिनगत और दिनशेष समयों का ज्ञान किया गया है । गोल यन्त्र से लग्न का मान स्पष्ट किया गया है । ताम्र धातु के कटोरानुमा एक प्रामाणिक एक ऐसा पात्र जिसके तले में ऐसा छिद्र हो जो प्रथम सूर्योदय से द्वितीय सूर्योदय तक ६० मर्तबे स्थापित जलपात्र में डूबता रहे, यही घटी है । चक्रयन्त्र, अर्ध चापयन्त्र, चापयन्त्र का आधा तुरीय यन्त्र, आचार्य से निर्मित अतिकौशल प्रदर्शक फलक यन्त्र, यष्टि यन्त्र, सूर्यदर्शन (इष्टकालिक सूर्य की छाया) दिग्देश काल का ज्ञान, यष्टि यन्त्र से ध्रुववेध द्वारा पलभा का ज्ञान, वंश (बाँस) वेध से नाना प्रकार के वेध गणितफल और स्वयंवह आदि वैज्ञानिक यन्त्रों के निर्माण और उनके उपयोग की व्यवस्था इस प्रकरण में हुई हैं। केवल १२ अंगुल की सूचि आकार की लकड़ी से किसी भी समय भूपृष्ठ में छाया नापकर सूर्यग्रह की इदम् इत्थम् की स्थिति बताई गई है। चूंकि वर्ष में ऐसी स्थितियाँ चार बार हो सकती है तो इस छाया वेध से रवि भुजांश ज्ञान की स्थिति (मार्च, अप्रैल, मई की है या जून, जुलाई, अगस्त की है या आगे)

( ६३ ) प्राकृतिक ऋतुओं के चिह्नों से जाननी चाहिए। अतएव आचार्य ने इसी प्रसंग में ‘ऋतु- वर्णनाध्याय’ नामक अध्याय का इस गोलाध्याय में निवेश किया है। ग्रहगणिताध्याय में यह विषय नहीं है। १३. ऋतुवर्णनाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में ६ ऋतुओं का वर्णन किया गया है। मकर-कुंभ के सूर्य में शिशिर, मीन-मेष में वसन्त, वृष-मिथुन में ग्रीष्म, कर्क-सिंह में वर्षा, कन्या-तुला में शरद एवं वृश्चिक-धनु के सूर्य में हेमन्त ऋतुयें होती हैं। खगोल मर्मज्ञता के साथ साहित्य शास्त्र की अशेष पाण्डित्य शैली का आचार्य भास्कर में विद्यमान थी। अतएव इस कथन में लेशमात्र सन्देह नहीं है कि प्राचीन ग्रन्थ प्रणेता आचार्य सर्वशास्त्रज्ञ होते थे। काश ! संस्कूत वाङ्गमय का यह समय विचारणीय व शोचनीय है। ग्रहगणिताध्याय में शृंगोन्नत्ति अधिकार के पश्चात् ग्रहयुत्याधिकार के वर्णन में ग्रहों के मध्यम बिम्ब, बिम्ब स्पष्टीकरण, ग्रहों का योग साधन इत्यादि विषयों का वर्णन हुआ है। तदुपरि भग्रहयुत्तधिकार में नक्षत्रों के ध्रुवक, शर, नक्षत्र ग्रहों का योग इत्यादि का विचार है तत्पश्चात् गणिताध्याय के अन्तिम प्रकरण पाताधिकार में गोलायनसन्धि, क्रांतिसाम्य, व्यतिपात वैधृत आदि विषयों से गणिताध्याय का आचार्य ने समापन किया है। १४. प्रश्नाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में प्रश्नारम्भ का प्रयोजन, बुद्धि- मान दैवज्ञों की प्रशंसा, अनेक प्रकार के खगोलीय प्रश्नों और उनके शंका-समाधान के साथ प्रश्नों के उत्तरों से विभूषित यह प्रश्नाध्याय पाठकों के लिए विवेचनीय, मननीय एवं विचारणीय है। समग्र ग्रन्थ के आमूल चूड अध्ययन से अध्येता की ग्रहगोल गणित रूप की यह सम्पत्ति सदा वर्धमान होती रहेगी। ग्रहगणिताध्याय में त्रिप्रश्नाधिकार में ही इस प्रश्नाध्याय का समावेश है। इस प्रकार ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय के प्रकरणों के समन्वयात्मक अध्ययन एवं विवेचन से पाठकों को महान् गणितज्ञ भास्कराचार्य के वैदुस्वपूर्ण शोध गणित कर्म का आभास होगा। भास्कराचार्य ने अपनी "सिद्धान्तशिरोमणि” ग्रन्थ की "वासना भाष्य” नामक व्याख्या की। नीचे इस सन्दर्भ में संक्षिस वर्णन दिया जा रहा है— सिद्धान्त शिरोमणि और उसका वासना भाष्य भास्कराचार्य ने स्वरचित पद्यात्मक गणित सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिये “वासना भाष्य” नामक व्याख्या भी स्वयं की है। आचार्य की स्वयं की इस व्याख्या का नाम उत्पन्न गणित सिद्धान्त के उपपादन का नामकरण "वासना भाष्य” क्यों हुआ होगा ? विचारणीय है।

( ६४ ) “उपपत्ति युतं गणितं गणका जगुः” निराधार का या अटकलपच्चू का गणित, गणित नहीं होता, किसी भी गणित का कोई मूलाधार होना चाहिए । वस्तुतः “वासना” इस शब्द के अनेक अर्थों में, प्रत्याशा, ज्ञान, भाव या संस्कार स्मृति, हेतु, कारण, कामना, उपपत्ति तर्क द्वारा किसी सिद्धान्त का सही उपपादन, कार्य से कारण का ज्ञान, अनुमान, प्रत्यक्ष, मेल, मिलन, सङ्गति युक्ति, प्राप्ति और प्रसिद्धि इत्यादि अनेक अर्थों से सम्बन्धित शब्द का नाम आचार्य ने “वासना” नामक सुन्दर शब्द से “वासना” भाष्य किया है । उक्त पर्यायवाची शब्द और उनके समान अर्थों से सम्बन्धित यह “वासना” शब्द आचार्य को अधिक प्रिय हुआ है । श्लोकबद्ध मूल ग्रहगणित सिद्धान्तों की उपपत्ति समझने में शिष्य वर्ग की कठिनता को ध्यान में रखकर आचार्य ने कठिन ग्रहगणित के श्लोकात्मक सिद्धान्तों को अपने इस “वासना भाष्य” से छात्र वर्ग का जो हित किया है पठनशील गुरु शिष्य परम्परा इसे स्वयं समझ कर आनन्दानुभव से शास्त्रज्ञान विवर्द्धक शोध कार्यों में तन्मयता से प्रवृत्त होकर रहेगी शुभाशा है । भास्कराचार्य के पूर्व एवं पश्चात् के जिन ग्रहगणित खगोलज्ञों में भास्कराचार्य ने जिन रचनाओं को प्रमाणीभूत माना है और भास्कराचार्य को जिन आचार्यों ने प्रमाणी- भूत माना है उन एव अन्य ग्रहगणित खगोल ग्रन्थ प्रणेता महान् आचार्यों का संक्षिप्त परिचय इस स्थल पर दे देना आवश्यक समझकर प्रस्तुत कर रहा हूँ और जो प्रसंगत अत्यन्त उचित भी है । प्रस्तुत प्रकरण का इसी लेखनी से लिखित 'ग्रह लाघव' करण ग्रन्थ की 'केदारदत्तः' टीका की भूमिका में भी उल्लेख हुआ है :- भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित-गोल आचार्यों का इतिवृत्त भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित गोल आचार्यों में आचार्य लगध, आर्यभट्ट, लल्ला- चार्य, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, मुञ्जाल, श्रीपतिभट्ट, भास्कर प्रथम आदि प्रमुख हैं। उक्त आचार्यों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है— आचार्य लगध—ज्योतिष शास्त्र वेदमूलक हैं, षडंगों में चक्षुस्थानीय है । वर्तमान ज्योतिष का वेदमूलक ग्रन्थ आचार्य 'लगध' प्रणीत 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ है । उपलब्ध ज्योतिष ग्रन्थ कोश में आचार्य लगध प्रणीत यह ग्रन्थ ही आगम ग्रन्थ है । आचार्य लगध और उनके 'वेदाङ्ग ज्योतिष' नामक ग्रन्थ के सन्दर्भ में ऐतिहासिक विद्वानों में विवाद है जिसकी चर्चा यहाँ अनावश्यक है । आचार्य लगध ने 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ में ज्योतिष- शास्त्र के गणित स्कन्ध की स्तुति करते हुए कहा है कि वेदांग शास्त्रों में (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष) ज्योतिष (गणित) ही मूर्धन्य है ।

( ६५ ) "यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा, तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं (गणितं) मूर्ध्नि संस्थितम् ।' 'वेदांग ज्योतिष' के अपने भाष्य में 'सोमाकर' ने भी ज्योतिष' की जगह 'गणित' कह कर ज्योतिष के गणित स्कन्ध को ही सर्वोपरि भी कहा है । वैदिक साहित्य एक गहन ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है । वैदिक-साहित्य के प्रादुर्भाव की परम्परा भी स्वयम् में किसी काल-विशेष की अपेक्षा रखती है । इसलिए काल की भी वैदिक पद्धति प्रचलित हुई । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कालज्ञान बोधक ज्योतिषशास्त्र का वर्त्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की देन है। कालान्तर में ब्रह्मर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति-पुराणों की रचना से ज्ञान संरक्षण एवं संवर्धन किया उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना से ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुण्य की है । 'वेदाङ्ग ज्योतिष' (याजुष ज्योतिष) जो आचार्य लगध प्रणीत कहा जाता है तथा शास्त्रों में "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" से ऐसा सिद्ध होता है कि आचार्य लगध तपोनिष्ठ महात्मा थे । शब्दशास्त्र (व्याकरण) के विमल शब्द रूप जल धारा से अज्ञान अन्धकार को मिटाने वाले आचार्य पाणिनी की तरह प्रकाश स्वरूप ज्योतिष-ज्ञान द्वारा अन्धकार को धोने वाले महात्मा लगध कहे जाते हैं । लगधाचार्य ने परमाधिक दिनमान ३६ घटी = १४ घण्टा, २४ मिनट के तुल्य जो उल्लेख किया है, तदनुसार यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि लगधाचार्य उत्तर भारत के उत्तर हिमालय की किसी चोटी के समीपस्थ गुफा में तपोनिष्ठ थे । लगधाचार्य ग्रह वेध करने में भी कुशल खगोलज्ञ थे । उन्हीं के कथन से पुष्टि होती है । याजुष ज्योतिष में उल्लिखित है— "प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ श्लोक ७ ॥ तात्पर्य यह है कि सूर्य और चन्द्रमा जब धनिष्ठा नक्षत्र के आदि में होते हैं तब उत्तरायण और चित्रा नक्षत्र के आधे में होने से दक्षिणायन होता है अर्थात् सदा सूर्य चान्द्र मासों के सम्बन्ध में माघ चान्द्र मास में उत्तरायण एवं श्रावण मास में दक्षिणायन होना कहा गया है । तथा, पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् । दिनर्वयनमासाङ्गं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १ ॥ ज्योतिशामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । सम्मतं ब्राह्मणेन्द्राणां यज्ञकालस्यसिद्धये ॥ २ ॥ [याजुष ज्यो०] ५

( ६६ ) अर्थात्— समीचीन यज्ञकाल की सिद्धि के लिए पञ्चसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष शरीर के अवयव युक्त ब्रह्मा को प्रणाम कर दिन, मास, ऋतु, अयन और पुण्य पवित्र वेद नेत्र ब्राह्मणों से सम्मत शास्त्र का वर्णन करता हूँ। आचार्य के कथनानुसार ५ वर्ष का एक युग मानने से— एक युग में सौर वर्ष = ५ = रविभगण । एक युग में, ५ × १२ = ६० सौर मास ६० × ३० = १८०० दिन । एक युग में चान्द्रमास = सौर मास + २ चान्द्रमास = ६२ चान्द्रमास । अतः १८६० से एक युग में क्षय दिन = ३० तथा इस प्रकार एक युग में सावन दिन = १८६० - ३० = १८३० दिन । एक युग में नक्षत्रोदय = १८३० + ५ = १८३५ । ,, ,, ,, चन्द्रभगण = ६० ,, ,, ,, चान्द्र सावन दिन = १८३५ - ६७ = १७६८ । एक सौर वर्ष के सावन दिन = ३६६, एक सौर वर्ष के चान्द्र दिन = ३७२, एक सौर वर्ष के नक्षत्र दिन = ३६७ तथा एक अयन से द्वितीय अयन तक के सौर दिन = ३६० ÷ २ = १८० एक अयन सम्बन्धी १८० सौर दिन या सौर अंशों में नक्षत्र योग १३°।२०' १३ १/३ = ४०/३ का भाग देने से (३ × १८०) / ४० = २७ / २ = १३।३० १३ १/२ घनिष्ठादि गणना से द्वितीय अयनारम्भ अथवा मकर माघादि में उत्तर अयन से ६ महीने कर्कादिश्रावण में दक्षिणायन होना सोपपत्तिक सिद्ध होता है । “धर्मवृद्धिष्प्रपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदगतौ········ अर्थात् उत्तरायण सूर्य में प्रतिदिन एक प्रस्थ के तुल्य दिन वृद्धि तथा तत्तुल्य रात्रि में ह्रास होता है । १८० × १ = १८० प्रस्थ तुल्य दिन रात्रि का ६ महीनों में क्रमशः वृद्धि-ह्रास हो सकेगा । सूर्य सञ्चार स्थिति में एक अयन से द्वितीय अयन पर्यन्त दिन और रात्रि मान ३०, ३० घटी होगा । अर्थात् ६ मुहूर्त्त = ६ × २ = १२ घटी (१ मुहूर्त्त = २ घटी) १ मुहूर्त्त के अनुसार दिन रात्रि के मान में ह्रास और वृद्धि होती हैं । जैसे यदि दिन मान = ३६ घटी, तो रात्रि मान = ६० - ३६ = २४ तथा रात्रिमान = ३६ तो दिन मान = ६० - ३६ = २४ । अर्थात् ३६ - २४ = १२ घटी = ६ मुहूर्त्त के तुल्य दिन और रात्रि की क्रमिक वृद्धि उत्तर दक्षिण अयनगत रवि में होगी ।

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इस प्रकार १५ घटी में ३ घटी तुल्य चर मान मानने से १५ + ३ = १८, १५ - ३ = १२ को द्विगुणित करने से ३६ घटी परम दिन मान एवं २४ घटी परमाल्प दिन का मान होता है । भूमण्डल के किस अक्षांश पर उक्त स्थिति घटित हो सकती है, गणित के आधार पर इसका ज्ञान आवश्यक है । जहाँ पर तीनों चर खण्डों का योग ३ घटी = १ घण्टा १२ मि० उस देश की पलभा से चर साधन क्रिया से यदि पलभा = ८ अंगुल २६ व्यंगुल तो ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की चर साधन प्रक्रिया से सायन मेषादि सूर्य (प्रायः आजकल २३ मार्च) की पलभा से ८।२६ × १०, ८।२६ × ८, ८।२६ × १०/३ = स्वल्पान्तर से ८४, ६७, २८ अतः ८४ + ६८ + २८ = १८० पल ÷ ६० = ३ घटी चरमान होता है । उज्जयिनी की पलभा = ५।८, उक्त पलभा = ८।२६ दोनों का अन्तर = ३।१८ अर्थात् उज्जैन के अक्षांश २३।१० भूपृष्ठीय किसी भव्य तपोभूमि में उक्त वेदांग ज्योतिष प्रणेता आचार्य लगध ने जन्म लिया था या वहाँ तपस्या की थी । चापीय त्रिभुज गणित से चरज्या = (अक्षांश स्पर्श × क्रान्तिस्पर्श रेखा) / (त्रिज्या = व्यासार्ध) चूंकि चर = ३ और परमक्रान्ति तुल्य दिन में परम क्रान्ति प्राचीन गणितज्ञों के मत से = २४° अतः सूक्ष्म गणित साधन प्रक्रिया से अक्षांश मान = ३४.४५ सिद्ध होते हैं । फलतः इस गणित से अनुमानतः महात्मा लगध को हिमालय के 'कश्मीर व कैलास या बदरिकाश्रम की गुफाओं में इस ज्ञान की उपलब्धि हुई होगी । वेदांग ज्योतिष में मुहूर्त्त आदि ज्ञान के लिए वेध से समय ज्ञान का प्रकार ४२वें श्लोक में स्पष्ट है । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कथन से यह तो ज्ञात होता ही है कि आचार्य लगध हिमालय की गुफा में तप करते थे; साथ ही यह सम्भव है कि महात्मा लगध अमरनाथ काश्मीर या बद्रिकाश्रम के ज्योतिषपीठ में तप करते हुए ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान भी प्रसारित करते रहे होंगे ? अर्थात् इस प्रकार से वर्त्तमान भारत का शिरोभाग सुदूर कश्मीर से भी उत्तर में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना का स्थान सिद्ध होता है । इससे यह भी फलित होता है कि प्राचीन भारतवर्ष की सीमा वर्त्तमान भारत की सीमा से और आगे उत्तर पश्चिम तक व्याप्त थी । वेदाङ्ग ज्योतिष प्रणेता के अनुसार ५ वर्ष के एक युग की मान्यता से ५ युग में उत्तरायण + दक्षिणायन = १० होती है । एक अयन से दूसरे अयन तक की दिन संख्या चान्द्रवर्ष सम्बन्धी दिन संख्याओं का अर्द्ध भाग होता है । अर्थात् एक चान्द्रवर्षीय चान्द्र-

( ६८ ) दिन संख्या = ३७२ का आधा = ३७२ ÷ २ = १८६, तिथियाँ होंगी । १८६ ÷ ३० = ६ चान्द्र महीने + ६ तिथियाँ होती हैं । प्रथमयन की तिथि में ६ जोड़ देने से द्वितीय- अयन तिथि का मान = ६ + १ + ६... = १।७।१३।१ ९।२५।१।७।१३।१ ९।२५ तिथियों में दूसरी अयन तिथि होगी, यह स्पष्ट है । माघशुक्ल प्रतिपद को प्रथम अयनारम्भ होने से १८६ + १ = १८७ ÷ ३० = ७ अर्थात् श्रावण शुक्ल सप्तमी को द्वितीय अयनारम्भ होना स्पष्ट है । इसी प्रकार तीसरा अयनारम्भ माघ शुक्ल त्रयोदशी को हो तो १८६ + १३ = १९९ ÷ ३० = शेष १९।१९-१५ = ४ अतः श्रावणकृष्ण चतुर्थी को द्वितीय अयन होना सिद्ध होता है । प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदश । चतुर्थं दशमं चैव द्वियुग्माद्यं बहुलेऽप्यतो... इस प्रकार वेदाङ्ग सम्मत वर्त्तमान पञ्चाङ्ग प्रणाली पर उक्त युक्ति कितनी घटित हो रही है ? —इसपर पाठक स्वयं विचार करेंगे । आर्यभट्ट—वेदाङ्ग ज्योतिष के बाद “आर्यभट्ट” का ग्रहगणित का “आर्यभटीय” पौरुषेय ग्रन्थ उपलब्ध है । २३ वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् वर्ष ४२१ (ईस्वी सन् ४९९) में आर्यभट्ट ने ज्योतिष सिद्धान्त के ‘आर्यभटीय’ ग्रन्थ की रचना कर ली थी । आर्यभटीय में वर्गमूल व घनमूल आदि अंकगणित की प्रक्रिया सर्वांश सूक्ष्म मिलती है । ‘पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है’’, यह बात सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही कही । आर्यभट्ट के परवर्त्ती गणित आचार्यों में ‘लल्ल’, ‘ब्रह्मगुप्त’, ‘वराहमिहिर’ आदि आचार्य प्रमुख हैं । इन परवर्त्ती आचार्यों ने आर्यभट्ट के उक्त भू-भ्रमण मत का खण्डन तो नहीं किया, किन्तु स्पष्टतया समर्थन वाक्य भी उपलब्ध नहीं होते हैं । हाँ, “ग्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है—” यह बात प्राचीन आचार्यों की बुद्धि में भी स्थिर थी । खगोलज्ञ आर्यभट्ट के वैशिष्ट्य सूचक स्मारक रूप में आज भी पटना के अति समीप या पटना से लगा हुआ एक गाँव है, जिसका नाम ‘खगोल’ ग्राम है । पुष्पपुर पटना के नालन्दा जैसे शिक्षा केन्द्र में रहते हुए आर्यभट्ट का इकाई से अरबों खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने आप में, अद्भुत कल्पना वैचित्र्य की द्योतक है । “क वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङ मौ यः ख द्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥” संक्षेप रूप में आर्यभटीय अंक संकेत निम्न प्रकार हैं— क् + अ = क = १, ख = २, ग = ३, घ = ४, ङ = ५, च = ६, ञ = १०, ट = ११, ण = १५, त = १६, न = २०, प = २१, म = २५, ङ और म इमो ५ + २५ =

( ६९ ) ३०, इसी प्रकार य = ३०, र = ४०, ल = ५०, व = ६०, श = ७०, ष = ८०, स = ९०, ह = १०० (९) नौ स्वरों अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ को, वर्ग और अवर्गाक्षर में संयुक्त करके इकाई, दहाई आदि १८ स्थान द्योतक अंकों की स्थितियों का परिचायक बताया है । जैसे—क् + अ = क = १, क् + इ = कि = १००, कु = १०००० एवम् क् + औ = कौ = १,००००००००००००००० इसी प्रकार, ख् + अ = ख = २, खि = २०, एवं य = ३०, यि = ३०००, यु = ३००००० । इन अंक संकेतों से पृथ्वी द्वारा सूर्य चतुर्दिक भ्रमण करने से एक युग सम्बन्धी रवि भगण संख्या स्पष्ट होती हैं—"युगरविभगणाः ख्युघृः" । खु = २००००, यु = ३०००००, घृ = ४०००००० इनका योग = खु २०००० यु ३००००० घृ ४०००००० ——————— ४३२०००० इस प्रकार आर्यभट्ट के, सूर्य सिद्धान्तानुसार 'युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्कशरार्णवाः' अर्थात् आर्यभट्ट के ४३२०००० के तुल्य हो जाते हैं । आर्यभट्ट के तन्त्र ग्रन्थानुसार बने पञ्चाङ्ग दाक्षिणात्य प्रदेश में आज भी प्रचलित एवं सूक्ष्म माने जाते हैं । यद्यपि परवर्ती आचार्यों में ब्रह्मगुप्त प्रभृतियों से भले ही सहमति न हो किन्तु नक्षत्रभ्रमणवत् पृथिवी की सूर्य के चारों ओर भ्रमणशीलता की दैनन्दिनीय गति का ज्ञान में आर्यभट्ट ही प्रथम खगोलज्ञ हुए हैं । अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगः यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥ आर्यभट्ट ने ग्रहों के भगण मानों में नक्षत्रभ्रम न लिखकर भूभ्रम ही लिखा भी है । "प्राणेनैति कला भूः" अर्थात् ('षड्भिः प्राणै पलम्') १ पल के षष्ठांश में एक विकला चलती है स्पष्ट कहा भी है । अहोरात्र में ६० × ६० × ६ = २१६०० 'एक विंशति सहस्राणि, षट् शतानि च' पुराणोक्त प्रमाण सञ्चार भी इसी अभिप्राय से समीचीन हो जाता है । उक्त प्रकार के अङ्क संकेतों से अनुमान होता है कि आर्यभट्ट ने किसी यवन ज्योतिर्विद पण्डित के माध्यम से सूर्यादि ग्रहों के भगण प्राप्त किये होंगे । किन्तु इतना तो निश्चित है कि आर्यभट्ट की अंक कल्पना अपूर्व होने के साथ-साथ विचारणीय है ।

( ७० ) लल्लाचार्य शके ४२१ (ईसवी सन् ४९९) शाम्ब पौत्र भट्टत्रिविक्रम पुत्र लल्लाचार्य ने शिष्य- धीवृद्धिद ग्रहगणित तन्त्र ग्रन्थ की रचना की है। (आर्यभटीय तन्त्र टीका भट्ट दीपिका- कार परमेश्वर के मतानुसार)— “••••आचार्य भटोदितं सुविषमं व्योमोकसां कर्म— यच्छिष्याणामभिधीयते तदधुना लल्लेन धीवृद्धिदम् । विज्ञाय शास्त्रममलार्यभटप्रणीतं तन्त्राणि यद्यपि कृतानि तदीयशिष्यैः कर्मक्रमो न खलु सम्यगुदीरितस्तै कर्म ब्रवीम्यहमतः क्रमशस्तु सूक्तम् ।” लल्लाचार्य ने ‘शिष्यधीवृद्धि’ ग्रन्थ रचना का कारण बताते हुए स्वयम् को आर्यभट्ट का शिष्य कहा है । किन्तु शके १०३६ (ई० १११४) के ग्रहगणक सार्वभौम आचार्य भास्कराचार्य ने आर्यभटस्य शिष्याः प्रभाकराद्य••••कहा है । इससे ज्ञात होता कि आर्यभट्ट के और भी शिष्य रहे होंगे । विजय, नन्दि, प्रद्यम्न, श्री सेन, लाट आदि को भी आर्यभट्ट का शिष्य कहा जाता है । लल्लाचार्य की भूपरिधि क्षेत्रफलादि गणित साधन की स्थूलता पर श्री भास्कराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में आपत्ति की है तथा साथ ही गोलफल साधन की सूक्ष्म प्रक्रिया भी बतलाई है । चन्द्रशृङ्गोन्नति साधन में लल्लाचार्य ने चमत्कारिक गणित किया है, जो प्रत्यक्ष रूप से ठीक दीखता है । किन्तु शृङ्गोन्नति गणित साधन प्रक्रियानिश्चय ही त्रुटिपूर्ण है, जिसपर भास्कराचार्य ने बहुत कुछ कह दिया है । वराह या वराहमिहिर या वराहमिहर अलविरूनी [Albiruni] के अनुसार शके ४२७ ईसवी सन् ५०५ कम्पिल्लक, वर्तमान कालपी नगर में सूर्य देवता के परम उपासक श्री आदित्यदास के सुपुत्र श्री वराह ने जन्म लिया था । अने पिता से ज्योतिष विद्या प्राप्त कर ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन किया । इस गहन अध्ययन और मनन चिन्तन के फलस्वरूप अवन्ती सम्राट से समादरित होकर वराहमिहिर ने लघुजातक, बृहज्जातक, विवाह पटल, बृहत्सं- हिता, योग यात्रा और पञ्चसिद्धान्तिका ग्रन्थों की रचना की । कुछ ऐतिहासिकों के मतानुसार वराह मगध द्विज थे । इस सन्दर्भ में विद्वानों का मत है कि अपने पिता से आर्यभटीय प्रभृति ग्रन्थों का अध्ययन करने के बाद आजीविका प्राप्ति के लिए वराह

( ७१ ) मगध से अवन्ती आये जहाँ राज्याभूषित वीर विक्रम की राजधानी में वराह समाद- रित हुए। यवन देशीय विद्वानों से वराह का सम्पर्क हो चुका था। वराहाचार्य ने यवनों की विशेष संस्तुति भी की है। जैसा कि पहले भी कह आए हैं—"म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम्।" "बृहज्जातक" में मेषादि द्वादश राशियों तथा अन्य स्थलों के योगादिकों में क्रिय, तावुरि, जितुम, लेय, प्राथोन, द्यूक या जूक, कौर्प्य, तौक्षिक, आकोकेर, हृद्रग, इत्थम्, हेलि, हिमन, कोण, आस्फुजित् होरा, अनफा, सुनफा दुरुधरा, केमद्रुम, वेशि, पणकर, हिबुक द्यूनम्, द्यूतम् कुलीर और त्रिकोण इत्यादि अनेक यवनों अर्थात् ग्रीक भाषा के शब्दाचार्यों के नाम क्रम वराह ने प्रस्तुत किये हैं। इस सन्दर्भ में विशेष जानकारी हेतु बेबर [weber] के ग्रन्थ—Cmdische Leteratur Cls chichte, Page No. २२७ को सम्यक् रूप के देखा जा सकता है। अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि वराह की अन्तिम ग्रंथ-रचना "बृहत्संहिता" है। 'बृहज्जातक' ग्रन्थ पर भट्टोत्पल महादेव, महीधर, केरली टीका के उपरान्त अनेक आचार्यों ने तत्समय में टीका रची है। 'बृहज्जातक' में मय, यवन मणित्थ, शक्ति, विष्णुगुप्त, देवस्वामी, सिद्धसेन, जीवशर्मा, सत्याचार्य आदि आचार्यों के नाम वरा हाचार्य ने स्वयं दिये हैं। वराहाचार्य के 'पञ्चसिद्धान्तिका' के पन्द्रहवें अध्याय के बीसवें श्लोक में लङ्का की अर्द्धरात्रि तथा लङ्का के सूर्योदय समय में दिनप्रवृत्ति का उल्लेख आर्यभट्ट के अनुसार किया है। "लङ्कार्धरात्रसमय दिनप्रवृत्तिं जगाद आर्यभट्टः भूयः स एव सूर्योदयात् प्रभृत्याह लङ्कायाम् ।" इस प्रकार वाराहाचार्य ने दिन प्रवृत्ति के दोमत व्यक्त किये हैं। किन्तु आर्यभटीय तन्त्र में सूर्योदय से ही दिन प्रवृत्ति का समय कहा गया है। वराहाचार्य की 'पञ्च- सिद्धान्तिका' अवश्य ही ग्रहगणितज्ञों के लिए विशेष समादरणीय है। किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि वराह का स्थान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों (सिद्धान्त, संहिता, होरा) में अप्रतिम पाण्डित्य आजतक अपने स्थान की इकाई पर ही हैं। ब्रह्मगुप्त शक ५२० (ई० सन् ५९८) बघेलवंशीय व्याघ्रमुख राजा के शासन काल में विष्णुधर्मोत्तर पुराणान्तर्गत् ब्रह्मसिद्धान्त के अनुसार चापवंशीय जीष्णुगुप्त के पुत्र ने ३० वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् ५५० (ई० सन् ६२८) में ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, एवं खण्ड-

( ७२ ) खाद्य नामक करण ग्रन्थ की रचना की थी । ब्रह्मगुप्त के पौत्र एवं विष्णुगुप्त के पुत्र होने के कारण वैश्य जाति के समझे जाते हैं । भास्कराचार्य के 'ब्रह्माह्वयश्रीधरपद्मनाभ बीजानि यस्मादति विस्तृतानि' से ज्ञात होता हैं कि ब्रह्मगुप्त का भी कोई बीजगणित नाम का ग्रन्थ था । जिसका इङ्गलिश अनुवाद ईसवी १८१७ में कोलब्रुक साहब ने किया है। इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के १२ वें अध्याय, ब्रह्मगुप्त के व्यक्त अंकगणित और भास्कराचार्य की पाटी अंकगणित एवं बीजगणित का अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध हैं । भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्त शिरोमणि के प्रारम्भ में लिखा है— “कृती जयति जिष्णुजो गणकचक्रचूडामणि- र्जयन्ति ललितोक्तयः प्रथिततन्त्रसद्युक्तयः । वराहमिहिरादयः समवलोक्य एषां कृतीः कृती भवतो मादृशोऽप्यतनु तन्त्रबन्धोऽवधीः ॥” इस प्रकार भास्कराचार्य ने गणकचक्रचूडामणि शब्द से ब्रह्मगुप्त के साथ आचार्य वराह की भी स्तुति की है । ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त पर चतुर्वेदाचार्य पृथूदक स्वामी की वासनाभाष्य नाम की टीका प्रसिद्ध है । ब्रह्मगुप्त स्वयम् नलिकावेध से ग्रह- गणित को प्रामाणिक मानते हैं । उदाहरणार्थ निम्न श्लोक इस बात का स्पष्टीकरण है— “ब्रह्मोक्तं ग्रहगणितं महत्ता कालेन यत्खिलीभूतम्, अभिधीयते स्फुटं तज्जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन । संसाध्य स्पष्टतरं बीजं नलिकादियन्त्रेण, तत्संस्कृतग्रहेभ्यः कर्त्तव्यो निर्णयादेशौ ॥” निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि अपने समय से आज तक के गणिताचार्यों में आचार्य ब्रह्मगुप्त गणित गोल धरातल में ऐतिहासिक खगोलज्ञ हुए हैं। मुञ्जाल का लघुमानस करण श्री मुञ्जाल ने शक ५८४ (ई० सन् ६६२) में 'लघुमानस' नामक करण ग्रन्थ की रचना की । प्रस्तुत ग्रन्थ में ग्रहों के ध्रुवक साधन कर वहाँ से इष्ट समय तक का अहर्गण से साधित ग्रह में ध्रुवक संस्कार से इष्टदिन के ग्रहों का संसाधन किया है । भास्कराचार्य ने अपने “सिद्धान्तशिरोमणि” में अयन चलन के सन्दर्भ में 'मुञ्जाल' का उल्लेख किया है— “अयन चलनं यदुक्तं मुञ्जालाद्यैः स एवायम् ।” मुञ्जाल के मत से ४३४ शक में, अयनांश का अभाव ज्ञात होता है ।

( ७३ ) श्रीपति या "श्रीपतिभट्ट" श्रीपति भट्ट का समय शके ९२१ (ई० सन् ९९९) में रहा है। श्रीपति भट्ट ने वर्तमान समय में अनुपलब्ध पाटी गणित, बीजगणित और सिद्धान्त शेखर नामक ग्रन्थों की रचना की है। इनका ज्योतिष के तीनों स्कन्धों में अप्रतिम पाण्डित्य है। फलित ज्योतिष में भी श्रीपति पद्धति, रत्नावलि, रत्नसार, रत्नमाला, धीकोटि नामक ग्रन्थ रहे हैं। ज्योतिष-फलित रत्नमाला ग्रन्थ की शैली सर्वोत्तम है। व्यापक पाण्डित्य के साथ- साथ श्रीपति भट्ट की कृतियों से उनके शील सौजन्य का परिचय प्राप्त होता है। प्रथम भास्कर यद्यपि प्रथम भास्कर का जन्म, समय, स्थान आदि का ज्ञान नहीं हो पाया है, सन् १९६० ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय से लघुभास्करीय-महाभास्करीय के अंग्रेजी अनुवाद से प्रथम भास्कर के सिद्धान्त विषयक ज्ञान ग्रन्थों में इनका उल्लेखनीय पाण्डित्य प्रतीत होता है और जो सिद्धान्त शिरोमणि प्रणेता भास्कराचार्य से भिन्न और पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं। अत एव ऐतिहासिक विचार परम्परा से भास्कर नाम के दो आचार्यों में प्रथम का नाम केवल भास्कर है और द्वितीय का नाम भी "भास्कर" की अपेक्षा भास्कराचार्य विशेष प्रसिद्ध हुआ है। भूमण्डल की भारतभूमि में भास्करावतार 'भास्कराचार्य' शके १०३६ (ई० सन् १११४) में सह्य पर्वत के समीप शाण्डिल्य गोत्र में विज्ज- डविड (आधुनिक बीजापुर) में श्रीमान् १०८ श्री महेश्वर उपाध्याय के पुत्र भास्करा- चार्य का जन्म हुआ। भास्कराचार्य रचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ, में स्वयं श्री भास्कराचार्य ने विष्णु- धर्मोत्तर पुराण को आगम कहा है। वासुदेव सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नाम की मूर्ति भेदों की चर्चा से अनुमान होता है कि श्रीमद्भास्कराचार्य वैष्णव सम्प्रदाय के अनु- यायी थे। इन्होंने अंकगणित में लीलावती, बीजगणित में बीजगणित, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय एवं करण ग्रन्थों में करण कुतूहल नामक ग्रन्थ की रचना की है। सभी ग्रन्थ उपलब्ध हैं। सिद्धान्त शिरोमणि के ग्रहों को ब्रह्मसिद्धान्त के तुल्य मानते हुए स्वयम् भास्कराचार्य ने स्पष्ट कहा है— "यथात्र ग्रन्थे ब्रह्मगुप्तागमः स्वीकृतः।" ग्रहगणित ज्योतिष में भास्कराचार्य एक अप्रतिम, अनुपम चमत्कारिक खगोल वेत्ता होते हुए एवं सर्वशास्त्रज्ञ ऐतिहासिक विद्वान् हुए हैं। भास्कराचार्य के गणिताध्याय के प्रथम श्लोक के वार्तिककार नृसिंह दैवज्ञ ने स्वयं लिखा है, जिसका अनुवाद रूप प्रस्तुत है—

( ७४ ) "मुनिश्रेष्ठ शाण्डिल्य गोत्रावतंस, कुम्भोद्भवालङ्कृत, दिगङ्गनाओं का भूषणसर्वस्व, सह्यकुलाचलाश्रित विज्जडविड नगर निवासी पवित्रितदण्डकारण्य, अनेक यज्ञाजित पुण्य श्लोक, याज्ञिकों का अग्रणी, यजुः शाखियों का उपाध्याय, सांवत्सरिकों का आचार्य, काव्यनाटकालंकार वेत्ताओं का अध्यापयिता, श्रीवृद्धिद का उपायकारक, ब्रह्मवसिष्ठ गणित तुल्य सर्वतोभद्रादि यन्त्र निर्माता, महाराष्ट्रीयों का आश्रयदाता, महेश्वराचार्य का नन्दन (पुत्र) परमकारुणिक, श्रीधर ब्रह्मगुप्त, लल्ल, चतुर्वेदाचार्य निर्मित अपार गणितसागर-सार विचार से परिपूर्ण श्री भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थारम्भ कर रहे हैं ।'' इत्यादि से आचार्य भास्कर की स्तुति की गई है । वस्तुतः लीलावती में चतुर्भुज क्षेत्र गणित का नियतत्व, वृत्त पृष्ठ घनफल साधन श्रेढ़ी गणित में गुणोत्तर श्रेढ़ी का सर्वफल साधन, एकाद्वित्र्यादि मूषावहन, अंकपाश गणित, बीजगणित में अवगद्धि का मूल्यज्ञापन, योगात्तरादि साधन, कुट्टक वर्गप्रकृति जैसे अलौकिक गणितज्ञान, एकवर्ण समीकरण में प्रश्नसाधन की अद्भुत कल्पना, अनेक वर्ण समीकरण में कल्पना लाघव, वर्ण समीकरण में दो प्रकार का मान साधन, पद्मनाभादि बीजगणित में दोष दर्शन, भावित गणित में चमत्कार

( ७५ ) श्वर, कमलाकर भट्ट, जगन्नाथ, बापूदेव शास्त्री एवं सुधाकर द्विवेदी आदि प्रमुख ज्योतिष जगत की विभूतियाँ हुईं। इन सबका संक्षिप्त इतिवृत्त नीचे दिया जा रहा है— महादेव—शके १२३८ (ई० स० १३१६) में पितामह आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य की सिद्धांत शिरोमणि के आधार पर महादेव ने लाघव प्रकार से ग्रहसाधन 'महादेव सारणी' निर्मित की है। इसी सारणी की आकृति रूप 'महादेवी' नाम की अन्य सारणी मदनसूरि शिष्य, मलयेन्दुसूरि का गुरु, फिरोजशाह तुगलक नामक यवन बादशाह के प्रधान सभा पण्डित नृसिंह दैवज्ञ ने १४८० (ई० सन् १५५८) में उत्तर-दक्षिण ध्रुव द्वय दृष्टि से विषुवद्वृत्त के धरातलीय भू पृष्ठ पर सभी वृत्तों को परिणामित कर 'यन्त्रराज' नामक यन्त्र और ग्रन्थ की रचना की है। इन्हीं के शिष्य मलयेन्दुसूरि ने उदाहरण स्वरूप टीका लिखी है। इस ग्रन्थ में ५४ विकला अयनांश गति मानी गई है, जो प्रायः सूर्य सिद्धान्त से मिलती है। यह ग्रन्थ पारसीक भाषा के ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद प्रतीत होता है। श्री महादेव—श्री महादेव गोदातीर त्र्यम्बक नामक राजा की राजसभा के प्रधान पण्डित थे। ब्रह्मसिद्धान्त और आर्यभट्ट के अनुसार शक १२७९ (ई० सन्-१३५७) में 'कामधेनु' नामक ग्रन्थ की रचना की है। श्री गङ्गाधर—विन्ध्याचल के दक्षिण सगर नगर निवासी चन्द्रभट्ट के पुत्र श्री गङ्गाधर ने शके १३५६ (ई० सन् १४३४) में वर्त्तमान प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के अनुसार 'चान्द्रमानाभिधान' नामक ग्रन्थ रचना की है। श्री मकरन्द—शके १४०० (ई० सन् १४७८) में सूर्य सिद्धान्त गणित के अनुसार पञ्चाङ्ग साधनोपयोग ग्रन्थ की रचना अपने ही नाम से 'श्री मकरन्द सारणी' की रचना की है। मकरन्द सारणी प्रायः उत्तर भारत में सर्वत्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुई है। श्री केशव—शके १३७८ (ई० सन् १४५६) में कौशिक गोत्रीय श्री कमलाकर के पुत्र, श्री वैद्यनाथ के शिष्य और प्रसिद्ध गणेश दैवज्ञ के पिता का नाम श्री केशव दैवज्ञ है। पश्चिम समुद्र तटवर्ती नन्दिग्राम में इनका जन्म हुआ था। इनकी अनेक ग्रन्थ रच- नाओं में, ग्रहकौतुक, वर्षग्रहसिद्धि, तिथिसिद्धि, जातक पद्धति, जातक पद्धति विवृत्ति, ताजक पद्धति, सिद्धान्त वासना पाठ, मुहूर्त्त तत्व, कुण्डाष्टक लक्षण, गणित दीपिका और कायस्थादि धर्म पद्धति विशेष प्रसिद्ध हैं। लक्ष्मीदास—उपमन्यु गोत्रीय श्री केशव पौत्र लक्ष्मीदास शके १४४२ (ई० सन् १५२०) में श्री भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ की उदाहरण सहित के टीकाकार हुए हैं। ज्ञानराज—ज्ञानराज ने शके १४२५ (ई० सन् १५०३) में 'सिद्धान्त कुमार' नामक ग्रहगणितीय ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की है। इनमें स्थल विशेष पर पुराणमत समर्थन के साथ भास्कराचार्य-मत का खण्डन भी मिलता है।

( ७६ ) ज्ञानराज ने भास्कराचार्य के शिरोमणि ग्रन्थ का खण्डन, “चन्द्रविम्ब सूर्य किरण सम्बन्ध से दृश्य नहीं होता”—इस तरह किया है। इस प्रकार ज्ञानराज भास्कराचार्य के शुक्लाङ्गल साधन के अवसर पर “तरणि किरणसङ्गादेषपीयूषपिण्डो” सूर्याभिमुख चन्द्रविम्ब उज्जवल एवं विपरीत में कृष्ण से शुक्लाशुक्ल चन्द्रविम्ब को दृश्यादृश्य बिम्ब सम्पात जन्य शृङ्गाकृति जैसे सूक्ष्म गणित सिद्धान्त इत्यादि का खण्डन किया है । श्री गणेश—उक्त खगोल गणितज्ञ आचार्यों की परम्परा में प्रकृत श्री गणेश के पिता व गुरु केशव माता लक्ष्मी के गर्भ में श्री भगवान गणेश के अवतार स्वरूप गणेश दैवज्ञ का जन्म शके १४२९ (ई० सम् १५०७) में हुआ । गणेश ने अपनी तेरह वर्ष की छोटी अवस्था में ही ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की रचना कर ली थी। वह चिरात जनश्रुति प्रसिद्ध है। ग्रहलाघव करण ग्रन्थ के आरम्भ में शक १४४२ से अहर्गण साधन किया है, जिससे १४४२-१४२९ = १३ वर्ष ज्ञात होता है। ग्रहलाघव ग्रन्थ के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि लम्बे-चौड़े अरबों संख्या के अङ्कों का अपवर्तनाङ्क समझ कर उनके स्थान पर छोटे अपवर्तित अंकों के माध्यम से, तथा ज्याचाप की क्लिष्ट गणित पद्धति के स्थान पर सर्वसुलभ लघु प्रणाली का प्रचलन के कारण से इस ग्रहसाधन ग्रन्थ की ‘ग्रहलाघव’ संज्ञा हुई है । आचार्य गणेश ने—ग्रहलाघव, लघुतिथि चिन्तामणि, {वृहत्तिथि चिन्तामणि, सिद्धान्त शिरोमणि टीका, लीलावती टीका, विवाह वृन्दावन टीका, मुहूर्त्त तत्त्व टीका, श्राद्धादि- निर्णय, छन्दोर्णव टीका, सुधीरञ्जनी, तर्जनीयन्त्रम्, कृष्ण जन्माष्टमी निर्णय, होलिका निर्णय इत्यादि अनेक ग्रन्थ रचना से ज्योतिष-शास्त्र का भण्डार भरा है। ज्योतिष शास्त्र के प्रगल्भ पाण्डित्य विशेष के साथ-साथ आचार्य गणेश की अन्य रचनाओं से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि श्री गणेश में काव्य साहित्यादि का पूर्ण एवं व्यापक पाण्डित्य है । बृहत्तिथ्यादि में स्वयं आचार्य गणेश का कथन उल्लेख्य है — ब्रह्माचार्यवसिष्ठकश्यपमुखैर्यत्खेटकर्मोदितं तत् तात्कालजमेव तत्तमथ तद्भूरिक्षणेऽभूच्छ्लथम्, प्रपातोऽथ मयासुर कृतयुगान्तेऽर्कात् स्फुटं तोषितात् । तच्चास्ति स्म कलौ तु सान्तरमथाऽभूच्चारु पाराशरम्, तदज्ञात्वार्यभट्टः खिलं बहुतिथे कालेऽकरोत्स्फुटम् । तत् श्लस्तं किल दुर्गसिंहकिकिहिराद्यैस्तान्निबद्धं स्फुटम् ॥ तच्चाभूच्छिथिलं वु जिष्णुतनयेनेऽकारि वेधात्स्फुटम्, ब्रह्मोक्त्याश्रितमेतदाप्यथ बहो कालेऽभवत् सान्तरम् ॥

( ७७ ) श्री केशवः स्फुटतरं कृतवान् हि सौरा— सन्नमेतदपि षष्टिमिते गतेऽब्दे— दृष्ट्वा श्लथं किमपितत्तनयो गणेश । स्पष्टं यथा ह्यकृत् दृग्गणितैक्यमत्र, कथमपि यदिदं भूरिकाले श्लथं स्यात् । मुहुरपि परिलक्षेन्दूग्ग्रहाद्युक्षयोग्यम्, सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः । कथितसदुपपत्त्या शुद्धि केन्द्रे प्रचाल्ये ॥ वाराहाचार्य ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका में १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ, ४—सौर एवं ५—पैतामह इन पाँचों में सूर्य सिद्धान्त का गणित "स्पष्टतरः” सविता से सूक्ष्म कहा है। तदुपरि के आचार्यों ने सौर सिद्धान्त की अपेक्षा आर्यभट्ट का गणित अधिक सूक्ष्म माना । कालान्तर में आर्यभट्ट का ग्रहगणित स्थूल हो जाने से ब्रह्म- गुप्त का वेधसिद्ध ग्रहगणित सूक्ष्म हुआ । किन्तु बहुकालान्तर में ब्रह्मगुप्त की स्थूलता को समझ कर श्री केशवाचार्य ने सौर एवं आर्य-सिद्धान्त के समीप का वेधसिद्ध ग्रहगणित स्वीकार किया है। इस उत्तरोत्तर गणित-सूक्ष्मता प्राप्ति के लिए आचार्य गणेश ने स्पष्ट दृग्गणितैक्य सिद्ध ग्रहगणित साधन पद्धति से भारतीय ज्योतिष को समुज्ज्वल किया है । इस सन्दर्भ में आचार्य गणेश का मत स्पष्ट है—"इस प्रकार के गणित के स्थूल भय को दूर करने के लिये सूर्यचन्द्रग्रहणादि प्रत्यक्ष दृगयोग्यता सम्पादनार्थं समय-समय पर वेधादि विचार से उत्पन्न त्रुटियाँ दूर करते हुए प्रश्न का समाधान करते रहना चाहिए। अर्थात् सूक्ष्मता प्राप्ति हेतु ग्रहों में संस्कारान्तर स्वीकृत करने चाहिए" इत्यादि स्पष्ट भी कहा है। सम्प्रति यह आशा की जा सकती है कि वर्तमान दृश्य एवं अदृश्य पञ्चाङ्गों का भयंकर विवाद उक्त प्रमाणों से समाप्त हो जा सकेगा । श्री विष्णु दैवज्ञ — शक १४७८ (ई० सन् १५५६) में दिवाकर दैवज्ञ के पुत्र, कृष्ण दैवज्ञ के अनुज श्री विष्णु दैवज्ञ ने सौरपक्षीय करण ग्रन्थ की रचना शके १५३० में की है, जिस पर उन्हीं के भाई श्री विश्वनाथ दैवज्ञ ने शके १५४५ में उदाहरण द्वारा गणित किया है। श्री सूर्य—शके १४६३ (ई० सन् १५४१) में आचार्य भास्कर की लीलावती की टीका श्री सूर्य ने गणितामृत भूमिका नाम से की है। कृष्ण दैवज्ञ—कृष्ण दैवज्ञ यवन बादशाह जहाँगीर के प्रधान सभापण्डित थे । इनके पिता का नाम श्री वल्लभ तथा माता का नाम गोजि था । इन्होंने "नवाङ्कुर" नाम की श्रीमद्भास्कराचार्य की बीजगणित पर टीका रची है ।

( ७८ ) रघुनाथ शर्मा—ओमभटात्मज श्री रघुनाथ शर्मा ने शके १४८७ (ई० सन् १५६५) में भास्कराचार्य और सूर्यसिद्धान्त मत से 'मणिप्रदीप' नामक करण ग्रन्थ की रचना की है । श्री मल्लारि—शके १४९३ (ई० सन् १५७१) में श्री दिवाकर दैवज्ञ के पुत्रों में श्री कृष्ण एवं विष्णु दैवज्ञ से मल्लारि छोटे थे । अपने पिता दिवाकर दैवज्ञ से ज्योतिष- शास्त्र का सम्यक् अध्ययन किया था। श्री गणेश दैवज्ञ कृत 'ग्रहलाघव' करण ग्रन्थ की टीका श्री मल्लारि ने अत्यन्त शुद्ध एवं सूक्ष्म गणित साधिका उपपत्ति के साथ की है । श्री गणेण दैवज्ञ के समान ही गणित गोल वैदुष्य की असाधारण प्रतिभा के साथ श्री मल्लारि में भी काव्य-साहित्य का प्रौढ़ पाण्डित्य और गणित की सूक्ष्मता स्पष्ट परिलक्षित है । मल्लारि ने ग्रहलाघव की उपपत्ति में यत्र-तत्र-सर्वत्र अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों के उदा- हरण की अपेक्षा श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के उद्धरणों का विशेष रूप से उल्लेख किया है । श्री रङ्गनाथ—श्री रङ्गनाथ का शके १४९५ (ई० सन् १५७३) में श्री काशी में जन्म हुआ । इनके पिता का नाम श्री दैवज्ञ तथा माता का नाम गोजि था । कृष्ण दैवज्ञ के अनुज तथा सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य रचयिता श्री मुनीश्वर के पिता श्री रङ्गनाथ हैं। इन्होंने शके १५२५ में सूर्यसिद्धान्त का सौरभाष्य 'गूढार्थप्रकाशिका' नाम से रचा है। रङ्गनाथ के समय यूरोपीय लोगों का भारत के साथ व्यापार वृद्धिगत हो चुका था। जैसा कि श्री रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त के गोलाध्याय के यन्त्राधिकार के २२वें श्लोक की टीका में स्पष्ट लिखा है— “पारदाम्बुसूत्राणि शुल्बतैलजलानि च। बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभा ॥” एवं २२ श्लोक की टीका में—“इयं स्वयंवहविद्या समुद्रान्तरनिवासिजनैः फिरंगाख्यैः सम्यगभ्यस्तेति ॥” श्री रङ्गनाथ के उक्त स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय यूरोपीय लोगों का भारत में गमनागमन बाहुल्य हो चुका था। सूर्यसिद्धान्त की रङ्गनाथकृत उप- पत्तियों में प्रायः श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के सिद्धान्त की बहुलता से उद्धृत हैं । शके १५२५ चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, बुधवार की रात्रि में श्री सूर्योदयादिष्ट घटिका ४२।३० में प्रसव दुःख की असह्य वेदना से पीड़ित पत्नी के दुःख की उद्विग्नता से श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने "दुःख निवृत्त हो" सूर्य-सिद्धान्त की व्याख्या मैं ही लिखूँगा ।''''ऐसी प्रतिज्ञा की ही थी कि उसी क्षण ग्रहगणित गोलज्ञ, सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य-

( ७९ ) कार श्री मुनीश्वर, अपर नाम “विश्वरूप” ने जन्म लिया था । अतएव श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने अपने ग्रन्थ “गूढार्थप्रकाशिका” को मुनीश्वर का सहज (भाई) भी कहा है । रङ्गनाथकृत सौरभाष्य की टिप्पणी में उल्लिखित है— “यत्स्मृत्याभीष्टकार्यस्य निर्विघ्नां सिद्धिमेष्यति- नरस्तं बुद्धिदं वन्दे वक्रतुण्डं शिवोद्भवम् । पितरौ गोजिवल्लालौ जयतोऽम्बाशिवात्मकौ याभ्यां पञ्चसुता जाता ज्योतिःसंसार हेतवः । सार्वभौमजहाँगीरविश्वासस्पद भाषणम् यस्य त भ्रातरं कृष्णं बुधं वन्दे जगद्गुरुम् नाना ग्रन्थान् समालोक्य सूर्यसिद्धान्तटिप्पणम् करोमि रङ्गनाथोऽहम् तद्गूढार्थ प्रकाशकम् ।” और ग्रन्थ समाप्ति पर— “भागीरथी तीर संस्थे शम्भोवारणसी पुरे, बल्लालगणको रुद्रजपासक्तोऽभवद्बुधः । तस्यात्मजापञ्चगुणाभिरामा ज्येष्ठः स रामः सकलागमज्ञः । येनोपपत्तिः स्वधिया नितान्तं प्रकाशिताऽनन्त सुधारकस्य ॥ ततः स कृष्णो जहांगीरसार्वभौमस्य सर्वाधिगतप्रतिष्ठः । श्रीभास्करीयं विवृतं तु येन बीजं तथाश्रीपतिपद्धतिः सा ॥ गोविन्दसंज्ञस्ततस्तृतीयः तस्यानुजोऽहं गुरुलब्धविद्यः, विश्वेशतत्पदनिविष्टचेताः काशी निवासी सकलाभिमान्य- श्रीरङ्गनाथोऽर्कमुखोत्थ शाखे गूढ़प्रकाशाभिधटिप्पणं सः कृत्वा महादेवबुधाग्रजोऽथ विश्वेश्वरायार्पितवान् सुवृद्धये शके तत्त्वतित्थ्युन्मिते चैत्रमासे सिते शम्भुतिथ्यां बुधेऽर्कोदयान्मे दलाब्धद्विनाराद्वनाडीषु यातो मुनीश्वराक्र्कसिद्धान्तगूढ़प्रकाशौ गूढ़प्रकाशकं दृष्ट्वा रङ्गनाथभवं भुवि । मुनीश्वरस्य सहजं लभन्तां गणकाः मुखम् ॥” श्री विश्वनाथ-शके १५०० (ई० स० १५७८) दिवाकर पुत्र, विष्णु कृष्ण मल्लारि से सर्व कनिष्ठ हैं । सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि, नीलकण्ठी, विष्णुकरण ग्रहलाघव मकरन्द और अनन्तसुधार आदिक ग्रन्थों के प्रसिद्ध टीकाकार ज्योतिर्विद् हुए हैं इन्होंने गणित क्रम- दर्शन पूर्वक उदाहरणों के द्वारा उक्त ग्रन्थों को समलंकृत किया है ।

( ८० ) सभी उदाहरणों से इनका प्रखर वैदुष्य स्पष्ट प्रतीत होता हैं। ग्रहलाघव ग्रन्थ के उदाहरणों से तो इनमें असाधारण गोल गणित का पाण्डित्य झलकता है । नृसिंह दैवज्ञ—शके १५०८ ( ईसवी १५८६ ) कृष्ण दैवज्ञ पुत्र दिवाकर दैवज्ञ का पिता, विष्णु दैवज्ञ और मल्लरि पिता के अनुजों से ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के साथ २५ वर्ष आयु में सूर्य सिद्धान्त की सौरभाष्य नाम की और ३५ वर्ष में भास्करीय शिरोमणि टीका वासनावार्तिक नाम की सविशेष टीका रची है । ग्रह वेध करने में प्रवीण थे यन्त्रों में, मयूर यन्त्रब्रह्मचारियंत्र शंख यन्त्र, मेषाज युद्धयन्त्र, शंखवादन यन्त्र, घण्टापटहादिवादन यन्त्र, बानर यन्त्र घटी यन्त्र और अनेक यन्त्रों में हंसादि यन्त्र स्वयंवह गोल यन्त्र आदि बहुत यन्त्रों का उल्लेख किया है । नीलकण्ठ—आचार्य नीलकण्ठ ने शके १५०९ (ई० स० १५८७) में पारसीक एवं अरबीक शब्द मिश्रित ताजकमत के तीन तन्त्रों से 'तांजिक नीलकण्ठी' नामक ग्रन्थ की रचना की । इस ग्रन्थ का उपयोग वर्षफल बनाने मे होता है । उक्त ग्रन्थ के द्वारा आचार्य नीलकण्ठ का ग्रहगणित गोलविषयक पाण्डित्य भी सिद्ध होता है । सुधाकर द्विवेदी के अनुसार इन्होंने 'जातक पद्धति' नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी। रामदैवज्ञ—ये आचार्य नीलकण्ठ के छोटे भाई थे । इन्होंने शक १५५८ में प्रसिद्ध 'मुहूर्त्त चिन्तामणि' ग्रन्थ की रचना की । एक करण ग्रन्थ 'रामविनोद' भी इन्होंने लिखा, इसमें २८० श्लोक हैं । श्रो मुनीश्वर—शके १५२५ (ई० स० १६०३) में सौरभाष्य रचयिता आचाय रंगनाथ दैवज्ञ पुत्र 'मुनीश्वर' जिनका अपरनाम 'विश्वरूप' भी है, उत्पन्न हुये । आचार्य मुनीश्वर के इतिवृत्त के सन्दर्भ में यहाँ विशेष वर्णन आवश्यक समझकर प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ 'सिद्धान्तशिरोमणि' का यह 'मरिचि' भाष्य इन्हीं की ज्योतिष जगत को अति महत्वपूर्ण देन है । 'मरीचितीकाकार' आचार्य मुनीश्वर परम्परा से ज्योतिर्विद्या में पूर्ण मर्मज्ञ थे । बाल्यजीवन से ही उनकी बुद्धि ज्योतिर्विद्या की ओर अग्रे प्रस्फुटित होती थी । इसका एक प्रबल हेतु यह भी है कि मुनीश्वर के पिता श्री रंगनाथ भी ऊँचे स्तर के ग्रहगणितज्ञ हो चुके थे । सूर्य सिद्धान्त पर सर्वप्रथम रंगनाथ कृत सौरभाष्य अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अतएव वंश परम्परा में संस्कार से आचार्य मुनीश्वर की ग्रहगणितगोल में तो असाधारण प्रतिभा होनी ही चाहिये थी साथ ही न्याय, काव्य, व्याकरण, प्रभृति शास्त्रों में भी उनका अशेष पाण्डित्य था । आचार्य मुनीश्वर ने सूर्य सिद्धान्त के भगणों के आधार से शके १५६८ (ई० स० १६४६) में 'सिद्धान्त सार्वभौम' नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ की रचना की । स्वरचित