भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ६८ ) दिन संख्या = ३७२ का आधा = ३७२ ÷ २ = १८६, तिथियाँ होंगी । १८६ ÷ ३० = ६ चान्द्र महीने + ६ तिथियाँ होती हैं । प्रथमयन की तिथि में ६ जोड़ देने से द्वितीय- अयन तिथि का मान = ६ + १ + ६... = १।७।१३।१ ९।२५।१।७।१३।१ ९।२५ तिथियों में दूसरी अयन तिथि होगी, यह स्पष्ट है । माघशुक्ल प्रतिपद को प्रथम अयनारम्भ होने से १८६ + १ = १८७ ÷ ३० = ७ अर्थात् श्रावण शुक्ल सप्तमी को द्वितीय अयनारम्भ होना स्पष्ट है । इसी प्रकार तीसरा अयनारम्भ माघ शुक्ल त्रयोदशी को हो तो १८६ + १३ = १९९ ÷ ३० = शेष १९।१९-१५ = ४ अतः श्रावणकृष्ण चतुर्थी को द्वितीय अयन होना सिद्ध होता है । प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदश । चतुर्थं दशमं चैव द्वियुग्माद्यं बहुलेऽप्यतो... इस प्रकार वेदाङ्ग सम्मत वर्त्तमान पञ्चाङ्ग प्रणाली पर उक्त युक्ति कितनी घटित हो रही है ? —इसपर पाठक स्वयं विचार करेंगे । आर्यभट्ट—वेदाङ्ग ज्योतिष के बाद “आर्यभट्ट” का ग्रहगणित का “आर्यभटीय” पौरुषेय ग्रन्थ उपलब्ध है । २३ वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् वर्ष ४२१ (ईस्वी सन् ४९९) में आर्यभट्ट ने ज्योतिष सिद्धान्त के ‘आर्यभटीय’ ग्रन्थ की रचना कर ली थी । आर्यभटीय में वर्गमूल व घनमूल आदि अंकगणित की प्रक्रिया सर्वांश सूक्ष्म मिलती है । ‘पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है’’, यह बात सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही कही । आर्यभट्ट के परवर्त्ती गणित आचार्यों में ‘लल्ल’, ‘ब्रह्मगुप्त’, ‘वराहमिहिर’ आदि आचार्य प्रमुख हैं । इन परवर्त्ती आचार्यों ने आर्यभट्ट के उक्त भू-भ्रमण मत का खण्डन तो नहीं किया, किन्तु स्पष्टतया समर्थन वाक्य भी उपलब्ध नहीं होते हैं । हाँ, “ग्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है—” यह बात प्राचीन आचार्यों की बुद्धि में भी स्थिर थी । खगोलज्ञ आर्यभट्ट के वैशिष्ट्य सूचक स्मारक रूप में आज भी पटना के अति समीप या पटना से लगा हुआ एक गाँव है, जिसका नाम ‘खगोल’ ग्राम है । पुष्पपुर पटना के नालन्दा जैसे शिक्षा केन्द्र में रहते हुए आर्यभट्ट का इकाई से अरबों खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने आप में, अद्भुत कल्पना वैचित्र्य की द्योतक है । “क वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङ मौ यः ख द्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥” संक्षेप रूप में आर्यभटीय अंक संकेत निम्न प्रकार हैं— क् + अ = क = १, ख = २, ग = ३, घ = ४, ङ = ५, च = ६, ञ = १०, ट = ११, ण = १५, त = १६, न = २०, प = २१, म = २५, ङ और म इमो ५ + २५ =