सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६९ ) ३०, इसी प्रकार य = ३०, र = ४०, ल = ५०, व = ६०, श = ७०, ष = ८०, स = ९०, ह = १०० (९) नौ स्वरों अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ को, वर्ग और अवर्गाक्षर में संयुक्त करके इकाई, दहाई आदि १८ स्थान द्योतक अंकों की स्थितियों का परिचायक बताया है । जैसे—क् + अ = क = १, क् + इ = कि = १००, कु = १०००० एवम् क् + औ = कौ = १,००००००००००००००० इसी प्रकार, ख् + अ = ख = २, खि = २०, एवं य = ३०, यि = ३०००, यु = ३००००० । इन अंक संकेतों से पृथ्वी द्वारा सूर्य चतुर्दिक भ्रमण करने से एक युग सम्बन्धी रवि भगण संख्या स्पष्ट होती हैं—"युगरविभगणाः ख्युघृः" । खु = २००००, यु = ३०००००, घृ = ४०००००० इनका योग = खु २०००० यु ३००००० घृ ४०००००० ——————— ४३२०००० इस प्रकार आर्यभट्ट के, सूर्य सिद्धान्तानुसार 'युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्कशरार्णवाः' अर्थात् आर्यभट्ट के ४३२०००० के तुल्य हो जाते हैं । आर्यभट्ट के तन्त्र ग्रन्थानुसार बने पञ्चाङ्ग दाक्षिणात्य प्रदेश में आज भी प्रचलित एवं सूक्ष्म माने जाते हैं । यद्यपि परवर्ती आचार्यों में ब्रह्मगुप्त प्रभृतियों से भले ही सहमति न हो किन्तु नक्षत्रभ्रमणवत् पृथिवी की सूर्य के चारों ओर भ्रमणशीलता की दैनन्दिनीय गति का ज्ञान में आर्यभट्ट ही प्रथम खगोलज्ञ हुए हैं । अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगः यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥ आर्यभट्ट ने ग्रहों के भगण मानों में नक्षत्रभ्रम न लिखकर भूभ्रम ही लिखा भी है । "प्राणेनैति कला भूः" अर्थात् ('षड्भिः प्राणै पलम्') १ पल के षष्ठांश में एक विकला चलती है स्पष्ट कहा भी है । अहोरात्र में ६० × ६० × ६ = २१६०० 'एक विंशति सहस्राणि, षट् शतानि च' पुराणोक्त प्रमाण सञ्चार भी इसी अभिप्राय से समीचीन हो जाता है । उक्त प्रकार के अङ्क संकेतों से अनुमान होता है कि आर्यभट्ट ने किसी यवन ज्योतिर्विद पण्डित के माध्यम से सूर्यादि ग्रहों के भगण प्राप्त किये होंगे । किन्तु इतना तो निश्चित है कि आर्यभट्ट की अंक कल्पना अपूर्व होने के साथ-साथ विचारणीय है ।