भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ७० ) लल्लाचार्य शके ४२१ (ईसवी सन् ४९९) शाम्ब पौत्र भट्टत्रिविक्रम पुत्र लल्लाचार्य ने शिष्य- धीवृद्धिद ग्रहगणित तन्त्र ग्रन्थ की रचना की है। (आर्यभटीय तन्त्र टीका भट्ट दीपिका- कार परमेश्वर के मतानुसार)— “••••आचार्य भटोदितं सुविषमं व्योमोकसां कर्म— यच्छिष्याणामभिधीयते तदधुना लल्लेन धीवृद्धिदम् । विज्ञाय शास्त्रममलार्यभटप्रणीतं तन्त्राणि यद्यपि कृतानि तदीयशिष्यैः कर्मक्रमो न खलु सम्यगुदीरितस्तै कर्म ब्रवीम्यहमतः क्रमशस्तु सूक्तम् ।” लल्लाचार्य ने ‘शिष्यधीवृद्धि’ ग्रन्थ रचना का कारण बताते हुए स्वयम् को आर्यभट्ट का शिष्य कहा है । किन्तु शके १०३६ (ई० १११४) के ग्रहगणक सार्वभौम आचार्य भास्कराचार्य ने आर्यभटस्य शिष्याः प्रभाकराद्य••••कहा है । इससे ज्ञात होता कि आर्यभट्ट के और भी शिष्य रहे होंगे । विजय, नन्दि, प्रद्यम्न, श्री सेन, लाट आदि को भी आर्यभट्ट का शिष्य कहा जाता है । लल्लाचार्य की भूपरिधि क्षेत्रफलादि गणित साधन की स्थूलता पर श्री भास्कराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में आपत्ति की है तथा साथ ही गोलफल साधन की सूक्ष्म प्रक्रिया भी बतलाई है । चन्द्रशृङ्गोन्नति साधन में लल्लाचार्य ने चमत्कारिक गणित किया है, जो प्रत्यक्ष रूप से ठीक दीखता है । किन्तु शृङ्गोन्नति गणित साधन प्रक्रियानिश्चय ही त्रुटिपूर्ण है, जिसपर भास्कराचार्य ने बहुत कुछ कह दिया है । वराह या वराहमिहिर या वराहमिहर अलविरूनी [Albiruni] के अनुसार शके ४२७ ईसवी सन् ५०५ कम्पिल्लक, वर्तमान कालपी नगर में सूर्य देवता के परम उपासक श्री आदित्यदास के सुपुत्र श्री वराह ने जन्म लिया था । अने पिता से ज्योतिष विद्या प्राप्त कर ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन किया । इस गहन अध्ययन और मनन चिन्तन के फलस्वरूप अवन्ती सम्राट से समादरित होकर वराहमिहिर ने लघुजातक, बृहज्जातक, विवाह पटल, बृहत्सं- हिता, योग यात्रा और पञ्चसिद्धान्तिका ग्रन्थों की रचना की । कुछ ऐतिहासिकों के मतानुसार वराह मगध द्विज थे । इस सन्दर्भ में विद्वानों का मत है कि अपने पिता से आर्यभटीय प्रभृति ग्रन्थों का अध्ययन करने के बाद आजीविका प्राप्ति के लिए वराह