सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७१ ) मगध से अवन्ती आये जहाँ राज्याभूषित वीर विक्रम की राजधानी में वराह समाद- रित हुए। यवन देशीय विद्वानों से वराह का सम्पर्क हो चुका था। वराहाचार्य ने यवनों की विशेष संस्तुति भी की है। जैसा कि पहले भी कह आए हैं—"म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम्।" "बृहज्जातक" में मेषादि द्वादश राशियों तथा अन्य स्थलों के योगादिकों में क्रिय, तावुरि, जितुम, लेय, प्राथोन, द्यूक या जूक, कौर्प्य, तौक्षिक, आकोकेर, हृद्रग, इत्थम्, हेलि, हिमन, कोण, आस्फुजित् होरा, अनफा, सुनफा दुरुधरा, केमद्रुम, वेशि, पणकर, हिबुक द्यूनम्, द्यूतम् कुलीर और त्रिकोण इत्यादि अनेक यवनों अर्थात् ग्रीक भाषा के शब्दाचार्यों के नाम क्रम वराह ने प्रस्तुत किये हैं। इस सन्दर्भ में विशेष जानकारी हेतु बेबर [weber] के ग्रन्थ—Cmdische Leteratur Cls chichte, Page No. २२७ को सम्यक् रूप के देखा जा सकता है। अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि वराह की अन्तिम ग्रंथ-रचना "बृहत्संहिता" है। 'बृहज्जातक' ग्रन्थ पर भट्टोत्पल महादेव, महीधर, केरली टीका के उपरान्त अनेक आचार्यों ने तत्समय में टीका रची है। 'बृहज्जातक' में मय, यवन मणित्थ, शक्ति, विष्णुगुप्त, देवस्वामी, सिद्धसेन, जीवशर्मा, सत्याचार्य आदि आचार्यों के नाम वरा हाचार्य ने स्वयं दिये हैं। वराहाचार्य के 'पञ्चसिद्धान्तिका' के पन्द्रहवें अध्याय के बीसवें श्लोक में लङ्का की अर्द्धरात्रि तथा लङ्का के सूर्योदय समय में दिनप्रवृत्ति का उल्लेख आर्यभट्ट के अनुसार किया है। "लङ्कार्धरात्रसमय दिनप्रवृत्तिं जगाद आर्यभट्टः भूयः स एव सूर्योदयात् प्रभृत्याह लङ्कायाम् ।" इस प्रकार वाराहाचार्य ने दिन प्रवृत्ति के दोमत व्यक्त किये हैं। किन्तु आर्यभटीय तन्त्र में सूर्योदय से ही दिन प्रवृत्ति का समय कहा गया है। वराहाचार्य की 'पञ्च- सिद्धान्तिका' अवश्य ही ग्रहगणितज्ञों के लिए विशेष समादरणीय है। किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि वराह का स्थान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों (सिद्धान्त, संहिता, होरा) में अप्रतिम पाण्डित्य आजतक अपने स्थान की इकाई पर ही हैं। ब्रह्मगुप्त शक ५२० (ई० सन् ५९८) बघेलवंशीय व्याघ्रमुख राजा के शासन काल में विष्णुधर्मोत्तर पुराणान्तर्गत् ब्रह्मसिद्धान्त के अनुसार चापवंशीय जीष्णुगुप्त के पुत्र ने ३० वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् ५५० (ई० सन् ६२८) में ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, एवं खण्ड-