भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ७५ ) श्वर, कमलाकर भट्ट, जगन्नाथ, बापूदेव शास्त्री एवं सुधाकर द्विवेदी आदि प्रमुख ज्योतिष जगत की विभूतियाँ हुईं। इन सबका संक्षिप्त इतिवृत्त नीचे दिया जा रहा है— महादेव—शके १२३८ (ई० स० १३१६) में पितामह आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य की सिद्धांत शिरोमणि के आधार पर महादेव ने लाघव प्रकार से ग्रहसाधन 'महादेव सारणी' निर्मित की है। इसी सारणी की आकृति रूप 'महादेवी' नाम की अन्य सारणी मदनसूरि शिष्य, मलयेन्दुसूरि का गुरु, फिरोजशाह तुगलक नामक यवन बादशाह के प्रधान सभा पण्डित नृसिंह दैवज्ञ ने १४८० (ई० सन् १५५८) में उत्तर-दक्षिण ध्रुव द्वय दृष्टि से विषुवद्वृत्त के धरातलीय भू पृष्ठ पर सभी वृत्तों को परिणामित कर 'यन्त्रराज' नामक यन्त्र और ग्रन्थ की रचना की है। इन्हीं के शिष्य मलयेन्दुसूरि ने उदाहरण स्वरूप टीका लिखी है। इस ग्रन्थ में ५४ विकला अयनांश गति मानी गई है, जो प्रायः सूर्य सिद्धान्त से मिलती है। यह ग्रन्थ पारसीक भाषा के ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद प्रतीत होता है। श्री महादेव—श्री महादेव गोदातीर त्र्यम्बक नामक राजा की राजसभा के प्रधान पण्डित थे। ब्रह्मसिद्धान्त और आर्यभट्ट के अनुसार शक १२७९ (ई० सन्-१३५७) में 'कामधेनु' नामक ग्रन्थ की रचना की है। श्री गङ्गाधर—विन्ध्याचल के दक्षिण सगर नगर निवासी चन्द्रभट्ट के पुत्र श्री गङ्गाधर ने शके १३५६ (ई० सन् १४३४) में वर्त्तमान प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के अनुसार 'चान्द्रमानाभिधान' नामक ग्रन्थ रचना की है। श्री मकरन्द—शके १४०० (ई० सन् १४७८) में सूर्य सिद्धान्त गणित के अनुसार पञ्चाङ्ग साधनोपयोग ग्रन्थ की रचना अपने ही नाम से 'श्री मकरन्द सारणी' की रचना की है। मकरन्द सारणी प्रायः उत्तर भारत में सर्वत्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुई है। श्री केशव—शके १३७८ (ई० सन् १४५६) में कौशिक गोत्रीय श्री कमलाकर के पुत्र, श्री वैद्यनाथ के शिष्य और प्रसिद्ध गणेश दैवज्ञ के पिता का नाम श्री केशव दैवज्ञ है। पश्चिम समुद्र तटवर्ती नन्दिग्राम में इनका जन्म हुआ था। इनकी अनेक ग्रन्थ रच- नाओं में, ग्रहकौतुक, वर्षग्रहसिद्धि, तिथिसिद्धि, जातक पद्धति, जातक पद्धति विवृत्ति, ताजक पद्धति, सिद्धान्त वासना पाठ, मुहूर्त्त तत्व, कुण्डाष्टक लक्षण, गणित दीपिका और कायस्थादि धर्म पद्धति विशेष प्रसिद्ध हैं। लक्ष्मीदास—उपमन्यु गोत्रीय श्री केशव पौत्र लक्ष्मीदास शके १४४२ (ई० सन् १५२०) में श्री भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ की उदाहरण सहित के टीकाकार हुए हैं। ज्ञानराज—ज्ञानराज ने शके १४२५ (ई० सन् १५०३) में 'सिद्धान्त कुमार' नामक ग्रहगणितीय ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की है। इनमें स्थल विशेष पर पुराणमत समर्थन के साथ भास्कराचार्य-मत का खण्डन भी मिलता है।