सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) ज्ञानराज ने भास्कराचार्य के शिरोमणि ग्रन्थ का खण्डन, “चन्द्रविम्ब सूर्य किरण सम्बन्ध से दृश्य नहीं होता”—इस तरह किया है। इस प्रकार ज्ञानराज भास्कराचार्य के शुक्लाङ्गल साधन के अवसर पर “तरणि किरणसङ्गादेषपीयूषपिण्डो” सूर्याभिमुख चन्द्रविम्ब उज्जवल एवं विपरीत में कृष्ण से शुक्लाशुक्ल चन्द्रविम्ब को दृश्यादृश्य बिम्ब सम्पात जन्य शृङ्गाकृति जैसे सूक्ष्म गणित सिद्धान्त इत्यादि का खण्डन किया है । श्री गणेश—उक्त खगोल गणितज्ञ आचार्यों की परम्परा में प्रकृत श्री गणेश के पिता व गुरु केशव माता लक्ष्मी के गर्भ में श्री भगवान गणेश के अवतार स्वरूप गणेश दैवज्ञ का जन्म शके १४२९ (ई० सम् १५०७) में हुआ । गणेश ने अपनी तेरह वर्ष की छोटी अवस्था में ही ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की रचना कर ली थी। वह चिरात जनश्रुति प्रसिद्ध है। ग्रहलाघव करण ग्रन्थ के आरम्भ में शक १४४२ से अहर्गण साधन किया है, जिससे १४४२-१४२९ = १३ वर्ष ज्ञात होता है। ग्रहलाघव ग्रन्थ के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि लम्बे-चौड़े अरबों संख्या के अङ्कों का अपवर्तनाङ्क समझ कर उनके स्थान पर छोटे अपवर्तित अंकों के माध्यम से, तथा ज्याचाप की क्लिष्ट गणित पद्धति के स्थान पर सर्वसुलभ लघु प्रणाली का प्रचलन के कारण से इस ग्रहसाधन ग्रन्थ की ‘ग्रहलाघव’ संज्ञा हुई है । आचार्य गणेश ने—ग्रहलाघव, लघुतिथि चिन्तामणि, {वृहत्तिथि चिन्तामणि, सिद्धान्त शिरोमणि टीका, लीलावती टीका, विवाह वृन्दावन टीका, मुहूर्त्त तत्त्व टीका, श्राद्धादि- निर्णय, छन्दोर्णव टीका, सुधीरञ्जनी, तर्जनीयन्त्रम्, कृष्ण जन्माष्टमी निर्णय, होलिका निर्णय इत्यादि अनेक ग्रन्थ रचना से ज्योतिष-शास्त्र का भण्डार भरा है। ज्योतिष शास्त्र के प्रगल्भ पाण्डित्य विशेष के साथ-साथ आचार्य गणेश की अन्य रचनाओं से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि श्री गणेश में काव्य साहित्यादि का पूर्ण एवं व्यापक पाण्डित्य है । बृहत्तिथ्यादि में स्वयं आचार्य गणेश का कथन उल्लेख्य है — ब्रह्माचार्यवसिष्ठकश्यपमुखैर्यत्खेटकर्मोदितं तत् तात्कालजमेव तत्तमथ तद्भूरिक्षणेऽभूच्छ्लथम्, प्रपातोऽथ मयासुर कृतयुगान्तेऽर्कात् स्फुटं तोषितात् । तच्चास्ति स्म कलौ तु सान्तरमथाऽभूच्चारु पाराशरम्, तदज्ञात्वार्यभट्टः खिलं बहुतिथे कालेऽकरोत्स्फुटम् । तत् श्लस्तं किल दुर्गसिंहकिकिहिराद्यैस्तान्निबद्धं स्फुटम् ॥ तच्चाभूच्छिथिलं वु जिष्णुतनयेनेऽकारि वेधात्स्फुटम्, ब्रह्मोक्त्याश्रितमेतदाप्यथ बहो कालेऽभवत् सान्तरम् ॥