भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ७३ ) श्रीपति या "श्रीपतिभट्ट" श्रीपति भट्ट का समय शके ९२१ (ई० सन् ९९९) में रहा है। श्रीपति भट्ट ने वर्तमान समय में अनुपलब्ध पाटी गणित, बीजगणित और सिद्धान्त शेखर नामक ग्रन्थों की रचना की है। इनका ज्योतिष के तीनों स्कन्धों में अप्रतिम पाण्डित्य है। फलित ज्योतिष में भी श्रीपति पद्धति, रत्नावलि, रत्नसार, रत्नमाला, धीकोटि नामक ग्रन्थ रहे हैं। ज्योतिष-फलित रत्नमाला ग्रन्थ की शैली सर्वोत्तम है। व्यापक पाण्डित्य के साथ- साथ श्रीपति भट्ट की कृतियों से उनके शील सौजन्य का परिचय प्राप्त होता है। प्रथम भास्कर यद्यपि प्रथम भास्कर का जन्म, समय, स्थान आदि का ज्ञान नहीं हो पाया है, सन् १९६० ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय से लघुभास्करीय-महाभास्करीय के अंग्रेजी अनुवाद से प्रथम भास्कर के सिद्धान्त विषयक ज्ञान ग्रन्थों में इनका उल्लेखनीय पाण्डित्य प्रतीत होता है और जो सिद्धान्त शिरोमणि प्रणेता भास्कराचार्य से भिन्न और पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं। अत एव ऐतिहासिक विचार परम्परा से भास्कर नाम के दो आचार्यों में प्रथम का नाम केवल भास्कर है और द्वितीय का नाम भी "भास्कर" की अपेक्षा भास्कराचार्य विशेष प्रसिद्ध हुआ है। भूमण्डल की भारतभूमि में भास्करावतार 'भास्कराचार्य' शके १०३६ (ई० सन् १११४) में सह्य पर्वत के समीप शाण्डिल्य गोत्र में विज्ज- डविड (आधुनिक बीजापुर) में श्रीमान् १०८ श्री महेश्वर उपाध्याय के पुत्र भास्करा- चार्य का जन्म हुआ। भास्कराचार्य रचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ, में स्वयं श्री भास्कराचार्य ने विष्णु- धर्मोत्तर पुराण को आगम कहा है। वासुदेव सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नाम की मूर्ति भेदों की चर्चा से अनुमान होता है कि श्रीमद्भास्कराचार्य वैष्णव सम्प्रदाय के अनु- यायी थे। इन्होंने अंकगणित में लीलावती, बीजगणित में बीजगणित, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय एवं करण ग्रन्थों में करण कुतूहल नामक ग्रन्थ की रचना की है। सभी ग्रन्थ उपलब्ध हैं। सिद्धान्त शिरोमणि के ग्रहों को ब्रह्मसिद्धान्त के तुल्य मानते हुए स्वयम् भास्कराचार्य ने स्पष्ट कहा है— "यथात्र ग्रन्थे ब्रह्मगुप्तागमः स्वीकृतः।" ग्रहगणित ज्योतिष में भास्कराचार्य एक अप्रतिम, अनुपम चमत्कारिक खगोल वेत्ता होते हुए एवं सर्वशास्त्रज्ञ ऐतिहासिक विद्वान् हुए हैं। भास्कराचार्य के गणिताध्याय के प्रथम श्लोक के वार्तिककार नृसिंह दैवज्ञ ने स्वयं लिखा है, जिसका अनुवाद रूप प्रस्तुत है—