भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ६६ ) अर्थात्— समीचीन यज्ञकाल की सिद्धि के लिए पञ्चसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष शरीर के अवयव युक्त ब्रह्मा को प्रणाम कर दिन, मास, ऋतु, अयन और पुण्य पवित्र वेद नेत्र ब्राह्मणों से सम्मत शास्त्र का वर्णन करता हूँ। आचार्य के कथनानुसार ५ वर्ष का एक युग मानने से— एक युग में सौर वर्ष = ५ = रविभगण । एक युग में, ५ × १२ = ६० सौर मास ६० × ३० = १८०० दिन । एक युग में चान्द्रमास = सौर मास + २ चान्द्रमास = ६२ चान्द्रमास । अतः १८६० से एक युग में क्षय दिन = ३० तथा इस प्रकार एक युग में सावन दिन = १८६० - ३० = १८३० दिन । एक युग में नक्षत्रोदय = १८३० + ५ = १८३५ । ,, ,, ,, चन्द्रभगण = ६० ,, ,, ,, चान्द्र सावन दिन = १८३५ - ६७ = १७६८ । एक सौर वर्ष के सावन दिन = ३६६, एक सौर वर्ष के चान्द्र दिन = ३७२, एक सौर वर्ष के नक्षत्र दिन = ३६७ तथा एक अयन से द्वितीय अयन तक के सौर दिन = ३६० ÷ २ = १८० एक अयन सम्बन्धी १८० सौर दिन या सौर अंशों में नक्षत्र योग १३°।२०' १३ १/३ = ४०/३ का भाग देने से (३ × १८०) / ४० = २७ / २ = १३।३० १३ १/२ घनिष्ठादि गणना से द्वितीय अयनारम्भ अथवा मकर माघादि में उत्तर अयन से ६ महीने कर्कादिश्रावण में दक्षिणायन होना सोपपत्तिक सिद्ध होता है । “धर्मवृद्धिष्प्रपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदगतौ········ अर्थात् उत्तरायण सूर्य में प्रतिदिन एक प्रस्थ के तुल्य दिन वृद्धि तथा तत्तुल्य रात्रि में ह्रास होता है । १८० × १ = १८० प्रस्थ तुल्य दिन रात्रि का ६ महीनों में क्रमशः वृद्धि-ह्रास हो सकेगा । सूर्य सञ्चार स्थिति में एक अयन से द्वितीय अयन पर्यन्त दिन और रात्रि मान ३०, ३० घटी होगा । अर्थात् ६ मुहूर्त्त = ६ × २ = १२ घटी (१ मुहूर्त्त = २ घटी) १ मुहूर्त्त के अनुसार दिन रात्रि के मान में ह्रास और वृद्धि होती हैं । जैसे यदि दिन मान = ३६ घटी, तो रात्रि मान = ६० - ३६ = २४ तथा रात्रिमान = ३६ तो दिन मान = ६० - ३६ = २४ । अर्थात् ३६ - २४ = १२ घटी = ६ मुहूर्त्त के तुल्य दिन और रात्रि की क्रमिक वृद्धि उत्तर दक्षिण अयनगत रवि में होगी ।