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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

( ६६ ) अर्थात्— समीचीन यज्ञकाल की सिद्धि के लिए पञ्चसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष शरीर के अवयव युक्त ब्रह्मा को प्रणाम कर दिन, मास, ऋतु, अयन और पुण्य पवित्र वेद नेत्र ब्राह्मणों से सम्मत शास्त्र का वर्णन करता हूँ। आचार्य के कथनानुसार ५ वर्ष का एक युग मानने से— एक युग में सौर वर्ष = ५ = रविभगण । एक युग में, ५ × १२ = ६० सौर मास ६० × ३० = १८०० दिन । एक युग में चान्द्रमास = सौर मास + २ चान्द्रमास = ६२ चान्द्रमास । अतः १८६० से एक युग में क्षय दिन = ३० तथा इस प्रकार एक युग में सावन दिन = १८६० - ३० = १८३० दिन । एक युग में नक्षत्रोदय = १८३० + ५ = १८३५ । ,, ,, ,, चन्द्रभगण = ६० ,, ,, ,, चान्द्र सावन दिन = १८३५ - ६७ = १७६८ । एक सौर वर्ष के सावन दिन = ३६६, एक सौर वर्ष के चान्द्र दिन = ३७२, एक सौर वर्ष के नक्षत्र दिन = ३६७ तथा एक अयन से द्वितीय अयन तक के सौर दिन = ३६० ÷ २ = १८० एक अयन सम्बन्धी १८० सौर दिन या सौर अंशों में नक्षत्र योग १३°।२०' १३ १/३ = ४०/३ का भाग देने से (३ × १८०) / ४० = २७ / २ = १३।३० १३ १/२ घनिष्ठादि गणना से द्वितीय अयनारम्भ अथवा मकर माघादि में उत्तर अयन से ६ महीने कर्कादिश्रावण में दक्षिणायन होना सोपपत्तिक सिद्ध होता है । “धर्मवृद्धिष्प्रपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदगतौ········ अर्थात् उत्तरायण सूर्य में प्रतिदिन एक प्रस्थ के तुल्य दिन वृद्धि तथा तत्तुल्य रात्रि में ह्रास होता है । १८० × १ = १८० प्रस्थ तुल्य दिन रात्रि का ६ महीनों में क्रमशः वृद्धि-ह्रास हो सकेगा । सूर्य सञ्चार स्थिति में एक अयन से द्वितीय अयन पर्यन्त दिन और रात्रि मान ३०, ३० घटी होगा । अर्थात् ६ मुहूर्त्त = ६ × २ = १२ घटी (१ मुहूर्त्त = २ घटी) १ मुहूर्त्त के अनुसार दिन रात्रि के मान में ह्रास और वृद्धि होती हैं । जैसे यदि दिन मान = ३६ घटी, तो रात्रि मान = ६० - ३६ = २४ तथा रात्रिमान = ३६ तो दिन मान = ६० - ३६ = २४ । अर्थात् ३६ - २४ = १२ घटी = ६ मुहूर्त्त के तुल्य दिन और रात्रि की क्रमिक वृद्धि उत्तर दक्षिण अयनगत रवि में होगी ।

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इस प्रकार १५ घटी में ३ घटी तुल्य चर मान मानने से १५ + ३ = १८, १५ - ३ = १२ को द्विगुणित करने से ३६ घटी परम दिन मान एवं २४ घटी परमाल्प दिन का मान होता है । भूमण्डल के किस अक्षांश पर उक्त स्थिति घटित हो सकती है, गणित के आधार पर इसका ज्ञान आवश्यक है । जहाँ पर तीनों चर खण्डों का योग ३ घटी = १ घण्टा १२ मि० उस देश की पलभा से चर साधन क्रिया से यदि पलभा = ८ अंगुल २६ व्यंगुल तो ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की चर साधन प्रक्रिया से सायन मेषादि सूर्य (प्रायः आजकल २३ मार्च) की पलभा से ८।२६ × १०, ८।२६ × ८, ८।२६ × १०/३ = स्वल्पान्तर से ८४, ६७, २८ अतः ८४ + ६८ + २८ = १८० पल ÷ ६० = ३ घटी चरमान होता है । उज्जयिनी की पलभा = ५।८, उक्त पलभा = ८।२६ दोनों का अन्तर = ३।१८ अर्थात् उज्जैन के अक्षांश २३।१० भूपृष्ठीय किसी भव्य तपोभूमि में उक्त वेदांग ज्योतिष प्रणेता आचार्य लगध ने जन्म लिया था या वहाँ तपस्या की थी । चापीय त्रिभुज गणित से चरज्या = (अक्षांश स्पर्श × क्रान्तिस्पर्श रेखा) / (त्रिज्या = व्यासार्ध) चूंकि चर = ३ और परमक्रान्ति तुल्य दिन में परम क्रान्ति प्राचीन गणितज्ञों के मत से = २४° अतः सूक्ष्म गणित साधन प्रक्रिया से अक्षांश मान = ३४.४५ सिद्ध होते हैं । फलतः इस गणित से अनुमानतः महात्मा लगध को हिमालय के 'कश्मीर व कैलास या बदरिकाश्रम की गुफाओं में इस ज्ञान की उपलब्धि हुई होगी । वेदांग ज्योतिष में मुहूर्त्त आदि ज्ञान के लिए वेध से समय ज्ञान का प्रकार ४२वें श्लोक में स्पष्ट है । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कथन से यह तो ज्ञात होता ही है कि आचार्य लगध हिमालय की गुफा में तप करते थे; साथ ही यह सम्भव है कि महात्मा लगध अमरनाथ काश्मीर या बद्रिकाश्रम के ज्योतिषपीठ में तप करते हुए ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान भी प्रसारित करते रहे होंगे ? अर्थात् इस प्रकार से वर्त्तमान भारत का शिरोभाग सुदूर कश्मीर से भी उत्तर में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना का स्थान सिद्ध होता है । इससे यह भी फलित होता है कि प्राचीन भारतवर्ष की सीमा वर्त्तमान भारत की सीमा से और आगे उत्तर पश्चिम तक व्याप्त थी । वेदाङ्ग ज्योतिष प्रणेता के अनुसार ५ वर्ष के एक युग की मान्यता से ५ युग में उत्तरायण + दक्षिणायन = १० होती है । एक अयन से दूसरे अयन तक की दिन संख्या चान्द्रवर्ष सम्बन्धी दिन संख्याओं का अर्द्ध भाग होता है । अर्थात् एक चान्द्रवर्षीय चान्द्र-

( ६८ ) दिन संख्या = ३७२ का आधा = ३७२ ÷ २ = १८६, तिथियाँ होंगी । १८६ ÷ ३० = ६ चान्द्र महीने + ६ तिथियाँ होती हैं । प्रथमयन की तिथि में ६ जोड़ देने से द्वितीय- अयन तिथि का मान = ६ + १ + ६... = १।७।१३।१ ९।२५।१।७।१३।१ ९।२५ तिथियों में दूसरी अयन तिथि होगी, यह स्पष्ट है । माघशुक्ल प्रतिपद को प्रथम अयनारम्भ होने से १८६ + १ = १८७ ÷ ३० = ७ अर्थात् श्रावण शुक्ल सप्तमी को द्वितीय अयनारम्भ होना स्पष्ट है । इसी प्रकार तीसरा अयनारम्भ माघ शुक्ल त्रयोदशी को हो तो १८६ + १३ = १९९ ÷ ३० = शेष १९।१९-१५ = ४ अतः श्रावणकृष्ण चतुर्थी को द्वितीय अयन होना सिद्ध होता है । प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदश । चतुर्थं दशमं चैव द्वियुग्माद्यं बहुलेऽप्यतो... इस प्रकार वेदाङ्ग सम्मत वर्त्तमान पञ्चाङ्ग प्रणाली पर उक्त युक्ति कितनी घटित हो रही है ? —इसपर पाठक स्वयं विचार करेंगे । आर्यभट्ट—वेदाङ्ग ज्योतिष के बाद “आर्यभट्ट” का ग्रहगणित का “आर्यभटीय” पौरुषेय ग्रन्थ उपलब्ध है । २३ वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् वर्ष ४२१ (ईस्वी सन् ४९९) में आर्यभट्ट ने ज्योतिष सिद्धान्त के ‘आर्यभटीय’ ग्रन्थ की रचना कर ली थी । आर्यभटीय में वर्गमूल व घनमूल आदि अंकगणित की प्रक्रिया सर्वांश सूक्ष्म मिलती है । ‘पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है’’, यह बात सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही कही । आर्यभट्ट के परवर्त्ती गणित आचार्यों में ‘लल्ल’, ‘ब्रह्मगुप्त’, ‘वराहमिहिर’ आदि आचार्य प्रमुख हैं । इन परवर्त्ती आचार्यों ने आर्यभट्ट के उक्त भू-भ्रमण मत का खण्डन तो नहीं किया, किन्तु स्पष्टतया समर्थन वाक्य भी उपलब्ध नहीं होते हैं । हाँ, “ग्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है—” यह बात प्राचीन आचार्यों की बुद्धि में भी स्थिर थी । खगोलज्ञ आर्यभट्ट के वैशिष्ट्य सूचक स्मारक रूप में आज भी पटना के अति समीप या पटना से लगा हुआ एक गाँव है, जिसका नाम ‘खगोल’ ग्राम है । पुष्पपुर पटना के नालन्दा जैसे शिक्षा केन्द्र में रहते हुए आर्यभट्ट का इकाई से अरबों खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने आप में, अद्भुत कल्पना वैचित्र्य की द्योतक है । “क वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङ मौ यः ख द्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥” संक्षेप रूप में आर्यभटीय अंक संकेत निम्न प्रकार हैं— क् + अ = क = १, ख = २, ग = ३, घ = ४, ङ = ५, च = ६, ञ = १०, ट = ११, ण = १५, त = १६, न = २०, प = २१, म = २५, ङ और म इमो ५ + २५ =

( ६९ ) ३०, इसी प्रकार य = ३०, र = ४०, ल = ५०, व = ६०, श = ७०, ष = ८०, स = ९०, ह = १०० (९) नौ स्वरों अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ को, वर्ग और अवर्गाक्षर में संयुक्त करके इकाई, दहाई आदि १८ स्थान द्योतक अंकों की स्थितियों का परिचायक बताया है । जैसे—क् + अ = क = १, क् + इ = कि = १००, कु = १०००० एवम् क् + औ = कौ = १,००००००००००००००० इसी प्रकार, ख् + अ = ख = २, खि = २०, एवं य = ३०, यि = ३०००, यु = ३००००० । इन अंक संकेतों से पृथ्वी द्वारा सूर्य चतुर्दिक भ्रमण करने से एक युग सम्बन्धी रवि भगण संख्या स्पष्ट होती हैं—"युगरविभगणाः ख्युघृः" । खु = २००००, यु = ३०००००, घृ = ४०००००० इनका योग = खु २०००० यु ३००००० घृ ४०००००० ——————— ४३२०००० इस प्रकार आर्यभट्ट के, सूर्य सिद्धान्तानुसार 'युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्कशरार्णवाः' अर्थात् आर्यभट्ट के ४३२०००० के तुल्य हो जाते हैं । आर्यभट्ट के तन्त्र ग्रन्थानुसार बने पञ्चाङ्ग दाक्षिणात्य प्रदेश में आज भी प्रचलित एवं सूक्ष्म माने जाते हैं । यद्यपि परवर्ती आचार्यों में ब्रह्मगुप्त प्रभृतियों से भले ही सहमति न हो किन्तु नक्षत्रभ्रमणवत् पृथिवी की सूर्य के चारों ओर भ्रमणशीलता की दैनन्दिनीय गति का ज्ञान में आर्यभट्ट ही प्रथम खगोलज्ञ हुए हैं । अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगः यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥ आर्यभट्ट ने ग्रहों के भगण मानों में नक्षत्रभ्रम न लिखकर भूभ्रम ही लिखा भी है । "प्राणेनैति कला भूः" अर्थात् ('षड्भिः प्राणै पलम्') १ पल के षष्ठांश में एक विकला चलती है स्पष्ट कहा भी है । अहोरात्र में ६० × ६० × ६ = २१६०० 'एक विंशति सहस्राणि, षट् शतानि च' पुराणोक्त प्रमाण सञ्चार भी इसी अभिप्राय से समीचीन हो जाता है । उक्त प्रकार के अङ्क संकेतों से अनुमान होता है कि आर्यभट्ट ने किसी यवन ज्योतिर्विद पण्डित के माध्यम से सूर्यादि ग्रहों के भगण प्राप्त किये होंगे । किन्तु इतना तो निश्चित है कि आर्यभट्ट की अंक कल्पना अपूर्व होने के साथ-साथ विचारणीय है ।

( ७० ) लल्लाचार्य शके ४२१ (ईसवी सन् ४९९) शाम्ब पौत्र भट्टत्रिविक्रम पुत्र लल्लाचार्य ने शिष्य- धीवृद्धिद ग्रहगणित तन्त्र ग्रन्थ की रचना की है। (आर्यभटीय तन्त्र टीका भट्ट दीपिका- कार परमेश्वर के मतानुसार)— “••••आचार्य भटोदितं सुविषमं व्योमोकसां कर्म— यच्छिष्याणामभिधीयते तदधुना लल्लेन धीवृद्धिदम् । विज्ञाय शास्त्रममलार्यभटप्रणीतं तन्त्राणि यद्यपि कृतानि तदीयशिष्यैः कर्मक्रमो न खलु सम्यगुदीरितस्तै कर्म ब्रवीम्यहमतः क्रमशस्तु सूक्तम् ।” लल्लाचार्य ने ‘शिष्यधीवृद्धि’ ग्रन्थ रचना का कारण बताते हुए स्वयम् को आर्यभट्ट का शिष्य कहा है । किन्तु शके १०३६ (ई० १११४) के ग्रहगणक सार्वभौम आचार्य भास्कराचार्य ने आर्यभटस्य शिष्याः प्रभाकराद्य••••कहा है । इससे ज्ञात होता कि आर्यभट्ट के और भी शिष्य रहे होंगे । विजय, नन्दि, प्रद्यम्न, श्री सेन, लाट आदि को भी आर्यभट्ट का शिष्य कहा जाता है । लल्लाचार्य की भूपरिधि क्षेत्रफलादि गणित साधन की स्थूलता पर श्री भास्कराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में आपत्ति की है तथा साथ ही गोलफल साधन की सूक्ष्म प्रक्रिया भी बतलाई है । चन्द्रशृङ्गोन्नति साधन में लल्लाचार्य ने चमत्कारिक गणित किया है, जो प्रत्यक्ष रूप से ठीक दीखता है । किन्तु शृङ्गोन्नति गणित साधन प्रक्रियानिश्चय ही त्रुटिपूर्ण है, जिसपर भास्कराचार्य ने बहुत कुछ कह दिया है । वराह या वराहमिहिर या वराहमिहर अलविरूनी [Albiruni] के अनुसार शके ४२७ ईसवी सन् ५०५ कम्पिल्लक, वर्तमान कालपी नगर में सूर्य देवता के परम उपासक श्री आदित्यदास के सुपुत्र श्री वराह ने जन्म लिया था । अने पिता से ज्योतिष विद्या प्राप्त कर ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन किया । इस गहन अध्ययन और मनन चिन्तन के फलस्वरूप अवन्ती सम्राट से समादरित होकर वराहमिहिर ने लघुजातक, बृहज्जातक, विवाह पटल, बृहत्सं- हिता, योग यात्रा और पञ्चसिद्धान्तिका ग्रन्थों की रचना की । कुछ ऐतिहासिकों के मतानुसार वराह मगध द्विज थे । इस सन्दर्भ में विद्वानों का मत है कि अपने पिता से आर्यभटीय प्रभृति ग्रन्थों का अध्ययन करने के बाद आजीविका प्राप्ति के लिए वराह

( ७१ ) मगध से अवन्ती आये जहाँ राज्याभूषित वीर विक्रम की राजधानी में वराह समाद- रित हुए। यवन देशीय विद्वानों से वराह का सम्पर्क हो चुका था। वराहाचार्य ने यवनों की विशेष संस्तुति भी की है। जैसा कि पहले भी कह आए हैं—"म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम्।" "बृहज्जातक" में मेषादि द्वादश राशियों तथा अन्य स्थलों के योगादिकों में क्रिय, तावुरि, जितुम, लेय, प्राथोन, द्यूक या जूक, कौर्प्य, तौक्षिक, आकोकेर, हृद्रग, इत्थम्, हेलि, हिमन, कोण, आस्फुजित् होरा, अनफा, सुनफा दुरुधरा, केमद्रुम, वेशि, पणकर, हिबुक द्यूनम्, द्यूतम् कुलीर और त्रिकोण इत्यादि अनेक यवनों अर्थात् ग्रीक भाषा के शब्दाचार्यों के नाम क्रम वराह ने प्रस्तुत किये हैं। इस सन्दर्भ में विशेष जानकारी हेतु बेबर [weber] के ग्रन्थ—Cmdische Leteratur Cls chichte, Page No. २२७ को सम्यक् रूप के देखा जा सकता है। अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि वराह की अन्तिम ग्रंथ-रचना "बृहत्संहिता" है। 'बृहज्जातक' ग्रन्थ पर भट्टोत्पल महादेव, महीधर, केरली टीका के उपरान्त अनेक आचार्यों ने तत्समय में टीका रची है। 'बृहज्जातक' में मय, यवन मणित्थ, शक्ति, विष्णुगुप्त, देवस्वामी, सिद्धसेन, जीवशर्मा, सत्याचार्य आदि आचार्यों के नाम वरा हाचार्य ने स्वयं दिये हैं। वराहाचार्य के 'पञ्चसिद्धान्तिका' के पन्द्रहवें अध्याय के बीसवें श्लोक में लङ्का की अर्द्धरात्रि तथा लङ्का के सूर्योदय समय में दिनप्रवृत्ति का उल्लेख आर्यभट्ट के अनुसार किया है। "लङ्कार्धरात्रसमय दिनप्रवृत्तिं जगाद आर्यभट्टः भूयः स एव सूर्योदयात् प्रभृत्याह लङ्कायाम् ।" इस प्रकार वाराहाचार्य ने दिन प्रवृत्ति के दोमत व्यक्त किये हैं। किन्तु आर्यभटीय तन्त्र में सूर्योदय से ही दिन प्रवृत्ति का समय कहा गया है। वराहाचार्य की 'पञ्च- सिद्धान्तिका' अवश्य ही ग्रहगणितज्ञों के लिए विशेष समादरणीय है। किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि वराह का स्थान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों (सिद्धान्त, संहिता, होरा) में अप्रतिम पाण्डित्य आजतक अपने स्थान की इकाई पर ही हैं। ब्रह्मगुप्त शक ५२० (ई० सन् ५९८) बघेलवंशीय व्याघ्रमुख राजा के शासन काल में विष्णुधर्मोत्तर पुराणान्तर्गत् ब्रह्मसिद्धान्त के अनुसार चापवंशीय जीष्णुगुप्त के पुत्र ने ३० वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् ५५० (ई० सन् ६२८) में ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, एवं खण्ड-

( ७२ ) खाद्य नामक करण ग्रन्थ की रचना की थी । ब्रह्मगुप्त के पौत्र एवं विष्णुगुप्त के पुत्र होने के कारण वैश्य जाति के समझे जाते हैं । भास्कराचार्य के 'ब्रह्माह्वयश्रीधरपद्मनाभ बीजानि यस्मादति विस्तृतानि' से ज्ञात होता हैं कि ब्रह्मगुप्त का भी कोई बीजगणित नाम का ग्रन्थ था । जिसका इङ्गलिश अनुवाद ईसवी १८१७ में कोलब्रुक साहब ने किया है। इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के १२ वें अध्याय, ब्रह्मगुप्त के व्यक्त अंकगणित और भास्कराचार्य की पाटी अंकगणित एवं बीजगणित का अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध हैं । भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्त शिरोमणि के प्रारम्भ में लिखा है— “कृती जयति जिष्णुजो गणकचक्रचूडामणि- र्जयन्ति ललितोक्तयः प्रथिततन्त्रसद्युक्तयः । वराहमिहिरादयः समवलोक्य एषां कृतीः कृती भवतो मादृशोऽप्यतनु तन्त्रबन्धोऽवधीः ॥” इस प्रकार भास्कराचार्य ने गणकचक्रचूडामणि शब्द से ब्रह्मगुप्त के साथ आचार्य वराह की भी स्तुति की है । ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त पर चतुर्वेदाचार्य पृथूदक स्वामी की वासनाभाष्य नाम की टीका प्रसिद्ध है । ब्रह्मगुप्त स्वयम् नलिकावेध से ग्रह- गणित को प्रामाणिक मानते हैं । उदाहरणार्थ निम्न श्लोक इस बात का स्पष्टीकरण है— “ब्रह्मोक्तं ग्रहगणितं महत्ता कालेन यत्खिलीभूतम्, अभिधीयते स्फुटं तज्जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन । संसाध्य स्पष्टतरं बीजं नलिकादियन्त्रेण, तत्संस्कृतग्रहेभ्यः कर्त्तव्यो निर्णयादेशौ ॥” निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि अपने समय से आज तक के गणिताचार्यों में आचार्य ब्रह्मगुप्त गणित गोल धरातल में ऐतिहासिक खगोलज्ञ हुए हैं। मुञ्जाल का लघुमानस करण श्री मुञ्जाल ने शक ५८४ (ई० सन् ६६२) में 'लघुमानस' नामक करण ग्रन्थ की रचना की । प्रस्तुत ग्रन्थ में ग्रहों के ध्रुवक साधन कर वहाँ से इष्ट समय तक का अहर्गण से साधित ग्रह में ध्रुवक संस्कार से इष्टदिन के ग्रहों का संसाधन किया है । भास्कराचार्य ने अपने “सिद्धान्तशिरोमणि” में अयन चलन के सन्दर्भ में 'मुञ्जाल' का उल्लेख किया है— “अयन चलनं यदुक्तं मुञ्जालाद्यैः स एवायम् ।” मुञ्जाल के मत से ४३४ शक में, अयनांश का अभाव ज्ञात होता है ।

( ७३ ) श्रीपति या "श्रीपतिभट्ट" श्रीपति भट्ट का समय शके ९२१ (ई० सन् ९९९) में रहा है। श्रीपति भट्ट ने वर्तमान समय में अनुपलब्ध पाटी गणित, बीजगणित और सिद्धान्त शेखर नामक ग्रन्थों की रचना की है। इनका ज्योतिष के तीनों स्कन्धों में अप्रतिम पाण्डित्य है। फलित ज्योतिष में भी श्रीपति पद्धति, रत्नावलि, रत्नसार, रत्नमाला, धीकोटि नामक ग्रन्थ रहे हैं। ज्योतिष-फलित रत्नमाला ग्रन्थ की शैली सर्वोत्तम है। व्यापक पाण्डित्य के साथ- साथ श्रीपति भट्ट की कृतियों से उनके शील सौजन्य का परिचय प्राप्त होता है। प्रथम भास्कर यद्यपि प्रथम भास्कर का जन्म, समय, स्थान आदि का ज्ञान नहीं हो पाया है, सन् १९६० ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय से लघुभास्करीय-महाभास्करीय के अंग्रेजी अनुवाद से प्रथम भास्कर के सिद्धान्त विषयक ज्ञान ग्रन्थों में इनका उल्लेखनीय पाण्डित्य प्रतीत होता है और जो सिद्धान्त शिरोमणि प्रणेता भास्कराचार्य से भिन्न और पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं। अत एव ऐतिहासिक विचार परम्परा से भास्कर नाम के दो आचार्यों में प्रथम का नाम केवल भास्कर है और द्वितीय का नाम भी "भास्कर" की अपेक्षा भास्कराचार्य विशेष प्रसिद्ध हुआ है। भूमण्डल की भारतभूमि में भास्करावतार 'भास्कराचार्य' शके १०३६ (ई० सन् १११४) में सह्य पर्वत के समीप शाण्डिल्य गोत्र में विज्ज- डविड (आधुनिक बीजापुर) में श्रीमान् १०८ श्री महेश्वर उपाध्याय के पुत्र भास्करा- चार्य का जन्म हुआ। भास्कराचार्य रचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ, में स्वयं श्री भास्कराचार्य ने विष्णु- धर्मोत्तर पुराण को आगम कहा है। वासुदेव सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नाम की मूर्ति भेदों की चर्चा से अनुमान होता है कि श्रीमद्भास्कराचार्य वैष्णव सम्प्रदाय के अनु- यायी थे। इन्होंने अंकगणित में लीलावती, बीजगणित में बीजगणित, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय, सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय एवं करण ग्रन्थों में करण कुतूहल नामक ग्रन्थ की रचना की है। सभी ग्रन्थ उपलब्ध हैं। सिद्धान्त शिरोमणि के ग्रहों को ब्रह्मसिद्धान्त के तुल्य मानते हुए स्वयम् भास्कराचार्य ने स्पष्ट कहा है— "यथात्र ग्रन्थे ब्रह्मगुप्तागमः स्वीकृतः।" ग्रहगणित ज्योतिष में भास्कराचार्य एक अप्रतिम, अनुपम चमत्कारिक खगोल वेत्ता होते हुए एवं सर्वशास्त्रज्ञ ऐतिहासिक विद्वान् हुए हैं। भास्कराचार्य के गणिताध्याय के प्रथम श्लोक के वार्तिककार नृसिंह दैवज्ञ ने स्वयं लिखा है, जिसका अनुवाद रूप प्रस्तुत है—

( ७४ ) "मुनिश्रेष्ठ शाण्डिल्य गोत्रावतंस, कुम्भोद्भवालङ्कृत, दिगङ्गनाओं का भूषणसर्वस्व, सह्यकुलाचलाश्रित विज्जडविड नगर निवासी पवित्रितदण्डकारण्य, अनेक यज्ञाजित पुण्य श्लोक, याज्ञिकों का अग्रणी, यजुः शाखियों का उपाध्याय, सांवत्सरिकों का आचार्य, काव्यनाटकालंकार वेत्ताओं का अध्यापयिता, श्रीवृद्धिद का उपायकारक, ब्रह्मवसिष्ठ गणित तुल्य सर्वतोभद्रादि यन्त्र निर्माता, महाराष्ट्रीयों का आश्रयदाता, महेश्वराचार्य का नन्दन (पुत्र) परमकारुणिक, श्रीधर ब्रह्मगुप्त, लल्ल, चतुर्वेदाचार्य निर्मित अपार गणितसागर-सार विचार से परिपूर्ण श्री भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थारम्भ कर रहे हैं ।'' इत्यादि से आचार्य भास्कर की स्तुति की गई है । वस्तुतः लीलावती में चतुर्भुज क्षेत्र गणित का नियतत्व, वृत्त पृष्ठ घनफल साधन श्रेढ़ी गणित में गुणोत्तर श्रेढ़ी का सर्वफल साधन, एकाद्वित्र्यादि मूषावहन, अंकपाश गणित, बीजगणित में अवगद्धि का मूल्यज्ञापन, योगात्तरादि साधन, कुट्टक वर्गप्रकृति जैसे अलौकिक गणितज्ञान, एकवर्ण समीकरण में प्रश्नसाधन की अद्भुत कल्पना, अनेक वर्ण समीकरण में कल्पना लाघव, वर्ण समीकरण में दो प्रकार का मान साधन, पद्मनाभादि बीजगणित में दोष दर्शन, भावित गणित में चमत्कार

( ७५ ) श्वर, कमलाकर भट्ट, जगन्नाथ, बापूदेव शास्त्री एवं सुधाकर द्विवेदी आदि प्रमुख ज्योतिष जगत की विभूतियाँ हुईं। इन सबका संक्षिप्त इतिवृत्त नीचे दिया जा रहा है— महादेव—शके १२३८ (ई० स० १३१६) में पितामह आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य की सिद्धांत शिरोमणि के आधार पर महादेव ने लाघव प्रकार से ग्रहसाधन 'महादेव सारणी' निर्मित की है। इसी सारणी की आकृति रूप 'महादेवी' नाम की अन्य सारणी मदनसूरि शिष्य, मलयेन्दुसूरि का गुरु, फिरोजशाह तुगलक नामक यवन बादशाह के प्रधान सभा पण्डित नृसिंह दैवज्ञ ने १४८० (ई० सन् १५५८) में उत्तर-दक्षिण ध्रुव द्वय दृष्टि से विषुवद्वृत्त के धरातलीय भू पृष्ठ पर सभी वृत्तों को परिणामित कर 'यन्त्रराज' नामक यन्त्र और ग्रन्थ की रचना की है। इन्हीं के शिष्य मलयेन्दुसूरि ने उदाहरण स्वरूप टीका लिखी है। इस ग्रन्थ में ५४ विकला अयनांश गति मानी गई है, जो प्रायः सूर्य सिद्धान्त से मिलती है। यह ग्रन्थ पारसीक भाषा के ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद प्रतीत होता है। श्री महादेव—श्री महादेव गोदातीर त्र्यम्बक नामक राजा की राजसभा के प्रधान पण्डित थे। ब्रह्मसिद्धान्त और आर्यभट्ट के अनुसार शक १२७९ (ई० सन्-१३५७) में 'कामधेनु' नामक ग्रन्थ की रचना की है। श्री गङ्गाधर—विन्ध्याचल के दक्षिण सगर नगर निवासी चन्द्रभट्ट के पुत्र श्री गङ्गाधर ने शके १३५६ (ई० सन् १४३४) में वर्त्तमान प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के अनुसार 'चान्द्रमानाभिधान' नामक ग्रन्थ रचना की है। श्री मकरन्द—शके १४०० (ई० सन् १४७८) में सूर्य सिद्धान्त गणित के अनुसार पञ्चाङ्ग साधनोपयोग ग्रन्थ की रचना अपने ही नाम से 'श्री मकरन्द सारणी' की रचना की है। मकरन्द सारणी प्रायः उत्तर भारत में सर्वत्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुई है। श्री केशव—शके १३७८ (ई० सन् १४५६) में कौशिक गोत्रीय श्री कमलाकर के पुत्र, श्री वैद्यनाथ के शिष्य और प्रसिद्ध गणेश दैवज्ञ के पिता का नाम श्री केशव दैवज्ञ है। पश्चिम समुद्र तटवर्ती नन्दिग्राम में इनका जन्म हुआ था। इनकी अनेक ग्रन्थ रच- नाओं में, ग्रहकौतुक, वर्षग्रहसिद्धि, तिथिसिद्धि, जातक पद्धति, जातक पद्धति विवृत्ति, ताजक पद्धति, सिद्धान्त वासना पाठ, मुहूर्त्त तत्व, कुण्डाष्टक लक्षण, गणित दीपिका और कायस्थादि धर्म पद्धति विशेष प्रसिद्ध हैं। लक्ष्मीदास—उपमन्यु गोत्रीय श्री केशव पौत्र लक्ष्मीदास शके १४४२ (ई० सन् १५२०) में श्री भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ की उदाहरण सहित के टीकाकार हुए हैं। ज्ञानराज—ज्ञानराज ने शके १४२५ (ई० सन् १५०३) में 'सिद्धान्त कुमार' नामक ग्रहगणितीय ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की है। इनमें स्थल विशेष पर पुराणमत समर्थन के साथ भास्कराचार्य-मत का खण्डन भी मिलता है।

( ७६ ) ज्ञानराज ने भास्कराचार्य के शिरोमणि ग्रन्थ का खण्डन, “चन्द्रविम्ब सूर्य किरण सम्बन्ध से दृश्य नहीं होता”—इस तरह किया है। इस प्रकार ज्ञानराज भास्कराचार्य के शुक्लाङ्गल साधन के अवसर पर “तरणि किरणसङ्गादेषपीयूषपिण्डो” सूर्याभिमुख चन्द्रविम्ब उज्जवल एवं विपरीत में कृष्ण से शुक्लाशुक्ल चन्द्रविम्ब को दृश्यादृश्य बिम्ब सम्पात जन्य शृङ्गाकृति जैसे सूक्ष्म गणित सिद्धान्त इत्यादि का खण्डन किया है । श्री गणेश—उक्त खगोल गणितज्ञ आचार्यों की परम्परा में प्रकृत श्री गणेश के पिता व गुरु केशव माता लक्ष्मी के गर्भ में श्री भगवान गणेश के अवतार स्वरूप गणेश दैवज्ञ का जन्म शके १४२९ (ई० सम् १५०७) में हुआ । गणेश ने अपनी तेरह वर्ष की छोटी अवस्था में ही ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की रचना कर ली थी। वह चिरात जनश्रुति प्रसिद्ध है। ग्रहलाघव करण ग्रन्थ के आरम्भ में शक १४४२ से अहर्गण साधन किया है, जिससे १४४२-१४२९ = १३ वर्ष ज्ञात होता है। ग्रहलाघव ग्रन्थ के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि लम्बे-चौड़े अरबों संख्या के अङ्कों का अपवर्तनाङ्क समझ कर उनके स्थान पर छोटे अपवर्तित अंकों के माध्यम से, तथा ज्याचाप की क्लिष्ट गणित पद्धति के स्थान पर सर्वसुलभ लघु प्रणाली का प्रचलन के कारण से इस ग्रहसाधन ग्रन्थ की ‘ग्रहलाघव’ संज्ञा हुई है । आचार्य गणेश ने—ग्रहलाघव, लघुतिथि चिन्तामणि, {वृहत्तिथि चिन्तामणि, सिद्धान्त शिरोमणि टीका, लीलावती टीका, विवाह वृन्दावन टीका, मुहूर्त्त तत्त्व टीका, श्राद्धादि- निर्णय, छन्दोर्णव टीका, सुधीरञ्जनी, तर्जनीयन्त्रम्, कृष्ण जन्माष्टमी निर्णय, होलिका निर्णय इत्यादि अनेक ग्रन्थ रचना से ज्योतिष-शास्त्र का भण्डार भरा है। ज्योतिष शास्त्र के प्रगल्भ पाण्डित्य विशेष के साथ-साथ आचार्य गणेश की अन्य रचनाओं से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि श्री गणेश में काव्य साहित्यादि का पूर्ण एवं व्यापक पाण्डित्य है । बृहत्तिथ्यादि में स्वयं आचार्य गणेश का कथन उल्लेख्य है — ब्रह्माचार्यवसिष्ठकश्यपमुखैर्यत्खेटकर्मोदितं तत् तात्कालजमेव तत्तमथ तद्भूरिक्षणेऽभूच्छ्लथम्, प्रपातोऽथ मयासुर कृतयुगान्तेऽर्कात् स्फुटं तोषितात् । तच्चास्ति स्म कलौ तु सान्तरमथाऽभूच्चारु पाराशरम्, तदज्ञात्वार्यभट्टः खिलं बहुतिथे कालेऽकरोत्स्फुटम् । तत् श्लस्तं किल दुर्गसिंहकिकिहिराद्यैस्तान्निबद्धं स्फुटम् ॥ तच्चाभूच्छिथिलं वु जिष्णुतनयेनेऽकारि वेधात्स्फुटम्, ब्रह्मोक्त्याश्रितमेतदाप्यथ बहो कालेऽभवत् सान्तरम् ॥

( ७७ ) श्री केशवः स्फुटतरं कृतवान् हि सौरा— सन्नमेतदपि षष्टिमिते गतेऽब्दे— दृष्ट्वा श्लथं किमपितत्तनयो गणेश । स्पष्टं यथा ह्यकृत् दृग्गणितैक्यमत्र, कथमपि यदिदं भूरिकाले श्लथं स्यात् । मुहुरपि परिलक्षेन्दूग्ग्रहाद्युक्षयोग्यम्, सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः । कथितसदुपपत्त्या शुद्धि केन्द्रे प्रचाल्ये ॥ वाराहाचार्य ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका में १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ, ४—सौर एवं ५—पैतामह इन पाँचों में सूर्य सिद्धान्त का गणित "स्पष्टतरः” सविता से सूक्ष्म कहा है। तदुपरि के आचार्यों ने सौर सिद्धान्त की अपेक्षा आर्यभट्ट का गणित अधिक सूक्ष्म माना । कालान्तर में आर्यभट्ट का ग्रहगणित स्थूल हो जाने से ब्रह्म- गुप्त का वेधसिद्ध ग्रहगणित सूक्ष्म हुआ । किन्तु बहुकालान्तर में ब्रह्मगुप्त की स्थूलता को समझ कर श्री केशवाचार्य ने सौर एवं आर्य-सिद्धान्त के समीप का वेधसिद्ध ग्रहगणित स्वीकार किया है। इस उत्तरोत्तर गणित-सूक्ष्मता प्राप्ति के लिए आचार्य गणेश ने स्पष्ट दृग्गणितैक्य सिद्ध ग्रहगणित साधन पद्धति से भारतीय ज्योतिष को समुज्ज्वल किया है । इस सन्दर्भ में आचार्य गणेश का मत स्पष्ट है—"इस प्रकार के गणित के स्थूल भय को दूर करने के लिये सूर्यचन्द्रग्रहणादि प्रत्यक्ष दृगयोग्यता सम्पादनार्थं समय-समय पर वेधादि विचार से उत्पन्न त्रुटियाँ दूर करते हुए प्रश्न का समाधान करते रहना चाहिए। अर्थात् सूक्ष्मता प्राप्ति हेतु ग्रहों में संस्कारान्तर स्वीकृत करने चाहिए" इत्यादि स्पष्ट भी कहा है। सम्प्रति यह आशा की जा सकती है कि वर्तमान दृश्य एवं अदृश्य पञ्चाङ्गों का भयंकर विवाद उक्त प्रमाणों से समाप्त हो जा सकेगा । श्री विष्णु दैवज्ञ — शक १४७८ (ई० सन् १५५६) में दिवाकर दैवज्ञ के पुत्र, कृष्ण दैवज्ञ के अनुज श्री विष्णु दैवज्ञ ने सौरपक्षीय करण ग्रन्थ की रचना शके १५३० में की है, जिस पर उन्हीं के भाई श्री विश्वनाथ दैवज्ञ ने शके १५४५ में उदाहरण द्वारा गणित किया है। श्री सूर्य—शके १४६३ (ई० सन् १५४१) में आचार्य भास्कर की लीलावती की टीका श्री सूर्य ने गणितामृत भूमिका नाम से की है। कृष्ण दैवज्ञ—कृष्ण दैवज्ञ यवन बादशाह जहाँगीर के प्रधान सभापण्डित थे । इनके पिता का नाम श्री वल्लभ तथा माता का नाम गोजि था । इन्होंने "नवाङ्कुर" नाम की श्रीमद्भास्कराचार्य की बीजगणित पर टीका रची है ।

( ७८ ) रघुनाथ शर्मा—ओमभटात्मज श्री रघुनाथ शर्मा ने शके १४८७ (ई० सन् १५६५) में भास्कराचार्य और सूर्यसिद्धान्त मत से 'मणिप्रदीप' नामक करण ग्रन्थ की रचना की है । श्री मल्लारि—शके १४९३ (ई० सन् १५७१) में श्री दिवाकर दैवज्ञ के पुत्रों में श्री कृष्ण एवं विष्णु दैवज्ञ से मल्लारि छोटे थे । अपने पिता दिवाकर दैवज्ञ से ज्योतिष- शास्त्र का सम्यक् अध्ययन किया था। श्री गणेश दैवज्ञ कृत 'ग्रहलाघव' करण ग्रन्थ की टीका श्री मल्लारि ने अत्यन्त शुद्ध एवं सूक्ष्म गणित साधिका उपपत्ति के साथ की है । श्री गणेण दैवज्ञ के समान ही गणित गोल वैदुष्य की असाधारण प्रतिभा के साथ श्री मल्लारि में भी काव्य-साहित्य का प्रौढ़ पाण्डित्य और गणित की सूक्ष्मता स्पष्ट परिलक्षित है । मल्लारि ने ग्रहलाघव की उपपत्ति में यत्र-तत्र-सर्वत्र अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों के उदा- हरण की अपेक्षा श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के उद्धरणों का विशेष रूप से उल्लेख किया है । श्री रङ्गनाथ—श्री रङ्गनाथ का शके १४९५ (ई० सन् १५७३) में श्री काशी में जन्म हुआ । इनके पिता का नाम श्री दैवज्ञ तथा माता का नाम गोजि था । कृष्ण दैवज्ञ के अनुज तथा सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य रचयिता श्री मुनीश्वर के पिता श्री रङ्गनाथ हैं। इन्होंने शके १५२५ में सूर्यसिद्धान्त का सौरभाष्य 'गूढार्थप्रकाशिका' नाम से रचा है। रङ्गनाथ के समय यूरोपीय लोगों का भारत के साथ व्यापार वृद्धिगत हो चुका था। जैसा कि श्री रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त के गोलाध्याय के यन्त्राधिकार के २२वें श्लोक की टीका में स्पष्ट लिखा है— “पारदाम्बुसूत्राणि शुल्बतैलजलानि च। बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभा ॥” एवं २२ श्लोक की टीका में—“इयं स्वयंवहविद्या समुद्रान्तरनिवासिजनैः फिरंगाख्यैः सम्यगभ्यस्तेति ॥” श्री रङ्गनाथ के उक्त स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय यूरोपीय लोगों का भारत में गमनागमन बाहुल्य हो चुका था। सूर्यसिद्धान्त की रङ्गनाथकृत उप- पत्तियों में प्रायः श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के सिद्धान्त की बहुलता से उद्धृत हैं । शके १५२५ चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, बुधवार की रात्रि में श्री सूर्योदयादिष्ट घटिका ४२।३० में प्रसव दुःख की असह्य वेदना से पीड़ित पत्नी के दुःख की उद्विग्नता से श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने "दुःख निवृत्त हो" सूर्य-सिद्धान्त की व्याख्या मैं ही लिखूँगा ।''''ऐसी प्रतिज्ञा की ही थी कि उसी क्षण ग्रहगणित गोलज्ञ, सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य-

( ७९ ) कार श्री मुनीश्वर, अपर नाम “विश्वरूप” ने जन्म लिया था । अतएव श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने अपने ग्रन्थ “गूढार्थप्रकाशिका” को मुनीश्वर का सहज (भाई) भी कहा है । रङ्गनाथकृत सौरभाष्य की टिप्पणी में उल्लिखित है— “यत्स्मृत्याभीष्टकार्यस्य निर्विघ्नां सिद्धिमेष्यति- नरस्तं बुद्धिदं वन्दे वक्रतुण्डं शिवोद्भवम् । पितरौ गोजिवल्लालौ जयतोऽम्बाशिवात्मकौ याभ्यां पञ्चसुता जाता ज्योतिःसंसार हेतवः । सार्वभौमजहाँगीरविश्वासस्पद भाषणम् यस्य त भ्रातरं कृष्णं बुधं वन्दे जगद्गुरुम् नाना ग्रन्थान् समालोक्य सूर्यसिद्धान्तटिप्पणम् करोमि रङ्गनाथोऽहम् तद्गूढार्थ प्रकाशकम् ।” और ग्रन्थ समाप्ति पर— “भागीरथी तीर संस्थे शम्भोवारणसी पुरे, बल्लालगणको रुद्रजपासक्तोऽभवद्बुधः । तस्यात्मजापञ्चगुणाभिरामा ज्येष्ठः स रामः सकलागमज्ञः । येनोपपत्तिः स्वधिया नितान्तं प्रकाशिताऽनन्त सुधारकस्य ॥ ततः स कृष्णो जहांगीरसार्वभौमस्य सर्वाधिगतप्रतिष्ठः । श्रीभास्करीयं विवृतं तु येन बीजं तथाश्रीपतिपद्धतिः सा ॥ गोविन्दसंज्ञस्ततस्तृतीयः तस्यानुजोऽहं गुरुलब्धविद्यः, विश्वेशतत्पदनिविष्टचेताः काशी निवासी सकलाभिमान्य- श्रीरङ्गनाथोऽर्कमुखोत्थ शाखे गूढ़प्रकाशाभिधटिप्पणं सः कृत्वा महादेवबुधाग्रजोऽथ विश्वेश्वरायार्पितवान् सुवृद्धये शके तत्त्वतित्थ्युन्मिते चैत्रमासे सिते शम्भुतिथ्यां बुधेऽर्कोदयान्मे दलाब्धद्विनाराद्वनाडीषु यातो मुनीश्वराक्र्कसिद्धान्तगूढ़प्रकाशौ गूढ़प्रकाशकं दृष्ट्वा रङ्गनाथभवं भुवि । मुनीश्वरस्य सहजं लभन्तां गणकाः मुखम् ॥” श्री विश्वनाथ-शके १५०० (ई० स० १५७८) दिवाकर पुत्र, विष्णु कृष्ण मल्लारि से सर्व कनिष्ठ हैं । सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि, नीलकण्ठी, विष्णुकरण ग्रहलाघव मकरन्द और अनन्तसुधार आदिक ग्रन्थों के प्रसिद्ध टीकाकार ज्योतिर्विद् हुए हैं इन्होंने गणित क्रम- दर्शन पूर्वक उदाहरणों के द्वारा उक्त ग्रन्थों को समलंकृत किया है ।

( ८० ) सभी उदाहरणों से इनका प्रखर वैदुष्य स्पष्ट प्रतीत होता हैं। ग्रहलाघव ग्रन्थ के उदाहरणों से तो इनमें असाधारण गोल गणित का पाण्डित्य झलकता है । नृसिंह दैवज्ञ—शके १५०८ ( ईसवी १५८६ ) कृष्ण दैवज्ञ पुत्र दिवाकर दैवज्ञ का पिता, विष्णु दैवज्ञ और मल्लरि पिता के अनुजों से ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के साथ २५ वर्ष आयु में सूर्य सिद्धान्त की सौरभाष्य नाम की और ३५ वर्ष में भास्करीय शिरोमणि टीका वासनावार्तिक नाम की सविशेष टीका रची है । ग्रह वेध करने में प्रवीण थे यन्त्रों में, मयूर यन्त्रब्रह्मचारियंत्र शंख यन्त्र, मेषाज युद्धयन्त्र, शंखवादन यन्त्र, घण्टापटहादिवादन यन्त्र, बानर यन्त्र घटी यन्त्र और अनेक यन्त्रों में हंसादि यन्त्र स्वयंवह गोल यन्त्र आदि बहुत यन्त्रों का उल्लेख किया है । नीलकण्ठ—आचार्य नीलकण्ठ ने शके १५०९ (ई० स० १५८७) में पारसीक एवं अरबीक शब्द मिश्रित ताजकमत के तीन तन्त्रों से 'तांजिक नीलकण्ठी' नामक ग्रन्थ की रचना की । इस ग्रन्थ का उपयोग वर्षफल बनाने मे होता है । उक्त ग्रन्थ के द्वारा आचार्य नीलकण्ठ का ग्रहगणित गोलविषयक पाण्डित्य भी सिद्ध होता है । सुधाकर द्विवेदी के अनुसार इन्होंने 'जातक पद्धति' नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी। रामदैवज्ञ—ये आचार्य नीलकण्ठ के छोटे भाई थे । इन्होंने शक १५५८ में प्रसिद्ध 'मुहूर्त्त चिन्तामणि' ग्रन्थ की रचना की । एक करण ग्रन्थ 'रामविनोद' भी इन्होंने लिखा, इसमें २८० श्लोक हैं । श्रो मुनीश्वर—शके १५२५ (ई० स० १६०३) में सौरभाष्य रचयिता आचाय रंगनाथ दैवज्ञ पुत्र 'मुनीश्वर' जिनका अपरनाम 'विश्वरूप' भी है, उत्पन्न हुये । आचार्य मुनीश्वर के इतिवृत्त के सन्दर्भ में यहाँ विशेष वर्णन आवश्यक समझकर प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ 'सिद्धान्तशिरोमणि' का यह 'मरिचि' भाष्य इन्हीं की ज्योतिष जगत को अति महत्वपूर्ण देन है । 'मरीचितीकाकार' आचार्य मुनीश्वर परम्परा से ज्योतिर्विद्या में पूर्ण मर्मज्ञ थे । बाल्यजीवन से ही उनकी बुद्धि ज्योतिर्विद्या की ओर अग्रे प्रस्फुटित होती थी । इसका एक प्रबल हेतु यह भी है कि मुनीश्वर के पिता श्री रंगनाथ भी ऊँचे स्तर के ग्रहगणितज्ञ हो चुके थे । सूर्य सिद्धान्त पर सर्वप्रथम रंगनाथ कृत सौरभाष्य अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अतएव वंश परम्परा में संस्कार से आचार्य मुनीश्वर की ग्रहगणितगोल में तो असाधारण प्रतिभा होनी ही चाहिये थी साथ ही न्याय, काव्य, व्याकरण, प्रभृति शास्त्रों में भी उनका अशेष पाण्डित्य था । आचार्य मुनीश्वर ने सूर्य सिद्धान्त के भगणों के आधार से शके १५६८ (ई० स० १६४६) में 'सिद्धान्त सार्वभौम' नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ की रचना की । स्वरचित

( ८१ )

ग्रन्थ की स्वाशय प्रकाशिनी नाम की टीका भी स्वयं मुनीश्वर ने लिखी। इसके अलावा आचार्य मुनीश्वर ने निष्ठार्थदूती नाम की लीलावती की टीका, पाटीसार नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ एवं भास्कराचार्य कृत सिद्धान्तशिरोमणि की 'मरीचि' नाम की टीका लिखी। मरीचि भाष्यकार, आचार्य मुनीश्वर भास्कराचार्य के परम भक्त थे, उन्होंने सिद्धान्त सार्वभौम में स्वयं कहा है— "गूढं स्थूलं स्व सिद्धान्तं मत्वा यस्तच्छिरोमणिम्। कृतवान्मनुजव्याजादसौ जयति भास्करः।" 'भास्कराचार्य मनुष्य रूप से अवतरित हैं।' ऐसा उक्त कथन से स्पष्ट है। भास्करा- चार्य के प्रति मुनीश्वर की यह अनुपम भक्ति, ग्रहगोल मर्मज्ञ सिद्धान्त तत्व विवेककार 'भट्ट कमलाकर' को रुचिकर नहीं हुई। जिसका परिणाम यह भी हुआ कि कमलाकर भट्ट के छोटे भाई श्री रंगनाथ ने मुनीश्वर कृत क्षेत्रभङ्गी का कमलाकर की आज्ञा से खण्डन कर दिया। इस खण्डन का भी खण्डन प्रकार मुनीश्वर का उपलब्ध है एवं किंवदन्ती जो सही है कि माघ मेला प्रयाग के कुम्भ के अवसर पर जहाँ भारत दिग्दिगन्त के महामनीषी शास्त्र पारंगतों में शंकराचार्य प्रभृत्ति सभी आचार्यों का समागम होता है, वहीं उसी अव- सर पर आचार्य मुनीश्वर एवं भट्ट कमलाकर में आचार्य भास्कर की 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ के विषय पर-परस्पर दीनों में शास्त्रार्थ खण्डन-मण्डन हुआ। भारतीय खगोल ग्रह गणितशास्त्र के लिए यह घड़ी उत्तम रही। क्योंकि इस शास्त्रार्थ के पश्चात् ही आचार्य मुनीश्वर ने 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ की अनुपम 'मरीचि' टीका लिखी एवं भट्ट कमला- कर ने खगोल ग्रहगणित के बृहद्-आकर ग्रन्थ 'सिद्धान्ततत्वविवेक' की रचना कर भारतीय ज्योतिष को आगे वर्द्धमान किया। सम्भवतः मुनीश्वर एवं कमलाकर भट्ट का उक्त शास्त्रार्थ भास्कराचार्य से आविष्कृत उदयान्तर ग्रह गणित कर्म में हुआ होगा। वस्तुतः भास्कराचार्य से आविष्कृत यह उदयान्तर गणित कर्म अकाट्य है, अखण्डनीय है एवं ग्रह गणित में आचार्य भास्कर की सुसूक्ष्म देन है। 'सिद्धान्तशिरोमणि' की आचार्य मुनीश्वर की 'मरीचि' नाम की तो टीका है, किन्तु प्राचीनों के बहुत मतों के साथ-साथ ग्रहगोल का निःशेष पाण्डित्य और अनेक सूक्ष्म कथनों के साथ अत्यन्त सुन्दर न्याय (तर्क) शास्त्र की सरिणी से 'सिद्धान्तशिरो- मणि' का ऐसा सुन्दर उत्तम भाष्य अभी तक यही 'मरीचि' सिद्ध हुई है। पण्डित परम्परा में 'मरीचि' ने टीका नाम से प्रसिद्धि नहीं पाई है अपि च इस मरीचि टीका ने भी ग्रहगणित गोल का एक ग्रन्थ रूप से अपना नाम सार्थक किया है। मेरे मत से, आचार्य मुनीश्वर कृत 'सिद्धान्तशिरोमणि' की 'मरीचि' टीका जो विशेष प्रसिद्धि पा चुकी है वह ग्रहगणित का अशेष पाण्डित्य सूचक एक सर्वोत्तम ग्रहगोल भाष्य कहा जाना चाहिये। ६

( ८२ ) भास्कराचार्य कृत 'सिद्धांतशिरोमणि' ग्रन्थ की आचार्य मुनीश्वर द्वारा 'मरीचि' टीका अद्वितीय रही है। इसके अतिरिक्त भी अन्य टीकायें हुई परन्तु मुनीश्वर कृत 'मरीचि' भाष्य ग्रहगोल गणित का एक अद्वितीय भाष्य है जो अभी तक इकाई स्थानीय है। गुरूणां गुरु महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने आचार्य मुनीश्वर के 'मरीचि' भाष्य के सन्दर्भ में अपना निम्न मत दिया है—" 'सिद्धान्तशिरोमणि की पदार्थ प्रकाशिका 'मरीचि' टीका के सदृश्य और टीकायें नहीं देखी गई हैं। मरीचि में बहुत से प्राचीनों की उक्तियां देखने योग्य हैं। इसलिए सभी ज्योतिर्विेताओं ने इसका आदर किया है।" मुनीश्वर कृत 'मीरचि' भाष्य के देखने और मनन करने से यह स्पष्ट होता है कि निसंशय आचार्य मुनीश्वर में सर्वशास्त्रों की असाधारण प्रतिभा थी। उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के गहन सागर में सानन्द गोता लगाकर अनेक रत्न समूहों की प्राप्तिकर ली थी तथा वे अपार गणितार्णव के उभय पार्श्वदर्शी हो चुके थे उनकी गणित क्रिया ग्रन्थ देखने से स्वतः पाठकों को होगी। 'मरीचि' भाष्यकार मुनीश्वर की अभूतपूर्व खगोल ज्ञान और ग्रहगणितगोल की गवेषणा अभी तक अनुपम है। एक उदाहरण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है— 'मरीचि' भाष्य में ऊध्वंलोक और अधोलोक की व्याख्या उदय से अस्त तक ऊर्ध्वलोक से तथा अस्त से उदय तक अधोलोक जैसी युक्ति युक्त व्याख्या आज तक कहीं भी मुझे देखने को न मिली जो मुनीश्वर ने 'मरीचि' भाष्य में

( ८३ ) नहीं देते थे, उन्हें अच्छी तरह विदित होता था कि बिना ग्रहगणित गोल के मर्म को समझे ही धर्मशास्त्रोक्त तिथि व्रत उपवास का सुदृढ़ निर्णय दे सकने में वे अपने को पूर्ण सफल समझने में संकोच करते थे । अतएव उन्हें ज्योतिषशास्त्र के मुख्य अंग ग्रह- गणितगोल ज्ञान के लिए सफल गणित स्कन्ध का अध्ययनाध्यापन अत्यावश्यक ही नहीं अपितु मुख्य होता था । आचार्य मुनीश्वर ने अपने मरीचि भाष्य में ग्रन्थ के समग्र आशय न्याय और मीमांसा शास्त्रों की सारणि वर्णित किये हैं । मुनीश्वर ने अपने भाष्य में मूल ग्रन्थ के सन्देह शब्दों में पाणिनीय व्याकरण में उन्हें उसी प्रकार ठीक कहा है जैसे—स्पष्टाधिकार में कोटिफलघ्नी मृदुकेन्द्र भुक्ति······स्पष्टाधिक······की व्याख्या के प्रसंग में, दीर्घ ईकारान्तः कोटि शब्द······कृदिकारादक्तिनः······अर्थादित्ये केन्द्रेति वार्तिक वचनात्······से कोटि शब्द को सम्यक् कहा है । मुनीश्वर के मरीचि भाष्य में साहित्य शास्त्र के रस की पदे पदे आनन्दानुभूति होती है । मरीचि भाष्यकार मुनीश्वर ने सिद्धान्तशिरोमणि के 'मरीचि' भाष्य की रचना में संस्कृत वाङ्मय के अनेक ग्रन्थ रत्नों का गम्भीर अध्ययन किया था तथा उन ग्रन्थों के समन्वय के सिद्धान्तों का इस भाष्य में जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ उनके स्थल विशेष पर समन्वय अर्थ में यहाँ मरीचि में उद्धरण भी दिये हुये हैं जैसे— नार्मदसिद्धान्त, तोडरानन्द, वशिष्ठसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, आर्य- सिद्धान्त, ब्रह्मसिद्धान्त, सिद्धान्तसुन्दर, श्रीपति भट्ट सिद्धान्त, सिद्धान्तशेखर, धीवृद्धिदन्त्र, गुरुत्तम विष्णुदैवज्ञ, लघुवशिष्ठसिद्धान्त, चतुर्वेदाचार्य, गुरुतरबीजटीका, लक्ष्मीदासमिश्र, नवीनगणक, न्यायवार्तिक, पाणिनीय, कैय्यट, जातक पद्धति, पराशर, नीलकण्ठ, यन्त्रकिरणावलि, बृहत्सूर्यसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त की भास्कर टीका (चन्द्रग्रहणाधिकार श्लोक २६ की "मरीचि" में जो उपलब्ध नहीं है), वशिष्ट सूर्यसिद्धान्त, कर्णकुतूहल, सिद्धान्तशेखर, पृथूदक, सिद्धान्तरहस्य और श्रीगणेश दैवज्ञ प्रभृति अनेकों ग्रन्थों और अनेकों आचार्यों की उक्तियों के प्रमाण इस मरीचि भाष्य में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध होते हैं । 'मरीचि' भाष्य में श्रुति स्मृति, पुराणोपपुराण, सभी शास्त्रवाक्यों का उल्लेख तो बाहुल्येन ही मिलेगा । अपने समय में मुनीश्वर प्रख्यात काव्य कोष व्याकरणाभिज्ञ तथा ज्योतिष शास्त्र के गोल क्षेत्र विचारों में अत्यन्त प्रौढ़ थे । इसमें इनकी कृतियाँ ही प्रमाण हैं । मरीचि के आदि में— श्री रङ्गनाथाभिध तात पादाः कृष्णानुजाः श्रीकमलाधिपास्ते । त्रिस्कन्ध पारङ्गमरण्डमल्लां बल्लालजा भूमितले जयन्ति ॥

( ८४ ) नारायणो गणितशास्त्रकलाकलापः । श्री सेवितः सकलशास्त्रसरोजभृङ्गः ॥ दैवज्ञकृष्णगुरुपादरतो गुरुर्मे क्ष्मायाँ जयत्यखिल पण्डितवन्द्यपादः मुनीश्वरापराख्येन विश्वरूपेण धृष्यते बुद्धिशाणे मरीच्यर्थं तत्सिद्धान्त शिरोमणिः ॥ तात्पर्य यह है कि मुनीश्वर ने बुद्धिशाण में शिरोमणि को घर्षण करके उससे किरणें उत्पादित की हैं। ततः प्रभृति इस सिद्धान्तशिरोमणि का यह ‘मरीचि’ भाष्य वस्तुतः ‘मरीचि’ (किरण) का कार्य अनवरत कर रही है। यहीं पर मरीचि भाष्य के प्रकाशन न करने में मुझे जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उसका विवरण भी प्रसंगत यहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ— “मरीचि” प्रकाशन की विषम कठिनाइयाँ “मरीचि” भाष्य का सर्वप्रथम प्रकाशन सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय के मेरे द्वारा लिखित सोपपत्तिक हिन्दी ‘शिखा’ और संस्कृत ‘दीपिका’ के साथ में सर्वप्रथम प्रकाश में आई है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वृहत् ग्रन्थागार सरस्वती भवन में उक्त मरीचि की पाण्डुलिपियाँ मेरे दृष्टिपथ में आईं जिसकी प्रतिलिपि प्राप्ति के लिए अनेक कठिनाइयों एवं गहन परिश्रम से उसकी प्रतिलिपि की जा सकी । मरीचि की पाण्डुलिपि को पढ़ना समझना संगति बैठाना और प्राचीन हस्तलिपियों का आधुनिक वर्णलिपियों से समन्वय करना एक पहाड़ सा कठिन कार्य कैसे सफल हो सका, आज मुझे भी स्वयं आश्चर्य सा हो रहा है । लेखक, अध्यापक, अध्यापन, अध्येतृ सम्बन्ध आदि से उस पाण्डुलिपि में अनेक त्रुटियाँ विद्यमान हैं जिनके संशोधन में मैं अपनी कठिनाइयों को किन शब्दों में लिखूँ भविष्य के शोधकर्त्ता उन कठिनाइयों से अवश्य परिचित होंगे । प्रस्तुत गोलाध्याय की मरीचि भाष्य में पूना से प्रकाशित गोलाध्याय के मात्र मूल और मरीचि के सहयोग से यथोचित सुविधा हो सकी जबकि उसमें भी स्थल विशेष पर संशय मुक्ति नहीं है । श्री कमलाकर भट्ट—शके १५३८ ( ई० स० १६१६ ) नृसिंह दैवज्ञात्मज श्री दिवाकर दैवज्ञ के अनुज और शिष्य कमलाकर १५८० (ई० स० १६५८) ने श्री काशी में प्रचलित वर्तमान सूर्य सिद्धान्त के आधार पर ग्रहगोल गणित के बृहद आकर ग्रन्थ

( ८५ ) “सिद्धान्त तत्व विवेक” की रचना की। सिद्धान्त विभाग में उक्त ग्रन्थ का बड़ा महत्व आज तक स्थापित है। मुनीश्वर व कमलाकर के पारस्परिक मतभेदों से, भास्कर, भक्त मुनीश्वर से शास्त्रार्थ में भास्कराचार्य की 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ के पदे-पदे वैदुष्य प्रदर्शन से असन्तुष्ट श्री कमलाकर भट्ट ने अपने 'सिद्धान्त तत्त्व विवेक' ग्रन्थ में श्री भास्कराचार्य से आविष्कृत गूढ़ गहन उदयान्तर जैसे गणित का (जिसका खण्डन सम्भव नहीं है,) खण्डन किया जिससे आज तक पराकाष्ठा की ग्रहगोल वैदुष्य सूचक कमलाकर भट्ट पर दैवज्ञ समाज की आस्था कम मानी जाती है। फिर भी सही मायने में भट्ट कमलाकर के 'सिद्धान्ततत्वविवेक' में अपूर्व कल्पना, अपूर्व खोज और अपूर्व नूतन युक्तियों का यत्र तत्र सर्वत्र समावेश हुआ है। जगन्नाथ सम्राट—(शके १५७४, ई० स० १६५२) ये दाक्षिणात्य तैलङ्ग ब्राह्मण थे। जयपुर महाराज श्री जयसिंह की पण्डित सभा के प्रधान सभापण्डित थे। अरबी भाषा के “मिजास्ती” नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद इन्होंने किया था, जिसका नाम “सिद्धान्त सम्राट्” है। अरबी भाषा के “युक्लेद” ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद भी इन्होंने शके १६४० (ई० स० १७१८) में किया था, जिसका प्रसिद्ध नाम “रेखागणित” है। “सिद्धान्त सम्राट्” ग्रन्थ में अरबदेशीय गणितज्ञों में “मिर्जा उल्कू वेग” आदि यवनों की ज्योत्पत्ति और वेधादि विषय पर प्रकारान्तर से इन्होंने उपपत्तियाँ लिखी हैं। जयपुर के राजा जयसिंह ने नक्षत्र ग्रह वेध के लिए श्री काशी, अवन्ति (उज्जैन) और जयपुर में जो वेधालय स्थापित किये हैं उनकी रचना का आधार जग- न्नाथ सम्राट के “सिद्धान्त साम्राज्य” नामक ग्रन्थ का स्थान विशेष रहा। निसन्देह ग्रह वेध परम्परा की इस देन का श्रेय जगन्नाथ सम्राट को है। महामहोपाध्याय पं० बापूदेव शास्त्री— शताब्दियों से प्रायः विशेष कर कमलाकर भट्ट के समय से (सन् १६५८ ई० से) क्षीणता की ओर जाते हुए गणित सिद्धान्त ज्योतिष की जो स्थिति थी वह अत्यन्त शोच- नीय थी। यत्र-तत्र ज्योतिष फलित मात्र के साधारण जानकारों का बोलबाला था। ज्योतिष की मूलभूत भित्ति इस गणित ज्योतिष की नींव हिल चुकी थी, किन्तु इन शताब्दियों में गणित खगोल का गौरव बढ़ रहा था और अपने तीव्र वेग से वर्धमान पश्चिम गणित सागर की लहरें ब्रिटिश शासन के सम्बन्ध से भारत में भी पहुँच चुकी थीं। लगभग सन् १८३१ से सन् १८३५ तक के बीच नागपुर पाठशाला में यूरोप देशीय बीजगणित के साथ-साथ कान्यकुब्ज ढुंढिराज मिश्र से भास्करीय लीलावती और बीजगणित पढ़ाते हुए—ज्योतिष के गणित धरातल में पूनानगर के महाराष्ट्र ब्राह्मण श्री सीताराम देव के पुत्र पं० नृसिंहदेव शास्त्री या पं० बापूदेव शास्त्री का प्रादुर्भाव हुआ। सन् १८३८ में एजेण्ट लान्सटिन विल्किन्सन् (Mr. Wilkinson) साहब ने इन्हें गणित में निपुण