भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ८२ ) भास्कराचार्य कृत 'सिद्धांतशिरोमणि' ग्रन्थ की आचार्य मुनीश्वर द्वारा 'मरीचि' टीका अद्वितीय रही है। इसके अतिरिक्त भी अन्य टीकायें हुई परन्तु मुनीश्वर कृत 'मरीचि' भाष्य ग्रहगोल गणित का एक अद्वितीय भाष्य है जो अभी तक इकाई स्थानीय है। गुरूणां गुरु महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने आचार्य मुनीश्वर के 'मरीचि' भाष्य के सन्दर्भ में अपना निम्न मत दिया है—" 'सिद्धान्तशिरोमणि की पदार्थ प्रकाशिका 'मरीचि' टीका के सदृश्य और टीकायें नहीं देखी गई हैं। मरीचि में बहुत से प्राचीनों की उक्तियां देखने योग्य हैं। इसलिए सभी ज्योतिर्विेताओं ने इसका आदर किया है।" मुनीश्वर कृत 'मीरचि' भाष्य के देखने और मनन करने से यह स्पष्ट होता है कि निसंशय आचार्य मुनीश्वर में सर्वशास्त्रों की असाधारण प्रतिभा थी। उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के गहन सागर में सानन्द गोता लगाकर अनेक रत्न समूहों की प्राप्तिकर ली थी तथा वे अपार गणितार्णव के उभय पार्श्वदर्शी हो चुके थे उनकी गणित क्रिया ग्रन्थ देखने से स्वतः पाठकों को होगी। 'मरीचि' भाष्यकार मुनीश्वर की अभूतपूर्व खगोल ज्ञान और ग्रहगणितगोल की गवेषणा अभी तक अनुपम है। एक उदाहरण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है— 'मरीचि' भाष्य में ऊध्वंलोक और अधोलोक की व्याख्या उदय से अस्त तक ऊर्ध्वलोक से तथा अस्त से उदय तक अधोलोक जैसी युक्ति युक्त व्याख्या आज तक कहीं भी मुझे देखने को न मिली जो मुनीश्वर ने 'मरीचि' भाष्य में