सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८३ ) नहीं देते थे, उन्हें अच्छी तरह विदित होता था कि बिना ग्रहगणित गोल के मर्म को समझे ही धर्मशास्त्रोक्त तिथि व्रत उपवास का सुदृढ़ निर्णय दे सकने में वे अपने को पूर्ण सफल समझने में संकोच करते थे । अतएव उन्हें ज्योतिषशास्त्र के मुख्य अंग ग्रह- गणितगोल ज्ञान के लिए सफल गणित स्कन्ध का अध्ययनाध्यापन अत्यावश्यक ही नहीं अपितु मुख्य होता था । आचार्य मुनीश्वर ने अपने मरीचि भाष्य में ग्रन्थ के समग्र आशय न्याय और मीमांसा शास्त्रों की सारणि वर्णित किये हैं । मुनीश्वर ने अपने भाष्य में मूल ग्रन्थ के सन्देह शब्दों में पाणिनीय व्याकरण में उन्हें उसी प्रकार ठीक कहा है जैसे—स्पष्टाधिकार में कोटिफलघ्नी मृदुकेन्द्र भुक्ति······स्पष्टाधिक······की व्याख्या के प्रसंग में, दीर्घ ईकारान्तः कोटि शब्द······कृदिकारादक्तिनः······अर्थादित्ये केन्द्रेति वार्तिक वचनात्······से कोटि शब्द को सम्यक् कहा है । मुनीश्वर के मरीचि भाष्य में साहित्य शास्त्र के रस की पदे पदे आनन्दानुभूति होती है । मरीचि भाष्यकार मुनीश्वर ने सिद्धान्तशिरोमणि के 'मरीचि' भाष्य की रचना में संस्कृत वाङ्मय के अनेक ग्रन्थ रत्नों का गम्भीर अध्ययन किया था तथा उन ग्रन्थों के समन्वय के सिद्धान्तों का इस भाष्य में जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ उनके स्थल विशेष पर समन्वय अर्थ में यहाँ मरीचि में उद्धरण भी दिये हुये हैं जैसे— नार्मदसिद्धान्त, तोडरानन्द, वशिष्ठसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, आर्य- सिद्धान्त, ब्रह्मसिद्धान्त, सिद्धान्तसुन्दर, श्रीपति भट्ट सिद्धान्त, सिद्धान्तशेखर, धीवृद्धिदन्त्र, गुरुत्तम विष्णुदैवज्ञ, लघुवशिष्ठसिद्धान्त, चतुर्वेदाचार्य, गुरुतरबीजटीका, लक्ष्मीदासमिश्र, नवीनगणक, न्यायवार्तिक, पाणिनीय, कैय्यट, जातक पद्धति, पराशर, नीलकण्ठ, यन्त्रकिरणावलि, बृहत्सूर्यसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त की भास्कर टीका (चन्द्रग्रहणाधिकार श्लोक २६ की "मरीचि" में जो उपलब्ध नहीं है), वशिष्ट सूर्यसिद्धान्त, कर्णकुतूहल, सिद्धान्तशेखर, पृथूदक, सिद्धान्तरहस्य और श्रीगणेश दैवज्ञ प्रभृति अनेकों ग्रन्थों और अनेकों आचार्यों की उक्तियों के प्रमाण इस मरीचि भाष्य में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध होते हैं । 'मरीचि' भाष्य में श्रुति स्मृति, पुराणोपपुराण, सभी शास्त्रवाक्यों का उल्लेख तो बाहुल्येन ही मिलेगा । अपने समय में मुनीश्वर प्रख्यात काव्य कोष व्याकरणाभिज्ञ तथा ज्योतिष शास्त्र के गोल क्षेत्र विचारों में अत्यन्त प्रौढ़ थे । इसमें इनकी कृतियाँ ही प्रमाण हैं । मरीचि के आदि में— श्री रङ्गनाथाभिध तात पादाः कृष्णानुजाः श्रीकमलाधिपास्ते । त्रिस्कन्ध पारङ्गमरण्डमल्लां बल्लालजा भूमितले जयन्ति ॥