भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ८४ ) नारायणो गणितशास्त्रकलाकलापः । श्री सेवितः सकलशास्त्रसरोजभृङ्गः ॥ दैवज्ञकृष्णगुरुपादरतो गुरुर्मे क्ष्मायाँ जयत्यखिल पण्डितवन्द्यपादः मुनीश्वरापराख्येन विश्वरूपेण धृष्यते बुद्धिशाणे मरीच्यर्थं तत्सिद्धान्त शिरोमणिः ॥ तात्पर्य यह है कि मुनीश्वर ने बुद्धिशाण में शिरोमणि को घर्षण करके उससे किरणें उत्पादित की हैं। ततः प्रभृति इस सिद्धान्तशिरोमणि का यह ‘मरीचि’ भाष्य वस्तुतः ‘मरीचि’ (किरण) का कार्य अनवरत कर रही है। यहीं पर मरीचि भाष्य के प्रकाशन न करने में मुझे जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उसका विवरण भी प्रसंगत यहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ— “मरीचि” प्रकाशन की विषम कठिनाइयाँ “मरीचि” भाष्य का सर्वप्रथम प्रकाशन सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय के मेरे द्वारा लिखित सोपपत्तिक हिन्दी ‘शिखा’ और संस्कृत ‘दीपिका’ के साथ में सर्वप्रथम प्रकाश में आई है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वृहत् ग्रन्थागार सरस्वती भवन में उक्त मरीचि की पाण्डुलिपियाँ मेरे दृष्टिपथ में आईं जिसकी प्रतिलिपि प्राप्ति के लिए अनेक कठिनाइयों एवं गहन परिश्रम से उसकी प्रतिलिपि की जा सकी । मरीचि की पाण्डुलिपि को पढ़ना समझना संगति बैठाना और प्राचीन हस्तलिपियों का आधुनिक वर्णलिपियों से समन्वय करना एक पहाड़ सा कठिन कार्य कैसे सफल हो सका, आज मुझे भी स्वयं आश्चर्य सा हो रहा है । लेखक, अध्यापक, अध्यापन, अध्येतृ सम्बन्ध आदि से उस पाण्डुलिपि में अनेक त्रुटियाँ विद्यमान हैं जिनके संशोधन में मैं अपनी कठिनाइयों को किन शब्दों में लिखूँ भविष्य के शोधकर्त्ता उन कठिनाइयों से अवश्य परिचित होंगे । प्रस्तुत गोलाध्याय की मरीचि भाष्य में पूना से प्रकाशित गोलाध्याय के मात्र मूल और मरीचि के सहयोग से यथोचित सुविधा हो सकी जबकि उसमें भी स्थल विशेष पर संशय मुक्ति नहीं है । श्री कमलाकर भट्ट—शके १५३८ ( ई० स० १६१६ ) नृसिंह दैवज्ञात्मज श्री दिवाकर दैवज्ञ के अनुज और शिष्य कमलाकर १५८० (ई० स० १६५८) ने श्री काशी में प्रचलित वर्तमान सूर्य सिद्धान्त के आधार पर ग्रहगोल गणित के बृहद आकर ग्रन्थ