भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ८५ ) “सिद्धान्त तत्व विवेक” की रचना की। सिद्धान्त विभाग में उक्त ग्रन्थ का बड़ा महत्व आज तक स्थापित है। मुनीश्वर व कमलाकर के पारस्परिक मतभेदों से, भास्कर, भक्त मुनीश्वर से शास्त्रार्थ में भास्कराचार्य की 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ के पदे-पदे वैदुष्य प्रदर्शन से असन्तुष्ट श्री कमलाकर भट्ट ने अपने 'सिद्धान्त तत्त्व विवेक' ग्रन्थ में श्री भास्कराचार्य से आविष्कृत गूढ़ गहन उदयान्तर जैसे गणित का (जिसका खण्डन सम्भव नहीं है,) खण्डन किया जिससे आज तक पराकाष्ठा की ग्रहगोल वैदुष्य सूचक कमलाकर भट्ट पर दैवज्ञ समाज की आस्था कम मानी जाती है। फिर भी सही मायने में भट्ट कमलाकर के 'सिद्धान्ततत्वविवेक' में अपूर्व कल्पना, अपूर्व खोज और अपूर्व नूतन युक्तियों का यत्र तत्र सर्वत्र समावेश हुआ है। जगन्नाथ सम्राट—(शके १५७४, ई० स० १६५२) ये दाक्षिणात्य तैलङ्ग ब्राह्मण थे। जयपुर महाराज श्री जयसिंह की पण्डित सभा के प्रधान सभापण्डित थे। अरबी भाषा के “मिजास्ती” नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद इन्होंने किया था, जिसका नाम “सिद्धान्त सम्राट्” है। अरबी भाषा के “युक्लेद” ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद भी इन्होंने शके १६४० (ई० स० १७१८) में किया था, जिसका प्रसिद्ध नाम “रेखागणित” है। “सिद्धान्त सम्राट्” ग्रन्थ में अरबदेशीय गणितज्ञों में “मिर्जा उल्कू वेग” आदि यवनों की ज्योत्पत्ति और वेधादि विषय पर प्रकारान्तर से इन्होंने उपपत्तियाँ लिखी हैं। जयपुर के राजा जयसिंह ने नक्षत्र ग्रह वेध के लिए श्री काशी, अवन्ति (उज्जैन) और जयपुर में जो वेधालय स्थापित किये हैं उनकी रचना का आधार जग- न्नाथ सम्राट के “सिद्धान्त साम्राज्य” नामक ग्रन्थ का स्थान विशेष रहा। निसन्देह ग्रह वेध परम्परा की इस देन का श्रेय जगन्नाथ सम्राट को है। महामहोपाध्याय पं० बापूदेव शास्त्री— शताब्दियों से प्रायः विशेष कर कमलाकर भट्ट के समय से (सन् १६५८ ई० से) क्षीणता की ओर जाते हुए गणित सिद्धान्त ज्योतिष की जो स्थिति थी वह अत्यन्त शोच- नीय थी। यत्र-तत्र ज्योतिष फलित मात्र के साधारण जानकारों का बोलबाला था। ज्योतिष की मूलभूत भित्ति इस गणित ज्योतिष की नींव हिल चुकी थी, किन्तु इन शताब्दियों में गणित खगोल का गौरव बढ़ रहा था और अपने तीव्र वेग से वर्धमान पश्चिम गणित सागर की लहरें ब्रिटिश शासन के सम्बन्ध से भारत में भी पहुँच चुकी थीं। लगभग सन् १८३१ से सन् १८३५ तक के बीच नागपुर पाठशाला में यूरोप देशीय बीजगणित के साथ-साथ कान्यकुब्ज ढुंढिराज मिश्र से भास्करीय लीलावती और बीजगणित पढ़ाते हुए—ज्योतिष के गणित धरातल में पूनानगर के महाराष्ट्र ब्राह्मण श्री सीताराम देव के पुत्र पं० नृसिंहदेव शास्त्री या पं० बापूदेव शास्त्री का प्रादुर्भाव हुआ। सन् १८३८ में एजेण्ट लान्सटिन विल्किन्सन् (Mr. Wilkinson) साहब ने इन्हें गणित में निपुण