सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८० ) सभी उदाहरणों से इनका प्रखर वैदुष्य स्पष्ट प्रतीत होता हैं। ग्रहलाघव ग्रन्थ के उदाहरणों से तो इनमें असाधारण गोल गणित का पाण्डित्य झलकता है । नृसिंह दैवज्ञ—शके १५०८ ( ईसवी १५८६ ) कृष्ण दैवज्ञ पुत्र दिवाकर दैवज्ञ का पिता, विष्णु दैवज्ञ और मल्लरि पिता के अनुजों से ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के साथ २५ वर्ष आयु में सूर्य सिद्धान्त की सौरभाष्य नाम की और ३५ वर्ष में भास्करीय शिरोमणि टीका वासनावार्तिक नाम की सविशेष टीका रची है । ग्रह वेध करने में प्रवीण थे यन्त्रों में, मयूर यन्त्रब्रह्मचारियंत्र शंख यन्त्र, मेषाज युद्धयन्त्र, शंखवादन यन्त्र, घण्टापटहादिवादन यन्त्र, बानर यन्त्र घटी यन्त्र और अनेक यन्त्रों में हंसादि यन्त्र स्वयंवह गोल यन्त्र आदि बहुत यन्त्रों का उल्लेख किया है । नीलकण्ठ—आचार्य नीलकण्ठ ने शके १५०९ (ई० स० १५८७) में पारसीक एवं अरबीक शब्द मिश्रित ताजकमत के तीन तन्त्रों से 'तांजिक नीलकण्ठी' नामक ग्रन्थ की रचना की । इस ग्रन्थ का उपयोग वर्षफल बनाने मे होता है । उक्त ग्रन्थ के द्वारा आचार्य नीलकण्ठ का ग्रहगणित गोलविषयक पाण्डित्य भी सिद्ध होता है । सुधाकर द्विवेदी के अनुसार इन्होंने 'जातक पद्धति' नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी। रामदैवज्ञ—ये आचार्य नीलकण्ठ के छोटे भाई थे । इन्होंने शक १५५८ में प्रसिद्ध 'मुहूर्त्त चिन्तामणि' ग्रन्थ की रचना की । एक करण ग्रन्थ 'रामविनोद' भी इन्होंने लिखा, इसमें २८० श्लोक हैं । श्रो मुनीश्वर—शके १५२५ (ई० स० १६०३) में सौरभाष्य रचयिता आचाय रंगनाथ दैवज्ञ पुत्र 'मुनीश्वर' जिनका अपरनाम 'विश्वरूप' भी है, उत्पन्न हुये । आचार्य मुनीश्वर के इतिवृत्त के सन्दर्भ में यहाँ विशेष वर्णन आवश्यक समझकर प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ 'सिद्धान्तशिरोमणि' का यह 'मरिचि' भाष्य इन्हीं की ज्योतिष जगत को अति महत्वपूर्ण देन है । 'मरीचितीकाकार' आचार्य मुनीश्वर परम्परा से ज्योतिर्विद्या में पूर्ण मर्मज्ञ थे । बाल्यजीवन से ही उनकी बुद्धि ज्योतिर्विद्या की ओर अग्रे प्रस्फुटित होती थी । इसका एक प्रबल हेतु यह भी है कि मुनीश्वर के पिता श्री रंगनाथ भी ऊँचे स्तर के ग्रहगणितज्ञ हो चुके थे । सूर्य सिद्धान्त पर सर्वप्रथम रंगनाथ कृत सौरभाष्य अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अतएव वंश परम्परा में संस्कार से आचार्य मुनीश्वर की ग्रहगणितगोल में तो असाधारण प्रतिभा होनी ही चाहिये थी साथ ही न्याय, काव्य, व्याकरण, प्रभृति शास्त्रों में भी उनका अशेष पाण्डित्य था । आचार्य मुनीश्वर ने सूर्य सिद्धान्त के भगणों के आधार से शके १५६८ (ई० स० १६४६) में 'सिद्धान्त सार्वभौम' नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ की रचना की । स्वरचित