सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६५ ) "यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा, तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं (गणितं) मूर्ध्नि संस्थितम् ।' 'वेदांग ज्योतिष' के अपने भाष्य में 'सोमाकर' ने भी ज्योतिष' की जगह 'गणित' कह कर ज्योतिष के गणित स्कन्ध को ही सर्वोपरि भी कहा है । वैदिक साहित्य एक गहन ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है । वैदिक-साहित्य के प्रादुर्भाव की परम्परा भी स्वयम् में किसी काल-विशेष की अपेक्षा रखती है । इसलिए काल की भी वैदिक पद्धति प्रचलित हुई । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कालज्ञान बोधक ज्योतिषशास्त्र का वर्त्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की देन है। कालान्तर में ब्रह्मर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति-पुराणों की रचना से ज्ञान संरक्षण एवं संवर्धन किया उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना से ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुण्य की है । 'वेदाङ्ग ज्योतिष' (याजुष ज्योतिष) जो आचार्य लगध प्रणीत कहा जाता है तथा शास्त्रों में "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" से ऐसा सिद्ध होता है कि आचार्य लगध तपोनिष्ठ महात्मा थे । शब्दशास्त्र (व्याकरण) के विमल शब्द रूप जल धारा से अज्ञान अन्धकार को मिटाने वाले आचार्य पाणिनी की तरह प्रकाश स्वरूप ज्योतिष-ज्ञान द्वारा अन्धकार को धोने वाले महात्मा लगध कहे जाते हैं । लगधाचार्य ने परमाधिक दिनमान ३६ घटी = १४ घण्टा, २४ मिनट के तुल्य जो उल्लेख किया है, तदनुसार यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि लगधाचार्य उत्तर भारत के उत्तर हिमालय की किसी चोटी के समीपस्थ गुफा में तपोनिष्ठ थे । लगधाचार्य ग्रह वेध करने में भी कुशल खगोलज्ञ थे । उन्हीं के कथन से पुष्टि होती है । याजुष ज्योतिष में उल्लिखित है— "प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ श्लोक ७ ॥ तात्पर्य यह है कि सूर्य और चन्द्रमा जब धनिष्ठा नक्षत्र के आदि में होते हैं तब उत्तरायण और चित्रा नक्षत्र के आधे में होने से दक्षिणायन होता है अर्थात् सदा सूर्य चान्द्र मासों के सम्बन्ध में माघ चान्द्र मास में उत्तरायण एवं श्रावण मास में दक्षिणायन होना कहा गया है । तथा, पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् । दिनर्वयनमासाङ्गं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १ ॥ ज्योतिशामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । सम्मतं ब्राह्मणेन्द्राणां यज्ञकालस्यसिद्धये ॥ २ ॥ [याजुष ज्यो०] ५