भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ६४ ) “उपपत्ति युतं गणितं गणका जगुः” निराधार का या अटकलपच्चू का गणित, गणित नहीं होता, किसी भी गणित का कोई मूलाधार होना चाहिए । वस्तुतः “वासना” इस शब्द के अनेक अर्थों में, प्रत्याशा, ज्ञान, भाव या संस्कार स्मृति, हेतु, कारण, कामना, उपपत्ति तर्क द्वारा किसी सिद्धान्त का सही उपपादन, कार्य से कारण का ज्ञान, अनुमान, प्रत्यक्ष, मेल, मिलन, सङ्गति युक्ति, प्राप्ति और प्रसिद्धि इत्यादि अनेक अर्थों से सम्बन्धित शब्द का नाम आचार्य ने “वासना” नामक सुन्दर शब्द से “वासना” भाष्य किया है । उक्त पर्यायवाची शब्द और उनके समान अर्थों से सम्बन्धित यह “वासना” शब्द आचार्य को अधिक प्रिय हुआ है । श्लोकबद्ध मूल ग्रहगणित सिद्धान्तों की उपपत्ति समझने में शिष्य वर्ग की कठिनता को ध्यान में रखकर आचार्य ने कठिन ग्रहगणित के श्लोकात्मक सिद्धान्तों को अपने इस “वासना भाष्य” से छात्र वर्ग का जो हित किया है पठनशील गुरु शिष्य परम्परा इसे स्वयं समझ कर आनन्दानुभव से शास्त्रज्ञान विवर्द्धक शोध कार्यों में तन्मयता से प्रवृत्त होकर रहेगी शुभाशा है । भास्कराचार्य के पूर्व एवं पश्चात् के जिन ग्रहगणित खगोलज्ञों में भास्कराचार्य ने जिन रचनाओं को प्रमाणीभूत माना है और भास्कराचार्य को जिन आचार्यों ने प्रमाणी- भूत माना है उन एव अन्य ग्रहगणित खगोल ग्रन्थ प्रणेता महान् आचार्यों का संक्षिप्त परिचय इस स्थल पर दे देना आवश्यक समझकर प्रस्तुत कर रहा हूँ और जो प्रसंगत अत्यन्त उचित भी है । प्रस्तुत प्रकरण का इसी लेखनी से लिखित 'ग्रह लाघव' करण ग्रन्थ की 'केदारदत्तः' टीका की भूमिका में भी उल्लेख हुआ है :- भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित-गोल आचार्यों का इतिवृत्त भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित गोल आचार्यों में आचार्य लगध, आर्यभट्ट, लल्ला- चार्य, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, मुञ्जाल, श्रीपतिभट्ट, भास्कर प्रथम आदि प्रमुख हैं। उक्त आचार्यों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है— आचार्य लगध—ज्योतिष शास्त्र वेदमूलक हैं, षडंगों में चक्षुस्थानीय है । वर्तमान ज्योतिष का वेदमूलक ग्रन्थ आचार्य 'लगध' प्रणीत 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ है । उपलब्ध ज्योतिष ग्रन्थ कोश में आचार्य लगध प्रणीत यह ग्रन्थ ही आगम ग्रन्थ है । आचार्य लगध और उनके 'वेदाङ्ग ज्योतिष' नामक ग्रन्थ के सन्दर्भ में ऐतिहासिक विद्वानों में विवाद है जिसकी चर्चा यहाँ अनावश्यक है । आचार्य लगध ने 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ में ज्योतिष- शास्त्र के गणित स्कन्ध की स्तुति करते हुए कहा है कि वेदांग शास्त्रों में (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष) ज्योतिष (गणित) ही मूर्धन्य है ।