सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६३ ) प्राकृतिक ऋतुओं के चिह्नों से जाननी चाहिए। अतएव आचार्य ने इसी प्रसंग में ‘ऋतु- वर्णनाध्याय’ नामक अध्याय का इस गोलाध्याय में निवेश किया है। ग्रहगणिताध्याय में यह विषय नहीं है। १३. ऋतुवर्णनाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में ६ ऋतुओं का वर्णन किया गया है। मकर-कुंभ के सूर्य में शिशिर, मीन-मेष में वसन्त, वृष-मिथुन में ग्रीष्म, कर्क-सिंह में वर्षा, कन्या-तुला में शरद एवं वृश्चिक-धनु के सूर्य में हेमन्त ऋतुयें होती हैं। खगोल मर्मज्ञता के साथ साहित्य शास्त्र की अशेष पाण्डित्य शैली का आचार्य भास्कर में विद्यमान थी। अतएव इस कथन में लेशमात्र सन्देह नहीं है कि प्राचीन ग्रन्थ प्रणेता आचार्य सर्वशास्त्रज्ञ होते थे। काश ! संस्कूत वाङ्गमय का यह समय विचारणीय व शोचनीय है। ग्रहगणिताध्याय में शृंगोन्नत्ति अधिकार के पश्चात् ग्रहयुत्याधिकार के वर्णन में ग्रहों के मध्यम बिम्ब, बिम्ब स्पष्टीकरण, ग्रहों का योग साधन इत्यादि विषयों का वर्णन हुआ है। तदुपरि भग्रहयुत्तधिकार में नक्षत्रों के ध्रुवक, शर, नक्षत्र ग्रहों का योग इत्यादि का विचार है तत्पश्चात् गणिताध्याय के अन्तिम प्रकरण पाताधिकार में गोलायनसन्धि, क्रांतिसाम्य, व्यतिपात वैधृत आदि विषयों से गणिताध्याय का आचार्य ने समापन किया है। १४. प्रश्नाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में प्रश्नारम्भ का प्रयोजन, बुद्धि- मान दैवज्ञों की प्रशंसा, अनेक प्रकार के खगोलीय प्रश्नों और उनके शंका-समाधान के साथ प्रश्नों के उत्तरों से विभूषित यह प्रश्नाध्याय पाठकों के लिए विवेचनीय, मननीय एवं विचारणीय है। समग्र ग्रन्थ के आमूल चूड अध्ययन से अध्येता की ग्रहगोल गणित रूप की यह सम्पत्ति सदा वर्धमान होती रहेगी। ग्रहगणिताध्याय में त्रिप्रश्नाधिकार में ही इस प्रश्नाध्याय का समावेश है। इस प्रकार ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय के प्रकरणों के समन्वयात्मक अध्ययन एवं विवेचन से पाठकों को महान् गणितज्ञ भास्कराचार्य के वैदुस्वपूर्ण शोध गणित कर्म का आभास होगा। भास्कराचार्य ने अपनी "सिद्धान्तशिरोमणि” ग्रन्थ की "वासना भाष्य” नामक व्याख्या की। नीचे इस सन्दर्भ में संक्षिस वर्णन दिया जा रहा है— सिद्धान्त शिरोमणि और उसका वासना भाष्य भास्कराचार्य ने स्वरचित पद्यात्मक गणित सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिये “वासना भाष्य” नामक व्याख्या भी स्वयं की है। आचार्य की स्वयं की इस व्याख्या का नाम उत्पन्न गणित सिद्धान्त के उपपादन का नामकरण "वासना भाष्य” क्यों हुआ होगा ? विचारणीय है।