सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) याम्योत्तर और पूर्वापर वृत्त का संपात बिन्दु का संकेत बिन्दु न बिन्दु है । पू र्स ख नि स प जिस देश में अक्षांश (२४) चौबीस अंश के तुल्य है (यह देश प्रायः विन्ध्य पर्वत के आसन्न काशी से दक्षिण हो सकते हैं) उस देश में किसी इष्ट समय में स्पष्ट रवि = ६।०'।०'।०'' स्पष्ट चन्द्रमा = ६।०'।०'।०'' पात = ६।०'।०'।०'' इस समय रवि के उदय के समय सूर्य चन्द्रमा और पात पूर्व स्वस्तिक में होते हैं । इस समय उदय लग्न = ६।०'।०'।०'' चन्द्रमा का शर = ०' लग्न - ३रा वित्रिभ लग्न = ६।०'।०'।०'' - ३।०'।०'।०'' वित्रिभ लग्न की क्रान्ति = १२° + ८° + ४° = २४° चौबीस अंश (स्वल्पान्तर से) अतः खमध्य स्थान में स्थित क्रान्ति वृत्त की एकता है यहाँ यह दोनों एक ही वृत्त में होते हैं। इसी क्रान्ति वृत्त के सम्पात बिन्दु पर राश्यादिक पात भी हैं और यहीं चन्द्रमा भी स्थित है। इसी स्थान पर लंबित चन्द्रमा भी क्रान्तिवृत्त में ही लम्बित होगा । यहाँ चन्द्रमा लम्बित हुए भी दृग्वृत्तानुरूप क्रान्तिवृत्त से पृथक नहीं हो सकता । अतः ऐसी स्थिति में याम्योत्तर अन्तर रूप नति का युक्तितः स्पष्ट अभाव भी प्रत्यक्ष है जो स्वतः सिद्ध होता है । किन्तु इस स्थल पर ब्रह्मगुप्त के मत से ४ कला के तुल्य नति का मान आता है जिसका यहाँ कोई प्रयोजन नहीं होने से ब्रह्मगुप्त का यह नति साधन मान गणित प्रपञ्च व्यर्थ हैं। इसलिए ब्रह्मगुप्त का उक्त कथन समीचीन नहीं है। भास्कराचार्य ने नति ४ कला आती है ऐसा ही कहा है ।