भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ५९ ) चार कला नति कैसे आती है ? इसे निम्न गणित से समझिये । सपात वित्रिभ का भुज = ९०° वित्रिभ का शर = २७०° इसकी ज्या = २६९।३१ स्वल्पान्तर से ज्या = २७० रवि का दृक्क्षेप = ० । अतः चन्द्रमा का दृक्क्षेप = ० + २७० = २७० अतः नति उत्पादक गणित सिद्धान्त से— (चन्द्रदृक्क्षेप × चन्द्रदृग्लम्बनज्या) / चन्द्रदृग्ज्या = चन्द्रगति / १५ × २७० / ३४३८ = {(७९०।३५) २७०} / (१५ × ३४३८) = {(७९०।३५) २७०} / (१५ × ३४३८) = ४ (स्वल्पान्तर से) अतः ब्रह्मगुप्त के दोष को स्पष्ट करते हुए आचार्य भास्कर ने अपना युक्ति युक्त गणित का कथन स्पष्ट किया है । १०. उदयास्तवासना—गोलाध्याय में ग्रहों के उदय एवं अस्त सम्बन्धित गणितों का स्पष्टीकरण किया गया है । चूंकि सूर्यग्रहण को छोड़कर शेष सभी ग्रह अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त विमण्डल वृत्तों में भ्रमण करते हैं । समस्त ब्रह्माण्ड के ग्रह कक्षाओं का राश्यादिक स्थान अपने दृष्टिगत क्रांति वृत्त में होता है । विमण्डलगत ग्रह बिम्ब की राश्यादिक नियतस्थिति क्रांति वृत्त में कही गई है जिसे ग्रह का स्थान कहते हैं । अतः क्षितिज में ग्रहबिम्ब के उदय के पूर्व या पश्चात् ग्रहस्थान का उदय होता है । सारा गणित दृश्य है, बिम्ब दर्शन से ही प्रतीति होती है कि बिम्बोदय हुआ किन्तु गणितागत- ग्रहस्थान भिन्न होने से स्थानाभिप्रायिक ग्रह कदाचित् बिम्ब के साथ याम्योत्तर रूप में क्षितिज में है या बिम्ब पहले उदय होगा इत्यादि स्थानोदय एवं बिम्बोदय के अन्तर- काल का गणित इस अध्याय में हुआ है । इसी प्रकार ग्रहगणिताध्याय में ग्रहों का नित्यो- दयास्त और सूर्य के समीप एवं दूर के दूरी से अन्तरित उदयास्त, बुध, शुक्र का वक्रादि ज्ञान, ग्रहों के उदय व अस्त के कालांश ज्ञान इत्यादि का सविशेष वर्णन हुआ है । गोलाध्याय में 'ग्रहणवासना' के अनन्तर उदयास्तवासना है जबकि ग्रहगणिताध्याय में 'छायाधिकार' के पश्चात् उदयास्ताधिकार का वर्णन है । ग्रहगणिताध्याय के ग्रहछाया- धिकार में आचार्य ने एक कौशलपूर्ण गणित की सूक्ष्मता दर्शायी है जो पूर्वाचार्यों से प्रकाश में नहीं आई थी । जो निम्न है— भूकेन्द्राभिप्रायिक ग्रह गणित से शंकु मान का गणित भी गर्भाभिप्रायिक होता है जिसे भूगर्भ, भूपृष्ठ भेद से अन्तरित होना चाहिए । छाया दर्शन शंकु निवेशन···यह सब भूपृष्ठ बिन्दु (जो भूपृष्ठ में जहाँ है वहां से) से ही सही होता है । यहाँ शंकु कोटि, दृग्ज्या भुज कर्ण और १२ अंगुल और त्रिज्या कोटि, शङ्कु छाया, भुज एवं (भूपृष्ठस्थ) छाया कर्ण ही उसकी कर्णमान सही होती है । अतः शास्त्र शोध नियमों से बृहज्ज्या

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