भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 723 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

( ५५ ) सम्पात से क्षितिज धरातलगत सूत्र की मध्याह्न शंकु, कोणवृत्ताहोरात्रवृत्तसम्पात से क्षितिज धरातलगत शंकु का नामकोण शंकु होता है । ३८. शंकुमूल से स्वोदयास्त सूत्र तक लम्ब रूप याम्योत्तर अन्तर को शंकुतल कहते हैं । इस प्रकार इष्टशंकु कोटि, इष्टहृति कर्ण एवं इष्टशंकुतल भुज ऐसे बहुविध सरल समकोणक त्रिभुजों की खगोलीय बहुविध रचनाओं से तत्तत्स्थलों की छाया आदि ज्ञात करते हुये ग्रहगोलगणित की पृष्ठभूमि सुदृढ़ होती है । इस प्रकार संक्षेप से खगोल का परिचय करते हुये तथा पौर्वात्य पाश्चात्य खगोलीय ऊपर लिखित शब्द संकेतों की सूची से मेरा विश्वास है कि ग्रन्थ में वर्णित ग्रहगणित के विशेष परिष्कारों से सर्वसाधारण को अवश्य लाभ होगा, जिसे मैं अपना सफल प्रयास समझूँगा । वस्तुतः प्राचीन परम्परा से ही भारतीय ग्रन्थ भण्डार की ज्ञानप्राप्ति के लिए गुरु- मुख होना तो अनिवार्य है । बिना गुरुमुख हुये ग्रन्थ की विशेष फक्किकाएँ समझ में नहीं आ सकती हैं । ग्रन्थ का हृदय तो गुरु का हृदय है और उस हृदय को, विनीत जिज्ञासु परम गुरु भक्त सुयोग्य शिष्य ही प्राप्त कर सकता है । इसीलिए आचार्यों ने बड़े श्रम साध्य ग्रन्थ के क्लिष्ट स्थलों को समझ कर सरल बनाते हुये शिष्य परम्परा से अनुरोध किया है कि (“नैतद्देयं दुर्विनीताय शिष्याय” तथा दिव्यं ज्ञानमतीन्द्रियमित्यादि) इस पवित्र ज्ञान को शिष्यत्व समझकर सुविनीत शिष्य को ही देना चाहिये । ८. त्रिप्रश्नवासनाधिकार—'त्रिप्रश्न' शब्द से भूमण्डल में दिशा, देश, काल का परिचय होता है । ग्रहगोलाध्याय के त्रिप्रश्नाधिकार में कहा गया है— उन्मण्डलक्ष्मावलयान्तराले द्युरावृत्ते चरखण्डकालः । तज्ज्याऽत्र कुज्या चरशिञ्जिनी स्याद्व्यासार्धवृत्ते परिणामिता सा ॥ अर्थात भूमण्डल के किसी नियत स्थानीय क्षितिज और विषुवत वृत्तनिष्ठ क्षितिज के बीच में अहोरात्र वृत्त (जिसका काल = ६० घटी अर्थात २४ घण्टा) के एक लघु टुकड़े का नाम चर कहा गया है । अतः ६ घण्टे के समय में इस चर खण्ड को अधिक और कम तुल्य समयों में अपने देशों में सूर्योदय, सूर्यास्त, अर्धरात्रि या मध्याह्न का समय ज्ञान विवेचित किया है । ग्रहगोल की भाषा में इस त्रिप्रश्नवासनाधिकार को 'कालतंत्र' भी कहा गया है । विशेषकर के इस प्रकरण में दिन-रात्रि की लघु महत्ता का कारण, ६६ अंश अक्षांश से अधिक अंशीय देशों में लम्बांश से अधिक क्रांति होने पर उन देशों में दीर्घकालीन