सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) दिन-रात्रि, उत्तर-दक्षिण ध्रुवों में मानव मात्र के ६ महीनों में मात्र एक दिन और रात्रि, पृथ्वी में ध्रुवतारा का स्थान आदि के विचार के साथ ही इसी प्रकार चन्द्रपृष्ठ में मानव मान के एक चान्द्रमास के तुल्य पितृ लोक में पितरों का एक दिन, उत्तरायण, दक्षिणायन व्यवस्था, चन्द्रमा के ऊर्ध्व भाग में पितरों की स्थिति, कृष्ण पक्ष की साझें सप्तमी को पितृलोक में सूर्योदय, अमान्त में मध्याह्न आदि का विवेचन किया गया है। ब्रह्माण्ड में ऐसा स्थान जहाँ पर सदा सूर्य दर्शन होता है (सदोदित रवि दर्शन) उस स्थान का ज्ञान, लग्न साधन, लग्न साधन में सूर्य तात्कालिककरण, देश विशेष से सदोदित राशियों का आंकलन, दृश्या-दृश्य राशियों के वर्णन में लल्लाचार्य की गणितीय त्रुटियों का वर्णन, शंकु स्थान, दीर्ज्या, कुज्या, अग्रा, क्रांति क्षेत्र आदि की परिभाषा और आठ प्रकार के सजातीय अक्ष क्षेत्रीय त्रिभुजों का स्थान वर्णन के साथ गोलाध्याय में इस अधिकार का समापन हुआ है। उक्त इसी प्रकार के गणित वर्णनों के साथ सूर्य और लग्न ज्ञान से इष्टकाल ज्ञान, भूपृष्ठीय किसी नगर में छाया ज्ञान से पूर्वादि दिशाज्ञान, सजातीय आठ अक्ष क्षेत्रों का परिचय, नाना प्रकार के गणितों का परिष्कार इत्यादि गोलाध्याय की अपेक्षा ग्रह- गणिताध्याय से त्रिपश्नाधिकार विशद् और अधिक व्यापक है। ९. ग्रहणवासना—गोलाध्याय में 'अथ ग्रहणवासना' शीर्षक से ग्रहणवासना अध्याय का आरम्भ हुआ है एवं इस अध्याय में सूर्यग्रहण पर ही आचार्य ने विशेष परिष्कारों से अध्याय को विभूषित किया है। चन्द्र-सूर्य ग्रहण की स्पर्श मोक्ष दिशायें और चन्द्रग्रहण में पृथ्वी छाया का दीर्घ विस्तार का ज्ञान, आकाशस्थ ग्रहणों का परलेख चित्र से विचार, लम्बन, स्पष्ट लम्बन गणित ज्ञान, बलन ज्ञान, बलन गणित में लल्लाचार्य की भयंकर त्रुटियों का दर्शन पूर्वक शुद्ध स्पष्ट बलन ज्ञान के साथ इस अध्याय का समापन हुआ है। यद्यपि ग्रहगणिताध्याय में सूर्य-चन्द्रग्रहण-गणित साधन में पर्वसंभवाधिकार, चन्द्र- ग्रहणाधिकार और सूर्यग्रहणाधिकार नाम के अध्यायों में गोलाध्याय की अपेक्षा सविशेष वर्णन हुआ है। ग्रहगणिताध्याय में सूर्यग्रहण के उपसंहार के समय में अपने गुरु परम्परा के ब्रह्म- गुप्ताचार्य के दृक्क्षेप साधन की स्थूलता या त्रुटि का भी उल्लेख उदाहरण पूर्वक आचार्य भास्कर ने किया है। जो निम्न भाँति द्रष्टव्य है—