सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५० ) ९० - अक्षांश = लम्बांश । अर्थात् ९० - काशी के अक्षांश = ९०° - २५/१८ = ६४/४२ इसकी ज्या का नाम अपने देशीय परिधि की त्रिज्या = स्पष्ट भूपरिधि व्यासार्द्ध होता है । जिसे लम्बांशज्या या लम्बज्या भी कहते हैं, या अपने देश की स्पष्ट भूपरिधि व्यासार्द्ध भी कहते हैं । अतः अनुपात से भू० प० × ज्यालं ───────────── = स्पष्ट भूपरिधि भूव्यार्द्ध परम भूपरिधि × ज्यालं ───────────────────── = अपने देशीय भूपरिधि व्यास परमाधिक भूव्यासार्ध त्रि उत्थापन देने से भूपरिधि × भूव्यार्द्ध × ज्यालं भूपरिधि × ज्यालं ───────────────────────── = ───────────────── त्रि × भूव्यार्द्ध त्रि गणित से ही स्पष्ट भूपरिधि, मेरु = ध्रुव कहने से सही है । इसी लिए सूर्य सिद्धान्त में राक्षसालयदेवौकः शैलयोर्मध्यसूत्रगाः । रोहीतकमवन्तीच तथा सन्निहितं सरः ॥ देवानामोको वासस्थानरूपः शैलः, पर्वतः मेरुः···ध्रुव इति स्पष्ट है । भास्कराचार्य ने भी— “भूर्लोकारण्यौ दक्षिणे व्यक्षदेशात्, तस्मात् सौम्योऽयं भुवः स्वश्च मेरुः” तथा— “यल्लङ्कोज्जयिनीपुरोपरिकुरुक्षेत्रादिदेशान्स्पृशत् । सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः ॥···से स्पष्ट किया है कि ध्रुव स्थान का अपर नाम ही मेरु है । ६६° अंश से अधिक अक्षांशीय देशों में लम्बांशाधिक सूर्य क्रान्ति समय तक सदा दिन ही होगा, तथा एवं उत्तर ध्रुव में ६ महीने के दिन २३ मार्च से २३ सेप्टेम्बर तक तथा इस बीच दक्षिण ध्रुव में ६ महीने की रात्रि होती है । (आधुनिक अयनांश से ।) “मेरौ रविर्भ्रमति भू जगतः समन्तादाशा न काचिदपि तत्र विचारणीया” इत्यादि मेरु स्थान में क्षितिज के जिस बिन्दु पर सूर्योदय होता है हमारे मान के ६ महीने की दिन माप से उसी सूर्य के उदित बिन्दु पर सूर्य का अस्त भी देवता लोग देखते हैं । अर्थात् मेरु स्थान में पूर्व पश्चिम दिशा पृथक् नहीं एक ही होती है । दिशा ज्ञान मेरु अर्थात् ध्रुव में नहीं होता है इसलिए भू पृष्ठ पर मेरु का अपर नाम ध्रुव बिन्दु स्पष्ट है ।