सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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यन्त्राध्यायः ४४३ अथ च-०।१५°।०'।०' जब भुजमान होता है तो द्युज्या = ३४१८ होती है । तथा १।०।०।० भुज में द्युज्या = ३३६६, १।१५।०।० भुज में द्युज्या = ३२९२, २।०।०।० भुज में द्युज्या = ३२१८, २।१५।०।०। भुजज्या में द्युज्या = ३१६१ तथा ३।०।०।० भुज द्युज्या = ३१४१ । तथा १२ अंगुल शंकु को त्रिज्या से गुणा कर उक्त द्युज्याओं से भाग देने से सर्वत्र लब्धि पूर्ण १२ के अवयवों में ४, ११; १७, १८, १३, ५ अङ्क उत्पन्न होते हैं । खण्ड X पलक साक्षदेश = अपने देश के लिये उक्त खण्डों को ---------------- फल = १५ अंश भुज्जांश- १२ सम्बन्धी फल व्यंगुलात्मक होता है। इसमें ६० से भाग देकर लब्ध फल को ऊपर लब्ध