सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें४४२ गोलाध्याये उक्तक्रमात् । स्वदेशे गृहीतपलकर्णसंबन्धिदेशे खण्डकानि भवन्ति । ननु लघुज्याखण्डकानि भुजांशदशांशलभ्यानि तथैतानि न षण्मितत्वादन्यथा नवकथितानि स्युरत आह—राश्यर्ध- लभ्यानीति । हि निश्चयादेतानि षड् राशेरर्धं पञ्चदशभागास्तैर्लभ्यानि भुजांशपञ्चदशां- शेनैतानि लभ्यानीत्यर्थः । षण्मितत्वात् ॥२३॥ अथ यष्टेरानयनं तस्या यन्त्रे संनिवेशं चेन्द्रवज्रयाऽऽह—तैः क्रान्तिपातादथेति । तैः स्वदेशसंबन्धिभिरानीतखण्डकैः षड्भिः । क्रान्तिपातादघरवेः सायनाकार्दभुजज्या । यथा लघुज्या दशभागेनोक्तखण्डकैस्तथा पञ्चदशभागेनैभिः खण्डकैः सायनसूर्यभुजस्य ज्या कार्या । सा षष्टिभक्ता । अक्षकर्णेन पूर्वगृहीतेन युक्ता । ततो दशभिर्गुणिता चतुर्भिर्भक्ता फलमिहास्मिन्फलकयन्त्रे यष्टिर्भवति । सा षष्टिः पट्टिकायां सुषिरात्सूक्ष्मतया देया । अङ्कया । यस्मिन्दिने कालज्ञानाद्यभीष्टं तद्दिनीयोक्तप्रकारेण यष्टिरानैया तत्तुल्यान्यङ्गु- लानि पट्टिकायां सुषिराद्गणयित्वा यष्टिचिह्नं कार्यमित्यर्थः ॥२४॥ केदारदत्तः—यष्टि साधन गणित बताया जा रहा है— निरक्ष देश अर्थात् विषुवद्वृत्त धरातलगत भूपृष्ठ में ४।११।१७।१८।१३। और ५. ये अंक द्वादश भक्तपलकर्णगुणित चर खण्डों के होत हैं । प्रत्येक १५ अंश में एक एक खण्ड होता है अतः ९०/१५ = ६ खण्ड होते हैं । सायन सूर्य के भुजांश की ज्या भुजज्या का साधन कर इसमें ६० का भाग देकर इसे पलकर्ण में जोड़ कर जो फल आता है उसे १० से गुणा कर ४ से भाग देने से लब्ध फल का नाम यष्टि का अंगुलात्मक मान होता है । उपरोक्त मध्य छिद्र में इस माप से यष्टि का दान देना चाहिए । पट्टिका में यष्टिः माप तुल्य अंगुलरन्ध्र से आरम्भ कर उसमें चिह्न करना चाहिए । सुषिर अर्थात् छिद्रोपरि की ज्या रेखा = मध्य रेखा । उपपत्ति : फलक यन्त्र को दृङ्मण्डलाकार स्थापित करने से यन्त्रगत कील छाया जहाँ परिधि को स्पर्श कर रही है, वहाँ से मध्य रेखा तक जो उन्नतांश हैं इस उन्नतांश ज्या = उन्नत ज्या होती है । अर्थात् मध्य रेखा और छाया के मध्य में जितने अंगुल वही उन्नत ज्या होती है । इष्टकाल में यही उन्नत ज्या = शंकु होती है । इसे पककर्ण से गुणित १२ से विभक्त करने पर = इष्ट हृति होती है । इष्टहृति को त्रिज्या से गुणा कर द्युज्या से भाग देने पर वह इष्टान्त्यका होती है । उत्तर दक्षिण गोलग रवि के क्रम से त्रिज्या ± चरज्या = अन्त्या होती है । अन्त्या-इष्टान्त्या = नतकालोत्क्रम ज्या होती है । नतकालो- त्क्रम ज्या का चाप से = नतकाल का ज्ञान होता है । गोल दर्शन से इस प्रकार कालज्ञान सुस्पष्ट होता हैं । इस गोलसिद्ध उपपत्ति को आचार्य धूलीकर्म से सिद्ध करते हैं ?