भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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पृष्ठ 555

यन्त्राध्यायः ४५३ उत्तर गोल में नीचे दक्षिण गोल में ऊपर फलक यन्त्र में चरज्या अंगुल तुल्य गणनया चिह्न करना चाहिए । उस जगह पर जो ज्या रेखा है उस ज्या रेखा पर पट्टी स्थिति यष्टि चिह्न जैसे लगता है उसी प्रकार अक्ष प्रोत पट्टी रखने से उस जगह पर उस समय पट्टी स्थान पर अक्ष की छाया अवश्य पड़ेगी तस्मात् यन्त्र रचना शुद्धता है । उपपत्ति—यन्त्र में यन्त्र का विस्तार = ९० अंगुल, दैर्घ्य = १८० अंगुल यह भूमण्डल में सार्वदेशाभिप्रायिक है । अथवा अपने देश की भौगोलिक स्थिति समझ कर भी पट्टी का निर्माण में विस्तार यदि वृत्त मध्य छिद्र के ऊपर परम चरज्याग्र तुल्य और नीचे ३८ अंगुलात्मका रेखा विस्तार में ४६ तक हो सकती है । और परम यष्टि तुल्य ३८ x २ = ७६ होने से कुरुक्षेत्र पर्यन्त के देशों में फलक यन्त्र से कालज्ञान हो सकता है ॥२७॥ फलक यन्त्र के सम्बन्ध में विशेष उपपत्तिः— फलक यन्त्र माप में यष्टि साधन— अनुपात से यदि अक्ष क्षेत्र साजात्य सम्बन्ध से द्वादशांगुल शंकु कोटि में पलकर्ण कर्ण मिलता है तो शंकु कोटि में पलकर्ण x इ० शुं ————————— = इष्ट हृति । १२ इष्ट हृ० x त्रि० त्रिज्यावृत्त में इष्ट हृति = ————————— = त्रिज्या वृत्तीय ह० दृ० द्यु उत्थापन देने से पलक x इ शं x त्रि ————————— = इष्टान्त्या । १२ x द्यु दिनार्ध काल में अन्त्या का स्वरूप = त्रि ± चरज्या इष्टान्त्या स्वरूप में १२ से हरभाज्य को गुणा करने से : त्रि x १२ यतः, —————— = १२ + .... द्यु शं x प० क x त्रि x १२ —————————— यहाँ पर १२ अ शंकु को त्रिज्या से गुणा कर द्युज्या से १२ x द्यु x १२ भाग देने पर लब्धि तो १२ अवश्य मिलेगी क्योंकि त्रि > द्यु । अर्थात् द्युज्या से त्रिज्या सदा बड़ी होती है ? इस प्रकार मेषादि तीनों राशियों की १५ पन्द्रह पन्द्रह अंश भुजज्या वशेन, ४। १।१।७।८।१३।५ खण्ड निरक्ष देश में चरखण्ड होते हैं । इन चरखण्डों को पलकर्ण से गुणा करने तथा १२ से भाग देने से अपने अक्षांश देशीय चर खण्ड होते हैं जो पूर्वस्वरूप से सुस्पष्ट होता है ।

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