सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 560, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें४५८ गोलाध्याये पूर्व पश्चिम में अग्रा, अग्राग्रगत सूत्र = स्वोदयास्त सूत्र । प्राक्क्षितिज में अग्राग्र बिन्दु पर उदित सूर्य, जैसे जैसे अहोरात्र वृत्त में उदय से ऊर्ध्वंङ्गत होता है, वैसे वैसे केन्द्र स्थापित यष्टि मूल से अग्र तक भ्रमण कराने से यष्टि की छायाशून्यता होता है क्योंकि यष्टि के अग्रभाग में सूर्य बिम्ब है । अतः अग्राग्र से सूर्य तक अहोरात्र वृत्त में गणनया जो जो घटिका होती हैं वही दिन गत घटिका गणनया स्पष्ट होती हैं । गोल आकाश में द्युज्यावृत्त लिखा नहीं जा सकता अतः अग्राग्र और यष्टि अग्र का अन्तर अंगुल से मापा गया है, अतः भूमि पर प्रदर्शित द्युज्यावृत्त में गणनया उपलब्ध ज्या रूप अंगुल मान का चाप द्युज्यावृत्त में प्रदर्शित घटिकाओं का मान होता है । यहीं दिनगत घटिका होती है स्पष्ट है ।।२८-२९-३०।। अथान्यदाह— यष्टयग्रप्रालम्बोना ज्ञेया दृग्ज्या नृकेन्द्रयोर्मध्ये । वा० भा०—नष्टद्युतेर्यष्टेरग्रादधो यावान् लम्बस्तावंस्तस्मिन् काले शङ्कुः । शङ्कुकेन्द्रयोर्मध्ये दृग्ज्या ज्ञेया । शङ्कुप्राच्यपरयोरन्तरं बाहुः । प्रागपराशा- नरान्तरं बाहुरिति वक्ष्यति । मरीचिः—अथाऽतीतघटीनां शुद्धयवगमाय शङ्कुदृग्जयोर्ज्ञानं पलभाया अज्ञानेऽग्रा- ज्ञानाभावात्कथमस्माद्यन्त्रात् कालसाधनमित्याशङ्क्योत्तररूपमग्राज्ञानं चाऽस्यैवाऽऽह—यष्ट्य- ग्रालम्बोनेति । यष्टयग्रात् । नष्टद्युतेर्यष्टेरग्रादित्यर्थः । लम्बो भूमिपर्यन्तं लम्बायमान- मन्तरम् । ना इष्टकाले शंकुः । तथा चास्मात्किंचित्स्थूलाद्भूपृष्ठशङ्कोस्त्रिप्रश्नोक्तविधिना घटद्यः स्वल्पान्तरेण पूर्वागतघटीतुल्या इति शुद्धिः । त्रिप्रश्नोक्तप्रकारस्य भूगर्भे सूक्ष्मत्वा- दिति भावः । केदारदत्तः—शङ्कु ज्ञान— नष्ट छाया की यष्टि के अग्र भाग से नीचे जो लम्ब होता है वह उस समय में इष्ट शङ्कु होता है । शंकुमूल से केन्द्र तक दृग्ज्या, शङ्कु मूल और पूर्वापर सूत्र का अन्तर भुज पूर्व में सिद्ध हो चुका है ।।३०१/२।। केवलदिग्ज्ञाने सत्यक्षभामाह— उदयेऽस्ते यष्टयग्रप्राच्यपरामध्यमग्रा स्यात् ॥३१॥ शङ्कूदयास्तसूत्रान्तरमर्कगुणं नरोद्धृतं पलभा । वा० भा०—उदयकालेऽस्तकाले वा यष्टिर्नष्टद्युतिर्ध्रियमाणा सकलैव भूग्ना स्यात् । एवं यष्टद्यग्रप्राच्यपरयोरन्तरं त्रिज्यावृत्ते ज्यार्धवत् स्थितम् । साऽग्रा ज्ञेया । ततः प्राग्वदुदयास्तसूत्रमिष्टकाले शङ्कुश्च । शङ्कूदयास्तसूत्रयोरन्तरं द्वादशगुणं शङ्कुना भक्तं पलभा स्यात् । Indological Truths