सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीनान्त तक सूर्य का परम भुजांश ३ राशि तक होता" Wait, "धनुषान्त" or "धनुषान्त,"? Yes, comma.
L30: "है तो वेध से सिद्ध उक्त रवि भुजांश को वर्ष के किस चरण में माना जायगा ? संशय"
L31: "निराकरण के लिये, मेषादि सूर्य में उक्त भुजांश ही स्वयं स्पष्ट रवि हैं । वर्ष के दूसरे"
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साधितोऽस्मात्कारणात् । दिग्देशांशो । आद्यशब्दात्क्रान्तिज्याख्यादिसाधनम् । चकारान्न सद्भवत्यत एव तदुपेक्ष्य मया भिन्नमार्गेणाग्रादिज्ञानमुपकल्प्योक्तम् । दिने छायाग्राणां बहुत्वसंभवाद्द्रुतभिन्नभित्रितयेन प्रत्येकं छायाभ्रमवृत्तं भिन्नं भवतीति दक्षिणोत्तररेखाया अपि भिन्नत्वम् । न वा सर्वच्छायाभ्रमणवृत्तानां याम्योत्तररेखायामेकत्र संपातो येन मध्याह्नच्छायानिश्चयज्ञा