सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० गोलाध्याये चरण में वेध से प्राप्त रवि भुजांश है तो उक्त भुजांश ६ राशि में घटाने से और तृतीय चरण में ६ राशि जोड़ने से और चतुर्थ चरण में १२ राशि में घटाने से स्पष्ट सूर्य का ज्ञान होता है । मकरादि २, दो राशियों के सूर्य में शिशिर, मीन मेष के सूर्य में वसन्त, वृष मिथुन के सूर्य में ग्रीष्म, कर्क सिंह के सूर्य में वर्षा, कन्या तुला के सूर्य में शरद और वृश्चिक धनु के [सूर्य में हेमन्त ऋतु होती है, इस प्रकार रवि भुजांश ज्ञान से मेषादि द्वादश राशिगत सायन सूर्य का ज्ञान होता है । कुछ आचार्यों ने छाया भ्रमण से अर्थात इष्ट काल में १२ अंगुल शंकु की तीन समय की छाया, ज्ञान कर तीनों छायाग्रों लम्ब रेखाओं के (मत्स्य मुख पुच्छ रेखा) योगादि सम्बन्ध से छायाग्रत्रितयसूत्रस्पृक् परिधि में छाया का भ्रमण आदि (भाभ्रम) छाया भ्रमण वृत्तात्मक परिधि मार्ग में बताया है। स्वल्पान्तर से एक दिन सम्बन्धिनी अभीष्ट छाया भ्रमण वृत्त में हो सकता है। क्रान्तिगति का एकरूप वेग न होने से छाया का भ्रमण वृत्त में न होकर वृत्तों के वलयादि परिवलयादि मार्गों में होता है इत्यादि। विस्तारभय से यह विषय यहाँ अलम समझ कर विशेष ज्ञान के लिये म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी विरचित दिङ्मीमांसा, भाभ्रम आदि ग्रन्थों को देखना चाहिए। तथा—उक्त प्रकार से वेधज्ञान से साधित स्पष्ट सूर्य का मान चल मेषादि, (नाडी क्रान्तिवृत्त का वर्त्तमान सम्पात) से होता है । यतः सारा फलित ज्योतिष निरयण गणना से होने से वेधसाधित उक्त स्पष्ट रवि में पात नाम अयनांश कम करना चाहिए, जिससे अहर्गण से साधित स्पष्ट रवि के तुल्य फलादेश के उपयोग का स्पष्ट रवि हो जावेगा । सौरसिद्धान्तानुसार पात नाम अयन की दोलायमान गति स्थिर सम्पात से :- २७° अंश पूर्व पुनः २७° पश्चिम पुनः २७ अंश पश्चिम और पुनः २७° पूर्व एवं २७ × २ = ५४ तथा ५४ × २ = १०८ अथवा २७ × ४ = १०८ अंश पूर्व पश्चिम सम्पात चलन से अयनांश का १ भगण होता है अतः ऐसी परिस्थिति में वेधसिद्ध सूर्य स्पष्ट को पात में कम करने से निरयण स्पष्ट रवि होता है । ततः स्पष्ट रविज्ञान से विलोम विधि से मध्यम रवि और मध्यम रवि ज्ञान के अनन्तर मध्यम रवि से विलोम से अहर्गण ज्ञानकर अहर्गण ज्ञान के अनन्तर विलोम विधि से कल्पगत सौर वर्षों का ज्ञान करना चाहिए ॥३७॥३८॥३९॥ इदानीं धीयन्त्रं विवक्षुरादौ तत्प्रशंसामाह— अथ किमु पृथुतन्त्रैर्धीमतो भूरियन्त्रैः स्वकरकलितयष्टेर्दत्तमूलाग्रदृष्टेः । न तदविदितमानं वस्तु यद्दृश्यमानं दिवि भुवि च जलस्थं प्रोच्यतेऽथ स्थलस्थम् ॥४०॥