सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋतुवर्णनाध्यायः ५२३ केदारदत्तः—यन्त्राध्याय के श्लोक ३६ में आचार्य ने यन्त्रों और गणित की युक्तियों से स्पष्ट सूर्य का भुजांश ज्ञान किया है । स्पष्ट है कि एक सौर वर्ष में, मेषादि राशित्रय से....कर्कादि, तुलादि....मकरादि....तीन तीन राशियों की स्पष्टसूर्य की स्थिति में वर्षके चार ४ समयों में भुजांशों की एकता होती है तो, आगत सूर्य भुजांश से, सूर्यस्पष्ट की कालस्थिति क्या है ? यह ज्ञान कैसे होगा ? तो आचार्य ने प्रकृति लक्षणों के अनुसार ऋतुओं के ज्ञान के आधार से साधित सूर्य भुजांश से मेषादि मीन पर्यन्त रवि स्पष्ट ज्ञान का समीचीन उपाय बताया है कि वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर और हेमन्त इन ऋतुओं का प्रत्येक ऋतु का वर्ष में दो-दो मास के लिये आगमन होता है, अतएव खगोलज्ञ गणक ने ऋतुओं की प्राकृतिक उपलब्ध प्रत्यक्ष स्थिति से स्पष्ट रवि की राश्यादि का ज्ञान कर लेना चाहिए । क्योंकि मकर कुम्भ के सूर्य में शिशिर, मीन मेष के सूर्य में बसन्त, वृष, मिथुन सूर्य में ग्रीष्म, कर्क-सिंह के सूर्य में वर्षा और कन्या तुला के सूर्य में शरद ऋतु होती है । खगोलग्रहगणित मर्मज्ञ होते हुये भी अलङ्कार शास्त्र के अपने प्रौढ़ पाण्डित्य परिचय के लिये आचार्य ने— ‘“ऋतुचिह्नैर्ज्ञानं स्यादृतुचिह्नानि अग्रे वक्ष्ये’’ इत्यादि से आचार्य ने इस अवसर पर, वसन्तादि ६ ऋतुओं का वर्णन करते हुये ब्रह्म- रसास्वादप्रद-ग्रहगणितगोलशास्त्र के साथ अलङ्कारादि अनेक शास्त्र ज्ञान का अर्थात् सर्व शास्त्रज्ञता का परिचय दिया है । ऋतु वर्णनों में अद्यावधि विद्वानों की लेखनी निरन्तर चल रही है चलती रहेंगी । प्रकृत विषय से ऋतुवर्णन का कोई सम्बन्ध नहीं है, ग्रन्थ विस्तार भय और समय की न्यूनता से तथा यहाँ पर इस विषय की अनावश्यकता वश इसका हिन्दो व्याख्यान नहीं किया जा रहा है । तथा संस्कृत के मरीचि भाष्य से, जो इस सम्बन्ध का यहाँ दिया जा रहा है इससे ही अलङ्कार शास्त्रज्ञों की मनस्तुष्टि अवश्य होगी जो पर्याप्त है । १३।१४।१५॥ इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के ऋतुवर्णनाध्यायः १२ की श्री पंडित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोप- पत्तिक "केदारदत्तः" हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।