सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभवेत्स गुणकः कुट्टक इति पूर्वेषां व्यपदेशात् । तत्प्रकारेणेत्यर्थः । चः पूर्वार्थपरः । यद्यपि पाटीबीजयोः कुट्टकनिरूपणात्कुट्टकेनेति पृथगुद्देशोऽनुपपन्नस्तथाऽपि तन्निरपेक्षेणापि कुट्टकस्य प्रधानतया प्रश्नोत्तरसाधकत्वात्पृथगुद्देशः । वर्गप्रकृत्या । वर्गप्रकृतिप्रकारेणेत्यर्थः । चः पूर्वार्थपरः । अस्या अपि पृथगुद्देशः प्रधानतया प्रश्नोत्तरसाधकत्वात् । पूर्वैराचार्यैः । आर्यब्रह्मगुप्तादिभिः । कथितानि । गोलेन । गोलस्थितिज्ञानेन । यन्त्रैः प्रागुक्तैः । तथा कथितानीत्यर्थः । तथा च प्रश्नोत्तरा- णामुक्तषट्प्रकारान्यतमरीत्या संभवात्कल्पकत्वं संभवत्येवेति भावः । गोलेन यन्त्रैरित्यनेनोद्देशक्रमेण प्रश्नोत्तरकथने गोलयन्त्राभ्यामुत्तरदानमशक्यम् । पूर्वं तदज्ञानादिति यन्त्रनिरूपणानन्तरं प्रश्नाध्यायकथनं युक्ततरमिति सूचितम् । एतेन प्रश्नाध्यायः पूर्वग्रन्थसिद्धो न मत्कल्पित इत्यपि सूचितम् । अत्राध्याये उत्तरकथनेऽपि न सोत्तरप्रश्नाध्यायत्वं किन्तूत्तराणामपि प्रश्नसापेक्षत्वात्प्रश्नाध्यायत्वं प्राधान्यादिति ध्येयम् ॥२॥ **केदारदत्तः—**प्रश्नाध्याय का व्याख्यान तथा प्रयोजन कहा जा रहा है— कोई भी गणक, गोलगणिततत्त्वज्ञ ज्योतिर्विदों के समाज में, गणित ग्रहगोल सम्बन्धी प्रश्नों के बिना उत्कृष्ट तत्वार्थज्ञता की पदवी नहीं प्राप्त कर सकता है । अतएव नाना प्रकार की चातुर्यकला में चतुर विद्वानों की प्रीति प्रदान के लिये तथा जिन गणितज्ञों की दीर्घकालीन कुत्सित गर्व (अहंकार) रूपी पर्वत की चोटी आरोहण में प्राप्त प्रसिद्धि भी जिन प्रश्नों के श्रवण मात्र से ही सुवर्णवर्णवत् वदन के ज्योतिषी गणों की आकृति भी क्षण भर के लिये विकृत सी हो जाती है उस प्रश्नाध्याय का व्याख्यान आचार्य से हो रहा है ॥१॥ पाटीगणित (अंकगणित) और बीजगणित में वर्णित, प्रसिद्ध कुट्टक व वर्ग प्रकृति सदृश श्रेष्ठ गणितों से महाप्रश्नों के आधार से तथा ग्रहगोल वर्णित अनेकों यन्त्रों के आधार से बाल जनों के बोध के लिये (बालजन का अर्थ अवस्था से बाल्यता नहीं, अर्थात् जो अवस्था सम्पन्न युवक या वृद्ध भी इस विषय को नहीं जानता वह सभी बाल शब्द से उच्चरित होते हैं ऐसा शास्त्रज्ञों का मत है ।) (अनधीत शास्त्रम्–बालः) आचार्य स्वयं यहाँ पर प्रश्नाध्याय के कुछ प्रश्नों का व्याख्यान करने जा रहे हैं ॥२॥ अथ बुद्धिमतः प्रशंसामाह— अस्ति त्रैराशिकं पाटी बीजं च विमला मतिः । किमज्ञातं सुबुद्धीनामतो मन्दार्थमुच्यते ॥३॥ वर्गं वर्गपदं घनं घनपदं संत्यज्य यद्गण्यते तत्तैराशिकमेव भेदबहुलं नान्यत्ततो विद्यते ।