सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र वियोगजयोर्लब्धिगुणयोर्वक्ष्यमाणत्वादत्र योगजयोरेव प्रतिपादनं युक्तम् । अत उक्तमेवं तदैवात्र यदा समस्ताः स्युर्लब्धयः इति । विषमलब्धिषु पुनर्वियोगजौ लब्धिगुणौ सिध्यतोऽपेक्षितौ च योगजौ । अतो रूपशेषभाज्ये क्षेपस्य वियोगगुणत्वाद्योगे च क्षेपो- नहरस्य गुणत्वाच्च वियोगजौ गुणौ हराच्छुद्धौ योगजौ गुणौ भवेद्नयैव रीत्या वियोगजा ‘ स्युर्लब्धयश्चेद्विषमास्तदानीं यथागतौ लब्धिगुणौ विशोध्यौ । स्वतक्षणाच्छेषमितौ तु तौ स्तः’ ।। इत्यलं पल्लवितेन ।। ११ ।। केदारदत्तः— ११ प्रश्न का समाधान— उद्दिष्ट अधिमासावमशेषादि के योग को ८६३३७४४९१६८४ से गुणाकर उस गुणन- फल में १६०२९९८९९९९९९ से भाग देने से गत चान्द्र दिन हो जाते हैं । चान्द्र दिन ज्ञान के अनन्तर सावन दिन ज्ञान पूर्वोक्त अह