सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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प्रश्नाध्यायः ५५७ उपपत्ति—एको हरश्चेदगुणको विभिन्नो-भास्करीय बीज गणित के अनुसार में गुणको विभिन्नौ की जगह बहुत गुणकों का ऐक्य = गुणांक । शेषों का ऐक्य = फलैक्य । १ अहर्गण मान कर ग्रहों का भगणादि शेष ज्ञात कर इस ऐक्य में युगावम जोड़ने से लब्ध फल = भाज्य । कल्प कुदिन = हर । उद्दिष्ट योग ३६ = ऋण क्षेप । भाज्य हार और क्षेप में ४ से अपवर्तन देने से लाघव समझा गया है। तब कुट्टक से लाघव से लब्ध गुणक-२१३६२७२०३ होता है ॥१३॥१४॥१५॥१६॥ इदानीं निरग्रचक्रादपि ग्रहादहर्गणमाह— लिप्तार्धं दशयुग्भवन्ति विकलास्तासां वियोगस्त्रियुग्- भागा भागदलं गृहाणि शशिनः खत्रीन्दवस्तद्युतिः दृष्टा चन्द्रदिने कदा वद पुनस्तादृक् च काव्याह