सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५६ गोलाध्याये तष्टफलाभावादुद्दिष्टतादृशयुत्या गुणितेऽपि फलसाम्यनिर्णयादुक्तप्रकारेणाहर्गणसिद्धेर्लब्धि- निबन्धनस्य व्यर्थत्वात् । नन्वेवं हरेण संयुतो यावद्द्वेदीप्सित इत्यस्य व्यर्थतापत्तिः । उद्दिष्टयुतेः प्रथमा- हर्गणतः संवादात्पूर्वमेवेप्सितसिद्धेरिति चेन्न । दृढकुदिनतष्टेऽहर्गणस्यावश्यं तन्न्यूनत्वायुगे ततोऽधिकस्यापि संभवादभीष्टकाले तन्न्यूनोऽहर्गण उद्दिष्टसिद्धावपि वारासंवादादसिद्ध इति तस्मिन्निष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते इत्यादिना दृढकुदिनानि क्षिप्तानि । तादृशाहर्गणस्यापि गुणत्वात्तत उद्दिष्टसिद्धेः । एवं तत्रापि वारासंवादे स्वत्रक्षण- योजनमुचितमिति हरेण संयुतो यावद्द्वेदीप्सित इत्युक्तम् । नतु तष्टफलसंशयेन कदाचि- द्गुणेऽधिकफलग्रहणस्याहर्गणरूपस्य सिद्ध्यर्थमेतदुक्तम् । युगकुदिनानां परमाहर्गणत्वा- दुक्तरीत्या तदन्तर्वतिनियताहर्गणेषु स्वाभीष्टाहर्गणात्पूर्वाहर्गणात्पूर्वाहर्गणे उद्दिष्टा- सिद्ध्यापत्तेः । न ह्यगुणादुद्दिष्टसिद्धिः । अत एव गुणरूपाहर्गणेभ्य उद्दिष्टसिद्धावपि वारसंवादात्त- दन्यतम एवाभीष्टकालेऽहर्गणः । नान्यो वारासंवादादित्यलं पल्लवितेन ।।१३।१४।१५।१६।। केदारदत्तः—महाप्रश्नाध्याय में अन्य प्रश्न और समाधान— चंद्र सूर्य मंगल वृहस्पति के मध्यम, और बुध भार्गव के शीघ्र केन्द्रों और शनि ग्रहों का मध्यम इत्यादि ग्रह साधन के अवसर पर भगण शेष, अंश शेष और ग्रहों के विकलादि शेष जो पृथक् पृथक् होते हैं इत्यादिकों का ज्ञान धीवृद्धि तन्त्र के अनुसार जानकर पूर्व सिद्ध अहर्गणानुसार न्यूनदिवस, शेष कुदिनों से तष्टित योग ३६ के तुल्य देखकर जो पटुमति गणितज्ञ उक्त सातों ग्रह, और अहर्गण का ज्ञान कर सकता है उसे गणितज्ञों की सभा में सिंह की उपाधि से संमानित करता हूँ । उद्दिष्ट योग में, कल्प कुदिन से १५७७९१७५०० से तष्टित करने पर यदि न घटता है । तो प्रश्न ही गलत समझना चाहिए । लब्ध फल को २९३६२७२०३ से गुणा कर ३०४८४७९३७५ से भाग देकर जो शेष उसे हर में जोड़ देने मे ईप्सित अहर्गण होगा उदाहरण से— हे मिश्र ! सभी ग्रहों के भगणादि शेष योग = ३५ है। धीवृद्धिद तन्त्र मे यही अवमशेषादि ऐक्य भी कहा गया है । इसे कुदिनों से तष्टित करने पर १४९१२२७५०० के तुल्य होता है तो बताओ गुरु दिन या चन्द्र दिवस या मंगल ग्रह के मंगल वार के दिन अहर्गण मान क्या होगा ? लल्लाचार्य प्रणीत धीवृद्धिद तन्त्र में, अवम शेष युक्त ग्रह भगणादि शेष में अवमशेष योग = १४९१२२७५००, उद्दिष्ट इस अंक में ४ का भाग देने से २९३६२७२०३ से गुणा करने पर और ४ से भाग देने से इसमें ३९४८४७९३७५ से भाग देने पर शेष संख्या तुल्य अहर्गण मंगलवार को १०००० होता है । द्विगुणित हर जोड़ने से सोमवार के दिन ७८८९६८७५० तथा त्रिगुणित हर जोड़ने से ११८४३४४८१२५ गुरु दिन में होता है ।