सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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र्कैः" or "खाभ्रषष्ट्यङ्कर्कैः"? Look at the first two aksharas: ख ा भ्र (khābhra)! Wait, is it "खाभ्रषष्ट्यङ्कर्कैः" or "खाभ्रषष्ट्यङ्कार्कैः"? Look at 'ङ्कार्कैः': ङ्का (ṅkā) with repha? No, look: ङ्क (ṅka) with repha? Wait, line 3 says: "खषष्ट्यङ्कार्कमितो" (no, wait! Line 3 says: "खषष्ट्यङ्कार्कमितो"). Here in line 26: ख ा भ्र ष ष्ट्य ङ्का र्कै ः -> wait, is there an aa-matra after ङ्क? Wait, 1296000 is: ख (0) अभ्र (0) षष्टि (60) अङ्क (9) अर्क (12) -> 12, 9, 60, 0, 0 = 1296000! "खाभ्रषष्ट्यङ्कार्कैः" Let's look closely at line 26: ख - ा - भ्र - ष - ष्ट्य - ङ्का - र्कै - ः Yes, "खाभ्रषष्ट्यङ्कार्कैः"!
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