भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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५७८ गोलाध्याये भूपरिधि ───── = १२० अंश की भुज ज्या २९७७। कोटिज्या = १७१९ पूर्ववत् धारा से ३ पूर्व नगर के अक्षांश ११।५।० ईशान में ५१।५४।३, अग्नि दिशा में ४९।१८।२४। उपपत्ति—अभीष्ट दिशास्थ नगर के खमध्य तक दृङ्मण्डल करने पर खस्वस्तिक = स्व स्थान। अपसार योजन सम्बन्धी अंशों के पूर्व में बिन्दु कर, ध्रुव से अभीष्ट नगर चिह्न पर नीयमान वृत्ताकार सूत्र का विषुवद्वृत्त के साथ जहाँ सम्पात होगा वहाँ से अभीष्ट नगर खमध्य तक ध्रुव वृत्त में अक्षांश होते हैं स्पष्ट है। अपसार योजन अंशों के और दिगंश के ज्या के अनन्तर अनुपात से— दिग्ज्या × अपसार योजन अंशों में ──────────────── = स्वनगर खमध्य में ज्या रूप याम्योत्तर अन्तर त्रिज्या = भुज। नगर ओर भूमध्य वृत्तों के अन्तर के तुल्य सर्वत्र विषुवद्वृत्त से उत्तर की तरफ अहोरात्र का क्षितिज वृत्त के सम्पात बिन्दु से पूर्व बिन्दु तक में अग्रा, उन्मण्डल के साथ सम्पात बिन्दु से पूर्वापर कोटि रूप अन्तर = क्रान्ति = अक्षांश सिद्ध होते हैं। अपसार लव कोटि, नगर चिह्न से लम्ब = शङ्कु। शं × पलभा ──────── = शङ्कुतल। उत्तर गोल में उत्तर भु × शंत = अग्रा। विपरीत १२ १२ × अग्रा संस्कार से ──────── = क्रान्ति ज्या रूप = अक्ष ज्या का चाप अक्षांश सिद्ध होते पलकर्ण हैं ॥२८॥ अथोक्तानपि प्रश्नानेकीकर्तुमाह ॥ मित्र मित्रस्त्रिनेत्रस्य दिग्युद्गमं याति यत्र त्रिनेत्रक्षमध्यस्थितः । तत्र मे तान्त्रिकाक्षुब्धमक्षप्रभां क्षिप्रमाचक्ष्व दक्षोऽसि गोले यदि ॥२९॥ एकद्वित्रिचतुःपञ्चषड्भिर्यत्रोदितो रविः । मासैरस्तमयं याति तत्राक्षांशान् पृथग्वद ॥३०॥ द्युज्यकापमगुणार्कदोर्ज्यकासंयुतिं खखखबाणसंमिताम् । वीक्ष्य भास्करमवेहि मध्यमं मध्यमाहरणमस्ति चेच्छ्रुतम् ॥३१॥ द्युज्यापक्रमभानुदोर्गुणयुतिस्तिथ्युद्धृताब्ध्याहता स्यादाद्यो युतिवर्गंतो यमगुणात् सप्तामरा ३३७ प्तोनिताः । नागाद्रचङ्गदिगङ्कुकाः ९१०६७८ पदमतस्तेनाद्य ऊनो भवे- दृचासार्धेऽष्टगुणाम्बिपावकमिते क्रान्तिज्यकातो रविः ॥३२॥