सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥ सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय खगोल गणित का एक अध्ययन यज्ञानुष्ठान की सफलतापूर्वक परिसमाप्ति हेतु ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान अपेक्षित है । उसका समारम्भ और समाप्ति अनुकूल ग्रहज्ञान की आधारभूमि पर अधिष्ठित है । अणुवादी विचारधारा, ग्रहण का अध्ययन, पृथ्वी की परिभ्रमण गति और दशमलव पद्धति के विचार का उत्स यही है । आर्च ज्योतिष के अनुसार :— वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः । तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम् ॥ अर्थात् वेदों का प्रधान विषय यज्ञ संपादन है और यज्ञ के आरम्भ से उसकी समाप्ति तक सफलता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि ग्रहों की गति को लक्ष्यकर तथा उसे आधार बनाकर उनका आरम्भ किया जाता है, जिसकी सम्पूर्ण सूचना ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से मिलती है । परम्परया, ज्योतिषशास्त्र के प्राचीनतम सिद्धांतों की प्राप्ति हमें शुल्व सूत्रों से होती है। "शुल्व" शब्द 'नापने का डोरा' का द्योतक है, जिसके माध्यम से ज्यामिति, रेखागणित और ज्योतिष के सूत्रों का निदर्शन होता है । शिक्षा, व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि, ये सभी शास्त्र 'वेद' के अंग होने से उक्त शास्त्र 'वेद' मूलक है । अतः ज्योतिषशास्त्र के तीनों स्कन्ध वेदमूलक होने से परिष्कार रूप में वेदों के आशय को स्पष्ट करने के लिए वेद के षडंग शास्त्रों में ज्योतिष 'वेद' विद्या का चक्षुस्थानीय कहा गया है जिसकी मुख्यता भी कही गई है कि 'सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधा- नम्' । पुरुष का नेत्र ही मुख्य अंग है । 'वेद' के मुख्य अंग ज्योतिष स्कन्ध में भास्करा- चार्य विरचित 'सिद्धांतशिरोमणि' ग्रन्थ का स्थान सर्वोपरि माना गया है । श्री भास्कराचार्य विरचित 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ का महत्व ११ वीं शताब्दी से आज तक अबाधगति से चला आ रहा है । ऐसे महान ग्रहगोलज्ञ का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक है । 'आर्यभट्ट' और उनकी परम्परा के 'लल्लाचार्य', 'वराहमिहिर', 'मुञ्जाल', द्वितीय 'आर्यभट्ट' तथा 'ब्रह्मगुप्त' के पश्चात् सह्यपर्वत के निकट विज्जड़विड (ऐति- हासिकों के मतानुसार आधुनिक बीजापुर) नामक स्थान में शांडिल्य गोत्रीय श्रीमान महेश्वर उपाध्याय के घर में १०३६ शक संवत में भारतवर्ष के 'भूषण' के रूप में साक्षात् भास्करावतार आचार्य 'भास्कर' उत्पन्न हुये थे । विष्णु पुराण ग्रन्थ के पद्यों के