सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिक प्रमाणभूत दृष्टांतोंसे, तथा मिताक्षरा के—‘‘यस्मात् क्षुब्ध प्रकृतिपुरुषाभ्याम्’’ श्लोक की मिताक्षरा में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युन और अनिरुद्ध नामक मूर्ति भेदों का वैष्णव आगमों में विशेष समादर होने से, ये ‘‘कर्णाटक’’ वैष्णव ब्राह्मण थे, ऐसा अनुमान लगाया जाता है। श्री भास्कराचार्य ने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के ‘बीजगणित’ भाग के उपसंहार में लिखा है कि उनके गुरु उनके पिता ‘‘श्री पं० महेश्वर उपाध्याय’’ ही थे। क्योंकि ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ की प्राचीन प्रतिलिपियों में अध्याय समाप्ति पर ‘‘महेश्वरोपाध्यायसुत भास्कराचार्य विरचिते’’ लेख मिलता है। श्री भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के चार विभाग हैं—१—लीलावती (अंकगणित), २—बीजगणित, ३—ग्रहगणिताध्याय एवं ४—ग्रहगोलाध्याय। वस्तुतः ‘सिद्धांतशिरोमणि’ के प्रसिद्ध चार विभागों में ग्रहगोलगणित का महत्व शीर्षस्थ है, जो आज भी निर्विवाद और निर्भ्रान्त रूप में सर्वविदित और सर्वमान्य है। श्री भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के चार विभाग है जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, यहां उनके सामान्य परिचय के साथ ‘ग्रहगोलाध्याय’ का सांगोपांग विवेचन करना मेरा अभीष्ट है। इस विवेचन से पूर्व के अन्य विभागों पर दृष्टिपात करना आवश्यक होगा—
सिद्धान्तशिरोमणि एवं लीलावती (अंकगणित)
भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ का प्रथम भाग ‘लीलावती’ है। ‘लीलावती’ में हमें पाटी-गणित अर्थात् अंकगणित के क्षेत्र में भास्कराचार्य के वैदुष्य का अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिलता है। गणित जैसे कठिन विषय को भास्कराचार्य ने ‘लीलावती’ के माध्यम से सुन्दर सरल काव्य का रूप देकर बुद्धिमान गणितज्ञों के लिए सुसरल काव्य की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया है। इसीलिए उन्होंने ग्रंथारम्भ के मंगलाचरण में श्री गणेश जी की स्तुति करते हुये कहा है कि— प्रीतिं भक्तजनस्य यो जनयते विघ्नं विनिघ्नन् स्मृत- स्तं वृन्दारकवृन्दवन्दितपदं नत्वा मतङ्गाननम् । पाटीं सद्गणितस्य वच्मि चतुरप्रीतिप्रदां स्फुटां संक्षिप्ताक्षरकोमलामलपदैर्लालित्यलीलावतीम् ॥ ‘लीलावती’ के प्रारम्भ में आचार्य ने तत्कालीन ई० सन् १११४ के समीप के वाराटक, काकिणी, पण, द्रुम, निष्क, गुञ्जा, माषा, कर्ष, पल, अङ्गुल, हस्त, दण्ड, क्रोश, योजन, निर्वर्तन (वीघा), खारिका, द्रोण, आढक, प्रस्थ और कुडव आदि सुवर्ण, रजत, तौल, भूमिनाप आदि के पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख करते हुये दशगुणोत्तर अंको की नामावली का भी वर्णन सुन्दर तरीके से किया है—