भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ३ ) एकदशशतसहस्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः क्रमशः । अर्बुदमब्जं खर्वनिखर्वमहापद्मशङ्कवस्तस्मात् ॥ जलधिश्चान्त्यं मध्यं परार्धमिति दशगुणोत्तराः संज्ञाः । संख्यायाः स्थानानां व्यवहारार्थं कृताः पूर्वैः ॥ अर्थात्— एक = १ दश = १० शत = १०० सहस्र = १००० अयुत = १०००० लक्ष = १००००० प्रयुत = १०००००० कोटि = १००००००० अर्बुद = १०००००००० अब्ज = १००००००००० खर्व = १०००००००००० निखर्व = १००००००००००० महापद्म = १०००००००००००० शंकु = १००००००००००००० जलधि = १०००००००००००००० अन्त्य = १००००००००००००००० मध्य = १०००००००००००००००० परार्ध = १००००००००००००००००० उपरोक्त प्रकार से और आगे "अनंत" (न अन्त = अनन्त = ब्रह्म) अंक का स्थानीय मान बताया है । “अंकानां वामतोगतिः” यह सिद्धांत सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र के व्यवहार में आता है । इसमें भी एक रहस्य यह है कि १ (एक) अंक के आगे एक ० (शून्य) देने में, १ (एक) को बाँये ही लिखने से १ (एक) का दशगुना और दो शून्यों के बाँये एक लिखने से १०० हो जाता हैं। इसी प्रकार प्रत्येक दश स्थानीय एक या कोई भी अंक वाम होने से उत्तरोत्तर दशगुणित अंक मान वृद्धि से अनंतत्व का बोध होता है । पुरुष स्थानीय अंक से वामगतिक स्त्री स्थानीय अंक के विन्यास से दशगुणित वृद्धि होती रहती है, यही सृष्टि क्रम है। अतएव स्त्री माया, आद्या, शक्तिमयी, वामगामिनी,