सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८८ ) अथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप इंगलिश भाषा का भी अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त कर लिया था और तत्कालीन प्रौढ़ इंगलिश गणितज्ञों में श्री सुधाकर जी का परस्पर पौर्वात्य और पाश्चात्य गणितों की विवेचना भी हो जाया करती थी । इसी बीच ई० सन् १८८३ के राजकीय संस्कृत कालेज बनारस में ऐशिया की हस्त लिखित पुस्तकों की सबसे बड़ी लाइबरेरी (पुस्तकालय) ‘सरस्वती भवन’ में पं० सुधाकर जी की नियुक्ति पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर हुई थी । ता० १६-२-१८८७ को महारानी विक्टोरिया जुबुली महोत्सव के अवसर पर इस महान् खगोल शास्त्री को महामहोपाध्याय पदवी से विभूषित किया गया था । सन् १८८९ में पं० बापूदेव शास्त्री के अवकाश ग्रहण के पश्चात् इनकी उत्तम वैदुष्य पूर्ण शास्त्र सेवा पुरस्कार में इन्हें उनके स्थान पर गणित का प्राध्यापक नियुक्त किया गया । बनारस क्वीन्स कालेज के गणित प्राध्यापक मिस्टर एम० एन० दत्त की नियुक्ति स्कूल इन्स्पेक्टर पद पर हो जाने से मैथमेटिक और इन्डियन ऐस्ट्रोनामी (Indian Astronomcy) के कक्षाओं को शिक्षण देने का गुरुतम कार्य (ऊँची कक्षाओं को गणित पढ़ाना) पं० सुधाकर जी को सौंपा गया था । पहिले इनके वेष भूषा से छात्रों को कुछ अश्रद्धा सी हुई, किन्तु पहिले ही दिन के पढ़ाने से सर्व साधारण आश्चर्य चकित हो गये, और तदनुसार छात्र समुदाय बड़ी सावधानी से दत्त चित्त होकर बड़ी श्रद्धा से इनकी कक्षाओं में जाकर गणित पढ़ने लगे । बगलबन्दी, धोती और पगड़ी के वेश में गणित की ऊँची कक्षाओं में ऊँचे स्तर के परिष्कारों के साथ पाठ पढ़ाने वाला यही एक भारतीय था, जो ग्रहगोल गणित का विद्वान् ज्योतिषी और काशी का एक प्रसिद्ध पण्डित था । इनसे गणित पढ़ कर छात्रों का गणित में परिश्रम करने में मन लगता था और प्रायः सभी छात्र अच्छी श्रेणियों में उत्तीर्ण होते थे । सम्भवतः इस समय ये सब परी- क्षाएँ कलकत्ता यूनीवर्सिटी से सम्बद्ध थीं । संस्कृत तथा हिन्दी वाङ्मय में सुधाकर द्विवेदी रचित ग्रन्थ (गणित ज्योतिष) सर्व प्रथम श्री सुधाकर जी के रचित व शोधित ग्रन्थों की एक सूची का पाठकों के समक्ष उपस्थित करना उचित होगा । (१) वास्तव विचित्र प्रश्नानि । (२) वास्तव चन्द्र शृङ्गोन्नतिः । (३) दीर्घवृत्त- लक्षणम् । (४) भाभ्रमरेखा निरूपणम् । (५) ग्रहणे छादकनिर्णयः । (६) यन्त्रराजः । (७) प्रतिभाबोधकः । (८) धराभ्रमे प्राचीन नवीनयोर्विचारः । (९) पिण्ड प्रभाकरः । (१०) सशल्यवाणनिर्णयः । (११) वृत्तान्तर्गत सप्तदश भुज रचना । (१२) गणक तर-