सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ८ ]
नहीं है। प्रमेयविभागके अवसरमें प्रभाकरानुयायी—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, शक्ति, सङ्ख्या और सादृश्य इस प्रकारसे आठ पदार्थ मानते हैं। मीमांसक ईश्वरको नहीं मानते। कुछ साम्प्रदायिक कहते हैं कि मीमांसक ईश्वर नहीं मानते, ऐसी बात नहीं है, किन्तु ईश्वरके होते हुए भी वह स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् तत्-तत् कर्मोंके अनुसार तत्-तत् प्राणियोंको शुभाशुभ फल देनेके कारण वह ईश्वर परतन्त्र है, अतएव उसका अस्तित्व अकिञ्चित्कर होनेसे नहींके बराबर ही है। मनुष्य धर्माधर्मका ठीक-ठीक परिज्ञान करके उनके अनुष्ठान द्वारा स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यही मोक्ष है, क्योंकि स्वर्गकी प्राप्तिसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, वह सुखस्वरूप है। ज्ञानकाण्डको ये लोग स्वार्थमें प्रमाण नहीं मानते हैं। अन्य अधिक विस्तार मीमांसाग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
उत्तरमीमांसाशास्त्र
उत्तरमीमांसा शास्त्रका सूत्रों द्वारा भगवान् वेदव्यासने ग्रथन किया है। इसका सम्पूर्ण विचार चार अध्यायोंमें है, जिनका क्रमशः समन्वयाध्याय, अविरोधाध्याय, साधनाध्याय और फलाध्यायसे भी व्यवहार होता है। उत्तरमीमांसामें वेदके ज्ञानकाण्डका विचार है। प्रकृतमें मीमांसाशब्दका अर्थ पूजित विचार होता है। उसी विचारको पूजित विचार कहते हैं—जो कि मनुष्योंको निरतिशयनित्यसुखकी साधनताका यथार्थ परिज्ञान करानेमें समर्थ हो। और पूर्वमीमांसामें आये हुए मीमांसाशब्दका अर्थ—धर्माधर्मविषयक विचार—करना चाहिए। इस प्रकारके भिन्नार्थकत्वमें केवल पूर्वोत्तरशब्द ही प्रमाणरूपसे बस हैं। इसी उत्तरमीमांसाके लिए वेदान्तशब्दका व्यवहार होता है। यद्यपि वेदान्तशब्दका मुख्य अर्थ वेदका उपनिषद्भाग ❋ है, तथापि परम्परया उपनिषद्भागके अर्थनिर्वचनमें उपकारक शारीरकमीमांसा † आदि भी वेदान्तशब्दका अर्थ होता है।
❋ वेदका सामान्यतः तीन काण्डोंमें विभाग किया गया है—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड, इनमें ज्ञानकाण्डको अर्थात् आत्मतत्त्वप्रतिपादक वेदविभागको उपनिषत् कहते हैं।
† शारीरक—जीवात्मा—त्वंपदवाच्य पदार्थ, उसका तत्पदवाच्य परमात्माके साथ अभेद प्रतिपादनके लिए जो मीमांसा है, उसको शारीरकमीमांसा कहते हैं, अर्थात् ब्रह्मसूत्रभाष्य आदि।