सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 590 में से
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भगवान् शङ्कराचार्यके सिवा 'ब्रह्मसूत्र'के ऊपर अन्य भी कई-एक आचार्योंने अपने-अपने अभिमत साम्प्रदायिक अर्थके प्रतिपादनके लिए भिन्न-भिन्न भाष्य बनाए हैं, उनमेंसे रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, और निम्बार्काचार्य प्रसिद्ध हैं।
रामानुजाचार्यका मत
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा प्रचारित सिद्धान्तको विशिष्टाद्वैतसिद्धान्त कहते हैं। विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तशब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—द्वयोर्भावः—द्विता, द्विता एव—द्वैतम्—न द्वैतम् अद्वैतम्—अभेदः, विशिष्टस्य—स्वव्यतिरिक्तसमस्तचेतनाचेतनविशिष्टस्य ब्रह्मणः अद्वैतम्—विशिष्टाद्वैतम्, तदेव सिद्धान्तः—विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तः अर्थात् ब्रह्म अद्वैत है, किन्तु स्वभिन्न चेतन और अचेतन पदार्थोंसे विशिष्ट है।
इनके मतमें चित्, अचित् और ईश्वरके भेदसे अर्थात् भोक्ता, भोग्य और नियामकके भेदसे तीन पदार्थ हैं। जैसे कि उन्होंने ही अपने ग्रन्थमें कहा है—
'ईश्वरश्चिदचिच्चेति पदार्थत्रितयं हरिः।
ईश्वरश्चित् इत्युक्तो जीवो दृश्यमचित् पुनः॥'
चित्शब्दसे कहलानेवाला जीवात्मा परमात्मासे भिन्न अणु तथा अविनाशी है अचित्-शब्दवाच्य पदार्थ भोग्य, भोगोपकरण और भोगायतनके भेदसे त्रिविध हैं। इस त्रिविध जगत्का कर्ता वासुदेवपदवाच्य परमात्मा है। इसीकी उपासनासे * जीवकी मुक्ति होती है, इत्यादि।
मध्वाचार्यका मत
मध्वाचार्य द्वैतवादी हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रके ऊपर भाष्य बनाकर द्वैतवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा की है। स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र ये दो इनके मतमें तत्त्व हैं। सम्पूर्ण शुभगुणसम्पन्न विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है, और इतर सब अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र ईश्वर और जीवका परस्पर भेद ज्ञात हो जानेपर मुमुक्षु सांसारिक कष्टसे मुक्त हो जाता है, और दुःखरहित आनन्दका उपभोग करता हुआ वह
* ईश्वरकी पांच प्रकारसे उपासना मानी गई है—अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय, और योग। देवताके स्थान और मार्ग आदिको साफ-सुथरा करना अभिगमन, गन्ध, पुष्प आदि देवताओंकी सामग्रीका सम्पादन उपादान, देवतापूजन इज्या, अर्थानुसन्धानपूर्वक स्तोत्रादिका पाठ स्वाध्याय और देवानुसन्धान योग कहलाता है।
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