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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 590 में से

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ईश्वरके पास प्रमोद प्राप्त करता है। रामानुजोंके समान ये भी जीवाणुवादी ही हैं। इनके मतको पूर्णप्रज्ञदर्शन * भी कहते हैं।

वल्लभाचार्यका मत

वल्लभाचार्यका जो ब्रह्मसूत्रके ऊपर भाष्य है, उसको अणुभाष्य भी कहते हैं। ये भी जीवाणुवादी ही हैं, परन्तु पूर्वोक्त मतोंसे इनके मतमें यह विशेष है कि गोलोकाधीश्वर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही उपास्य है, अन्य नहीं। किञ्च, यह मानते हैं कि यद्यपि वस्तुतः द्वैत है, तथापि शुद्धाद्वैत ही वेदान्तप्रतिपाद्य है, अर्थात् शुद्ध जीव और परमात्माका अद्वैत है, क्योंकि जीव और ईश्वरकी अविद्या और मायारूप उपाधि वे नहीं मानते हैं, इसलिए अग्नि और विस्फुलिङ्गके समान शुद्ध जीव और परमात्माका ऐक्य हो सकता है और अविकृतपरिणामवाद भी इन्होंने माना है।

निम्बार्काचार्यका मत

ब्रह्मसूत्रके ऊपर निम्बार्काचार्यकी सौरभ नामकी अति संक्षिप्त व्याख्या है, इसीको भाष्य भी कहते हैं। इनका मत भेदाभेदवाद कहलाता है। इनके मतमें चित्, अचित् और ब्रह्म ये तीन पदार्थ मूलरूपसे माने गये हैं। चित्शब्दसे जीव लिया गया है, जो कि अणु, ज्ञानरूप और ज्ञातृत्व आदि धर्मवाला एवं अहंपदवाच्य है। अचित्पदार्थ प्राकृत, अप्राकृत और कालके भेदसे तीन प्रकारका है। सत्त्व आदि तीन गुणोंका आश्रयीभूत द्रव्य प्राकृत पदार्थ है और विष्णुपद, परमपद आदिसे कहलानेवाला अप्राकृत है। इन दोनोंसे भिन्न अचेतन द्रव्यका नाम काल है। जगत्कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त नारायण, वासुदेवपदवाच्य श्रीकृष्ण ही ब्रह्मशब्दका अर्थ है। ये चित्, अचित् और ब्रह्म पदार्थ अनेक वाक्योंसे † परस्पर भिन्न और


* प्रथमस्तु हनूमान् स्यात् द्वितीयो भीम एव च ।
पूर्णप्रज्ञस्तृतीयः स्यात् भगवत्कार्यसाधकः ॥
इस श्लोकसे मध्वमतप्रवर्तकपरम्पराके ऊपर कुछ आभास पड़ता है—अर्थात् वायुके अवतारभूत—हनूमान् आदि द्वारा यह मत प्रस्तुत हुआ है।

† अर्थात् 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि वाक्योंसे पदार्थोंकी भिन्नता भासती है और 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंसे उक्त पदार्थोंकी परस्पर अभिन्नता भासती है, अतः इन वाक्योंके आधारपर चिदचिद्भिन्नाभिन्न ब्रह्म जिज्ञास्य है, यह इन लोगोंका कथन है।

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