सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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अभिन्न भी मालूम पड़ते हैं, इसलिए भिन्नार्थप्रतिपादक और अभिन्नार्थप्रतिपादक वाक्योंका स्वार्थमें प्रामाण्य होनेके कारण ब्रह्माधीनस्थितिप्रवृत्तिमत्त्वरूपसे ✻ और प्रत्येकवृत्ति असाधारणधर्मसे चिदचिद्भिन्नाभिन्न ब्रह्म ही मुमुक्षु द्वारा जिज्ञासितव्य है। उक्त प्रकारके ब्रह्मज्ञानसे भगवद्भावापत्तिरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है, यह निम्बार्कका संक्षेपसे मत है।
उक्त प्रकारसे आस्तिकदर्शनोंका साधारणरूपसे दिग्दर्शन कराया गया है। इनका अधिक विस्तार तो उनके ग्रन्थोंसे जानना चाहिए। अब नास्तिक दर्शनोंका कुछ विवेचन करते हैं—
चार्वाकमत
चार्वाकशब्दका अर्थ है—आपातः रमणीय वाणीको कहनेवाला मत-विशेषप्रवर्तक आचार्य। चार्वाकमतके आलोचनसे रागतः प्रवृत्तिशील पुरुषोंको उनका मन्तव्य अच्छा ही लगता है। इनके मतमें चार तत्त्व हैं—पृथ्वी, जल, तेज और वायु। ये ही चार तत्त्व देहाकारमें परिणत होकर मदशक्तिसे युक्त मद्यके समान † चैतन्ययुक्त हो जाते हैं और चैतन्ययुक्त देहेन्द्रियादि ही इनके मतमें आत्मा है। इनसे अतिरिक्त 'आत्मा' कोई पदार्थ नहीं है। और इस मतमें केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, अनुमानादि नहीं। इस मतके मूल प्रवर्तक आचार्य वृहस्पति हैं। ये लोग अतीन्द्रिय पदार्थ मानते ही नहीं ‡।
✻ चक्षु आदि इन्द्रियाँ यद्यपि परस्पर स्वकीय असाधारणधर्मसे भिन्न हैं, तथापि प्राणाधीनस्थितिकत्वरूपसे अभिन्न हैं। वैसे ही चित्, अचित् और ब्रह्मके विषयमें भी उक्त दृष्टान्त घट सकता है, यह इनका मनोगत भाव है।
† जैसे सुरा जिस पदार्थसे बनती है, उस पदार्थमें मादकता पहलेसे नहीं रहती है, किन्तु उसकी विशेषक्रिया द्वारा उसमें अकस्मात् मादकता आ जाती है, वैसे ही पृथ्व्यादि पदार्थोंमें प्रत्येकरूपसे चैतन्यशक्तिके न होनेपर भी उनके परस्पर विलक्षण आकृतिमें परिणत हो जानेके बाद चैतन्यशक्ति आ जाती है, यह चार्वाकोंका तात्पर्य है। जैसे कि इन्हीं लोगोंकी उक्ति है—
अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः।
चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥१॥
किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत्।
अहं स्थूलः कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥२॥
‡ अर्थात् अतीन्द्रिय पदार्थोंकी सिद्धि अनुमानसे की जा सकती है और अनुमान तो इनके मतमें प्रमाण नहीं है, अतः इनके मतमें अतीन्द्रिय पदार्थ नहीं है, यह तात्पर्य है।