भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७३


स्वात्ममोहात् समस्तस्य सेश्वरस्य प्रकल्पकः ।
स्वप्नवज्जीव एवैको नापरोऽस्तीति केचन ॥ २३ ॥

केवल एक जीव ही अज्ञानसे स्वप्न पदार्थोंके समान ईश्वरसहित इस सब प्रपञ्चका कारण है, दूसरा कोई कारण नहीं है, ऐसा कुछ लोगोंका मत है ॥ २३ ॥

जीव एव स्वप्नद्रष्टृवत् स्वस्मिन्नीश्वरत्वादिसर्वकल्पकत्वेन सर्वकारणम् इत्यपि* केचित् ॥ ४ ॥

स्वप्नद्रष्टाके समान अपनेमें ईश्वरत्व आदि सभी वस्तुओंकी कल्पना करनेके कारण जीव ही सबके प्रति उपादान कारण है, यह भी कुछ लोगोंका मत है । भाव यह है कि पूर्वग्रन्थमें जगत्का शुद्ध ब्रह्म उपादान है या ईश्वररूप ब्रह्म उपादान है या जीवरूप ब्रह्म उपादान इस प्रकार तीन विकल्प किये गये हैं, उनमें से तृतीय पक्षको लेकर कहते हैं—जीव ही उपादान है अर्थात् अवच्छेद या प्रतिबिम्बवादकी अपेक्षा न करके परिपूर्ण चिदात्मा ही अविद्यासे जीवभावको प्राप्त होकर अपनेको सभीका ईश्वर मानता है अर्थात् 'मैं ही ईश्वर हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, अनन्तर अपनेसे गगन आदिकी उत्पत्तिकी कल्पना करता है और अपने आप अपनेसे ही कल्पित ईश्वरका भेद और उससे 'मैं नियम्य हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, इसी रीतिसे मनुष्य आदिभावकी क्रमसे कल्पना करता है । जैसे 'आकाश आदि प्रपञ्च व्यवहारमें सत्य है और स्वप्नप्रपञ्च प्रातीतिक है' इस पक्षमें स्वप्नका द्रष्टा जीव ही—( स्वप्नमें ) देवादिभावसे, उसके नियन्ता परमेश्वररूपसे और उससे मैं भिन्न हूँ—इत्यादिरूपसे अपनी कल्पना करता है, वैसे ही दृष्टिसृष्टिपक्षमें श्रद्धा रखनेवाले कुछ महाजन अपने आपमें सब प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला जीवस्वरूपापन्न ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, ऐसा स्वीकार करते हैं ॥ ४ ॥


* यहाँ ज्ञातव्यविशेष यह है कि इस पक्षमें अर्थात् जीवभावापन्न ब्रह्म जगत्का उपादान है, इस पक्षमें जीवसे इतर ईश्वर रहेगा नहीं, इससे एक तो ईश्वरके अस्तित्वका प्रतिपादन करनेवाली तथा सब जीवोंके नियन्ताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ एवं इसीके समर्थक सूत्र और स्मृतियोंके साथ विरोध प्रसक्त होगा, दूसरा बन्ध और मोक्ष-व्यवस्था भी अस्तंगत होगी, इसलिए यह पक्ष असङ्गत है और यह भाव 'इत्यपि' इसके अपि शब्दसे सुस्पष्ट विदित भी होता है, अतः ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्का उपादान है यही पक्ष निर्दुष्ट है, ऐसा प्रतीत होता है।
१०

ankurnagpal108@gmail.com

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या) · पृष्ठ 101, कुल 590 में से · BharatKosha