भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अहेतुत्वादमायस्य मायाशवलतेष्यते ।
साऽप्युपादानमेवेति तत्त्वनिर्णयकृन्मतम्॥ २४ ॥

मायासे रहित शुद्ध ब्रह्म उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए (ब्रह्ममें) मायाशबलता मानी जाती है और वह माया भी उपादान ही है, ऐसा तत्त्वनिर्णयकारका मत है ॥ २४ ॥

अथ 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इति श्रुतेः, मायार्जाड्यस्य घटादिष्वनुगमाच्च माया जगदुपादानं प्रतीयते, कथं ब्रह्मोपादानम् ? ।
अत्राऽऽहुः पदार्थतत्त्वनिर्णयकाराः—ब्रह्म माया चेत्युभयमुपादानमित्युभयश्रुत्युपपत्तिः, सत्ताजाड्यरूपोभयधर्मानुगत्युपपत्तिश्च । तत्र ब्रह्म विवर्तमानतयोपादानम्, अविद्या परिणममानतया ।

यहाँपर यह शङ्का होती है कि 'ब्रह्म जगत्का उपादान है' यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'मायां तु प्रकृतिं'० (माया ही जगत्की प्रकृति—उपादान है, ऐसा जानो) इस प्रकारकी मायामें ही उपादानत्वकी प्रतिपादिका श्रुति है और [जैसे घट आदिमें उपादानभूत मृत्तिकाके श्लक्ष्णत्व आदि धर्मोंका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, वैसे ही] घट आदि समस्त प्रपञ्चमें मायामें रहनेवाले जडत्व धर्मका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, अतः माया जगत्की उपादान है, ऐसा प्रतीत होता है। [यद्यपि अनेक श्रुतियोंके आधारपर पीछे ब्रह्मकी उपादानताका दिग्दर्शन कराया गया है, तथापि निरवयव ब्रह्ममें मृत्तिका आदिके समान परिणामी उपादानता नहीं हो सकती है, यदि ब्रह्मको विवर्तोपादान कहें तो भी जैसे परिणामी उपादान लोकमें देखे जाते हैं, वैसे विवर्तके अधिष्ठानमें उपादानत्वकी प्रसिद्धि लोकमें नहीं है, अतः ऐसे पदार्थोंमें उपादानत्वका स्वीकार करना केवल स्वकीय-कपोलकल्पनासे परिभाषा बांधनामात्र है, ऐसा आक्षेपकर्ताका प्रकृतमें अभिप्राय है]।

इस परिस्थितिमें पदार्थतत्त्वनिर्णयकार उत्तर कहते हैं—ब्रह्म और माया दोनों ही जगत्के प्रति उपादान हैं; इसलिए माया और ब्रह्ममें उपादानत्वकी प्रतिपादिका दोनों श्रुतियोंकी युक्तार्थता है और (घट आदिमें भासनेवाले) सत्ता और जड़ता दोनों धर्मोंके अनुगमकी भी उपपत्ति हो सकती है। इसमें विशेषता यह है कि ब्रह्म विवर्तमानरूपसे उपादान है और माया परिणामरूपसे उपादान है।