सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७५
न च विवर्ताधिष्ठाने पारिभाषिकमुपादानत्वम् । स्वात्मनि कार्यजनि- हेतुत्वस्योपादानलक्षणस्य तत्राऽप्यविशेषादिति ।
केचित् उक्तामेव प्रक्रियामाश्रित्य विवर्तपरिणामोपादानद्वयसाधारण- मन्यल्लक्षणमाहुः--स्वाभिन्नकार्यजनकत्वमुपादानत्वम् । अस्ति च प्रपञ्चस्य
और. पूर्वमें यह जो कहा गया है कि विवर्तके अधिष्ठानमें पारिभाषिक उपादानत्व है, यह भी नहीं है, क्योंकि 'स्वात्मनि कार्यजनिहेतुत्वरूप उपादानका लक्षण है, वह [ मृत्तिका आदि उपादानमें जैसे रहता है, वैसे ही ] विवर्तके अधिष्ठानमें भी रहता ही है । ['स्वात्मनि' इत्यादि उपादानके लक्षणमें प्रविष्ट स्वशब्दसे उपादानरूपसे अभिमत जो वस्तु हो उसका ग्रहण करना चाहिए, अतः लक्षण-समन्वय यों करना चाहिए--स्वपदसे मृत्तिकाका ग्रहण हुआ, उसमें घटरूपकार्यकी उत्पत्तिकी हेतुता है, इसलिए घटकी कारण मृत्तिकामें उपादानता है । ब्रह्ममें भी वियदादिसृष्टिकी हेतुता होनेसे उपादानका उक्त लक्षण घट जाता है ] ।
कुछ लोग इसी प्रक्रियाके आधारपर विवर्त और परिणाम दोनों उपादानोंमें समानरूपसे लागू होनेवाला अन्य लक्षण कहते हैं कि स्वाभिन्नकार्यजनकत्व ही उपादानत्व * है अर्थात् उपादानसे अभिन्न जो कार्य उसकी उत्पत्तिका जो हेतु
* इस लक्षणमें स्वशब्दसे परिणामी-उपादानत्वसे विवक्षित मृत्तिका, अज्ञान आदिका और विवर्तोपादानत्वसे विवक्षित ब्रह्मका ग्रहण होता है, मृत्तिकारूप उपादान और घटका परस्पर अभेद है ही, क्योंकि 'घट मृत्तिका ही है' इस प्रकार अभेद प्रतीत होता है । परन्तु इस परिस्थितिमें एक विचार अवश्य होता है कि 'मृत्तिका घट है' या 'तन्तु पट है' इस प्रकार जैसे अभेदप्रत्यायक प्रतीति हुआ करती है, वैसे 'घट ब्रह्म है' 'पट ब्रह्म है' या 'अज्ञान घट है' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका घटादिसे अभेद सिद्ध होनेके लिए लौकिक व्यवहार नहीं होता, अतः ब्रह्म या अज्ञानरूप उपादानसे घटादि प्रपञ्चका अभेद कैसे मान सकते हैं ? इस शङ्काके परिहारमें यों कहा जाता है--यद्यपि ब्रह्म और अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद ब्रह्मत्व या अज्ञानत्वरूपसे व्यवहृत नहीं होता है, तो भी सत्त्व और जडत्वरूप धर्मोंसे, जो ब्रह्म और अज्ञानके धर्म हैं, 'सन् घटः' 'जडो घटः' इस प्रकार ब्रह्म और अज्ञानका प्रपञ्चके साथ अभेद भासता है । सत्त्व और जडत्व ब्रह्म तथा अज्ञानके धर्म हैं इसमें श्रुतिरूप प्रमाण भी है 'सदेव' ( ब्रह्म सत् ही है ) 'तदेतज्जडं मोहात्मकम्' ( वह अज्ञान जड़ और मोहात्मक है ) इसी गूढ़ अभिप्रायका सूचन करनेके लिए मूलमें 'सद्रूपेण' यह ब्रह्मका विशेषण और 'जडेन' यह अज्ञानका विशेषण दिया गया है ।