भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; ‘सन् घटः, जडो घटः’ इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।

न च ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४) इति सूत्रे ‘अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः’ ‘न खल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः’ इति भाष्यभामतीनिबन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधाद्भेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्ताकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजतयोरिव प्रातीतिकामेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।


हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि ‘सन् घटः’ और ‘जडो घटः’ अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।

अब शङ्का होती है कि * ‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—‘कारणसे पृथक् कार्यका न रहना’ ‘अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं’ इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समानसत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।


* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे ‘वाचारम्भण’ श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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