सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७९
वाचस्पतिमिश्रास्तु--जीवाश्रितमायाविषयीकृतं ब्रह्म'स्वत एव जाड्याश्रयप्रपञ्चाकारेण विवर्तमानतयोपादानमिति माया सहकारिमात्रम्, न कार्यानुगतं द्वारकारणमित्याहुः ।
वाचस्पतिमिश्र, कहते हैं कि जीवकी आश्रित मायासे विषयीकृत ब्रह्म ही स्वयं जाड्यका आश्रयीभूत अर्थात् जड़ प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानरूपसे उपादान है, अतः माया सहकारी कारण ही है। कार्यानुगत द्वारकारण नहीं है * ।
• वाचस्पतिमिश्रके उक्त मतमें एक विचार उपस्थित होता है कि अक्षरब्राह्मणमें आकाशशब्दसे कहलनेवाली मायाका अक्षरशब्दसे वाच्य नित्य चैतन्य रूप ब्रह्म ही आश्रय माना गया है, इसलिए उसका (मायाका) जीव आश्रय है, यह कहना अत्यन्त विरुद्धसा ज्ञात होता है और 'मायिनं तु महेश्वरम्' (महेश्वरको मायाका आश्रय जानो) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतियाँ मायाके ब्रह्माश्रितत्वमें प्रमाण हैं जीवाश्रितत्वमें प्रमाण नहीं, अतः उभयथा यह मत असङ्गत है, दूसरी बात यह है कि जीवके मायाश्रय होनेपर जीवमें जगदुपादानत्वका प्रसङ्ग आवेगा ब्रह्ममें नहीं आवेगा। अपि च यदि माया ब्रह्मकी उपाधि न हो, तो ब्रह्म नियन्ता भी कैसे होगा? इसपर वाचस्पतिमिश्रके अनुयायियोंका कहना है कि जीवाश्रितत्वपदसे जीवत्वविशिष्ट चैतन्याश्रितत्व विवक्षित नहीं है, परन्तु अक्षरब्राह्मणके अनुरोधसे चैतन्याश्रितत्व ही विवक्षित है। और मायापदसे वेदनीय अविद्याकी चैतन्यवृत्तिमें जीवत्वका अवच्छेदकरूपसे भान होता है, अतः मायामें जीवाश्रितत्वका कथन है और 'निरवद्यं निरञ्जनम्' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मके निर्गुणत्वका ज्ञान होनेसे उसे अविद्याश्रय मानना विरुद्ध ही है 'मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादि श्रुतिका माया और ब्रह्मका परस्पर विषयविषयीभावरूप सम्बन्धके बोध करनेमें तात्पर्य है। प्रपञ्चका उपादान जीव होगा, यह आपत्ति भी वन्ध्यापुत्रके समान मिथ्या है, क्योंकि समस्त प्रपञ्च जीवाश्रितमायाविषयीकृत ब्रह्मका विवर्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें जगत्की उपादानकारणताकी प्रसक्ति नहीं होगी। ब्रह्ममें वस्तुतः उपाधिका सम्पर्क न होनेपर भी सर्वनियन्तृत्व आदिकी—जीवकी अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्मके विवर्त रूपसे—ब्रह्मधर्मसे कल्पना की जाती है, इसलिए जीवाविद्याविषयीकृत ब्रह्म ही प्रपञ्चाकारसे विवर्त मान होता है, इसमें कोई दोष नहीं है।
आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें 'मूलकारणमेव······नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते' नटके दृष्टान्तसे वाचस्पतिमिश्रका यह मत ज्ञात होता है, इसीलिए कल्पतरुमें कहा गया है कि-
स्वाश्रया नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवभ्रान्तिनिमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥
अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥
अर्थात् जैसे द्रष्टाओंसे अविज्ञात है रूप जिसका ऐसा नट उन-उन अभिनयोंको, जो वस्तुतः सत्य नहीं है, प्राप्त होता है, वैसे ही जीवों द्वारा अज्ञातस्वरूप ब्रह्म ही असत्य